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हाड़ोती संस्कृतिः मूर्तिकला दीर्घा, संग्रहालय बारां

हाड़ौती का बारां जिला मंदिर स्थापत्य एवं मूर्तिकला की दृष्टि से सर्वाघिक सम्पन्न है। इस जिले में स्थित अटरू काकोनी, कृष्णविलास, रामगढ़, शैरगढ़, घूमेन, बिछालस एवं सहरोद तत्कालीन मंदिर वास्तु एवं मूर्तिशिल्प के प्रमुख केन्द्र हैं।

ग्राम बड़वा (अन्ता) के तीसरी शती ई. के पाषाण यूप स्तम्भ मोखरी नरेश हस्तिन तथा महासेनापति बल के पुत्रों द्वारा सम्पादित यज्ञों के है, जो तत्कालीन समय के वैदिक यज्ञों के साक्षी है।

शेरगढ़ के कोषवर्घन अभिलेख से ज्ञात होता है कि 790 ई. में नागवंश के देवदत ने एक मंदिर व बौद्ध विहार का निर्माण करवाया। इससे प्रमाणित होता है कि 8वीं सर्दी में इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार था।झालावाड़ जिले में स्थित कोलवी, विनायका एवं हथियागौड के बौद्ध विहार एवं मंदिर गुफाओं से इसकी पुष्टि होती है।

शेरगढ़ के लक्ष्मीनाथ मंदिर के अभिलेख में परमार शासन वाकपति से नरवर्मा तक की वंशावली उत्कीर्ण है। इसलिए राजनीतिक इतिहास की दृष्टि से यह शिलालेख महत्वपूर्ण है। 11-12वी शताब्दी में हाड़ौती का क्षेत्र मालवा के परमार शासकों के अधीन था। काकोनी और अटरू की दो प्रतिमाओं पर परमार शासक नरवर्मा के तिथियुक्त अभिलेख उत्कीर्ण है।

रामगढ़ में स्थित भण्ड़देवरा नामक मूल मंदिर परमार शासनकाल में 12वीं शताब्दी के प्रारम्भ में बनवाया गया था। यह देवालय सप्तरथ योजना में निर्मित भूमिज शैली का विलक्षण मंदिर है। मंदिर परिसर में पूर्व कालीन अन्य देवालय भी हैं। इस दीर्घा में इस स्थान की मूर्तिया प्रमुख रूप से प्रदर्शित की गई है। विलासी नदी के तट पर अनेक मंदिरों के ध्वंसावशेष विद्यमान हैं। अधिकाश मंदिर भगवान विष्णु के समर्पित हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में वैष्णव धर्मावलम्बी अधिक संख्या में थे।

बारां संग्रहालय की मूर्ति दीर्घा में बारां जिले की 9वीं से 12वीं ई. शताब्दी की 39 प्रतिमाएं विषयवार प्रदर्शित की गई हैं। गाणपत्य, ब्रह्मा, वैष्णव, शैव, शाक्त, दिकपाल तथा जनजीवन संबंधी प्रतिमाओं को कमशः स्थान दिया गया है। मंदिर स्थापत्य में अष्ट दिकपाल प्रतिमाएं जंधा भाग में आठों दिशाओं में स्थापित की जाती हैं। इसके बीच-बीच में सुर-सुन्दरी एवं शार्दूल आदि प्रतिमाओं का अंकन होता है। मंदिर स्थापत्य में दिकपाल परम्परा का सूत्रपात 8वीं शताब्दी से देखने को मिलता है। दीर्घा में प्रदर्शित लक्ष्मीनारायण और नरवराह प्रतिमा शिल्प सौष्ठव की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वीथिका में संयोजित शैव प्रतिमाएं क्षेत्र में शैव धर्म के प्रभुत्व को रेखांकित करती है। बटुक भैरव और क्षेत्रपाल शिव के दो रूप है। दोनों रूपों में शिव के बालत्व को रोद्र स्वरूप में दर्शाया गया है। अटरू से प्राप्त लकुलीश प्रतिमा शैव धर्म के अन्तर्गत पाशुपत सम्प्रदाय की लोकप्रियता को बताती हैं।

दीर्घा के प्रारम्भ में शेषशायी विष्णु तथा विष्णु स्वरूप मधुसूदन व श्रीधर की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। ये प्रतिमाएं कला की दृष्टि से अद्भुत हैं। परवन नदी की तट पर स्थित काकोनी के मंदिर समूह में 9-12वीं शताब्दी के दवालयों के संरचनात्मक अवशेष उलब्ध हैं। यह स्थान तत्कालीन समय में कला, संस्कृति एवं धर्म का वृहत केन्द्र था। काकोनी की कतिपय प्रतिमाएं इस दीर्घा की शोभा बढ़ा रही हैं। ये प्रतिमाएं इन मंदिरों मंदिरों के अतीत एवं भव्यता का स्मरण कराती हैं।

अटरू एवं विलास के देवालयों में वसु प्रतिमाएं उल्लेखनीय संख्या में मिली है। वसु अर्ध देव की श्रेणी में आते है। इस दीर्घा में अनक एवं धर वसु की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। इस विषय के अध्ययन की दृष्टि से ये मूर्तियां महत्वपूर्ण हैं।

दीर्घा में प्रदर्शित मातृकाएं प्रतिमाएं मातृका पूजा के साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। पंचलीला वर्ग में देवी लीला की आसनस्थ एवं स्थानक प्रतिमाएं दीर्घा में प्रदर्शित है। पंचलीला प्रतिमाएं प्रायः देवालय के वेदीबंध भाग पर उत्कीर्ण की जाती थी। दीर्घा में प्रदर्शित नारी और पुरूष प्रतिमाओं से तत्कालीन जनजीवन व वेश-भूषा आदि का परिज्ञान होता है। दीर्घा की अन्य महत्वपूर्ण प्रतिमाओं में त्रिमुखी ब्रह्मा, हरिहर-पितामह-मार्तण्ड़, सपत्नीक विष्णु, शिशु सहित अम्बिका सद्यः स्नाता और अश्य-शार्दूल आदि हैं। प्रदर्श शिल्प इस क्षेत्र की मूर्तिकला के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ( सौजन्य : बारां राजकीय संग्रहालय)

(लेखक कोटा में रहते हैं और ऐतिहासिक व पर्यटन से जुड़े विषयों पर लिखते हैं, इनकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी है)

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