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श्री सम्प्रदाय सम्प्रदाय के गुरुभक्त आचार्य श्री मणक्काल् नम्बी – “राममिश्र स्वामीजी”

दक्षिण भारत के श्री सनातन परम्परा के प्रमुख आचार्य नाम्मालवार (शठकोपन )के शिष्यों में मधुर कवि और रत्ननाथ मुनि दो प्रमुख नाम थे। रत्ननाथ मुनि के दो शिष्य मणक्काल् नम्बी और उयकोण्डा पुण्डरीकाक्ष थे। दोनों श्री वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्य तथा समकालीन थे। आचार्य श्री मणक्काल् नम्बी का उपनाम राम मिश्र था। वे श्री यमुनाचार्य के पितामह श्री रत्न नाथ मुनि के अत्यंत प्रिय कृपा प्राप्त और विश्वास पात्र शिष्य थे। वे उच्च कोटि के विद्वान सदाचारी थे और हर जीव में परमात्मा का दर्शन करते थे।

उनका जन्म माघ मास, माघ नक्षत्र के महीने में श्रीरंगम के पास कावेरी नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा गांव मनक्कल में हुआ था। मधुर कवि आळ्ळवार की तरह जो नम्माळ्ळवार के लिए बहुत समर्पित थे, मनक्कल नम्बि उय्यक्कोण्डार् के लिए बहुत समर्पित थे। उय्यक्कोण्डार रत्ननाथ मुनि की पत्नी के निधन के बाद, उन्होंने यमुनाचार्य का खाना पकाने खिलानेऔर सम्पूर्ण देखरेख की जिम्मेदारी ली और अपने गुरु के अंश की हर व्यक्तिगत आवश्यकता को पूरा किया।

एक बार उय्यक्कोंडार रत्ननाथ मुनि की बेटियां नदी में स्नान करने के बाद वापस लौट रही थीं, तब रास्ते में कीचड़ के कारण वह आगे नहीं बढ़ीं। यह देख मनक्कल नम्बि छाती के बल पर कीच पर लेट जाता है और अपने गुरु के बेटों को अपनी पीठ पर बहते हुए नदी पार कराया था । उनके अंश यूयक्कोण्डार रत्ननाथ मुनि को जब इस घटना का रहस्य मिला, तब वह मनक्कल नम्बि के अंश चरणों में भक्ति और जिम्मेदारी वहन करने की क्षमता को देख अत्यंत प्रशंसा की थी।

रत्न नाथमुनि के पुत्र यमूनाचार्य थे । परंपरा के अनुसार रत्ननाथमुनि श्रीरंगम मंदिर की मूर्ति में प्रवेश कर ईश्वर में समाहित हो गये थे।  जिसके कारण यमुनाचार्य के देखरेख की जिम्मेदारी पितामह पुण्डरीकाक्ष ने अपने शिष्य श्री राम मिश्र को सौंप रखी थी। एक तरह से श्री राम मिश्र जी यमूनाचार्य के गुरु और संरक्षक की जिम्मेदारी निभाई थी।

एक दिन यामुनाचार्य से राम मिश्र मिलने आए। उन्होंने कहा महाराज आप मेरे साथ चलें। आपके दादाजी बहुत बड़ा खजाना छोड़ गए थे, इसे संभाल लीजिए। यमुनाचार्य ने अपनी विद्वता से राज पुरोहित को शास्त्रार्थ में पराजित कर वहां के राजा को प्रसन्न कर उनका आधा राज्य प्राप्त कर लिया था।

राजा यामुनाचार्य राम मिश्र जी के साथ हो लिए। पैंतीस वर्षीय राजा यमुनाचार्य को रंगनाथ मंदिर पहुंचाया गया। रास्ते में राम मिश्र का स्पर्श पा लेने  तथा उनके भगवद विचार सुन लेने के कारण राजा यामुनाचार्य का हृदय बदल गया। वह भी रंगनाथ के सेवक बनकर वहीं रहने लगे। उन्होंने अपना राज्य भी त्याग दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने दादा द्वारा छोड़ा गया सच्चा धन प्राप्त कर लिया।  इनके उपदेश के प्रभाव से यामुनाचार्य राज सम्मान छोड़ कर रंगनाथ विष्णु जी के अनन्य सेवक हो गए थे।

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