Monday, July 22, 2024
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हस्तीमल हस्ती ने अपनी हस्ती अनंत में विलीन कर दी

झक सफेद कुरते पायजामें में झक सफेद लटों को लहराता हुआ एक शख्स मुंबई की हर साहित्यिक गोष्ठियों में नजर आता था। मुंबई की चौपाल से लेकर हर महफिल में उस शख्स की मौजूदगी एक जादुई एहसास से भिगो देती थी। महफिल में शामिल लोगों को ये जानकर आश्चर्य होता था कि उनके पास चुपचाप बैठा शख्स वह शायर है जिसकी गज़लें गा-गा कर पंकज उधास से लेकर जगजीत सिंह ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई है।

इस शख्स की एक और पहचान थी जो बहुत कम लोगों को पता होती थी, ये पेशे से स्वर्णकार थे और सोने के कारोबार के साथ साथ शब्दों को भी सोने से ज्यादा कीमती बना देने में महारत रखते थे। आज 24 जून को अपरान्ह 3 बजे मुंबई में उनका निधन हो गया।

हस्ती जी का जन्म 11 मार्च 1946 को आमेर जिले के राजसमंद शहर राजस्थान में हुआ था। ‘प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है’ जगजीत सिंह द्वारा गाई गई ये ग़ज़ल बहुत प्रसिद्ध हुई। क्या कहें किससे कहें, कुछ और तरह से भी, प्यार का पहला ख़त आदि इनके प्रमुख रचना संग्रह हैं। इनको विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया जिसमें महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी प्रमुख है। वे अपने ही खर्च से “युगीन काव्य” के नाम से त्रैमासिक पत्रिका निकालते रहे।

हस्ती जी का एक और परिचय था कि मुंबई में गीतकार शायर या रचनाकार के रूप में संघर्ष कर रहे लोगों को वे भरपूर मदद करते थे। सोने के कारोबारी थे और दिल भी सोने की तरह ही था।

ऊपर फोटो में आप जिस पुस्तक का आवरण देख रहे हैं वह किताब फ्लिपकार्ट पर 541 रुपये की थी मगर अब उपलब्ध नहीं है क्योंकि जितनी पुस्तकें छपी थी सब हाथोंहाथ बिक गई। एक हिंदी लेखक पर लिखी गई पुस्तक हाथों हाथ बिक जाए और उपलब्ध ना हो पाए ऐसा कमाल हस्तीमल हस्ती जैसी हस्ती ही कर सकती थी।

उनके निधन से मुंबई के साहित्य क्षितिज का एक सितारा अस्त हो गया।

कवि कुमार विश्वास ने हस्ती जो को श्रध्दांजलि देते हुए कहा,

” प्यार से सरोबार सादा तबीयत इंसान और बेहद सादा लफ़्ज़ों में कमाल कह देने का हुनर रखने वाले हस्तीमल हस्ती नहीं रहे। मूलतः राजस्थान के रहने वाले हस्तीमल जी मुंबई में गहनों का व्यापार करते थे। एक-एक नगीने को, हीरे को सही जगह जमाकर उसे जगमगाता आभूषण बनाने की हुनरमंदी ने ही शायद उन्हें शब्दों को बरतने की बेहतरीन क़ाबलियत बख्शी थी।

जगजीत सिंह से लेकर हर बड़े गायक ने उनके खूबसूरत लफ़्ज़ों के जिस्म को गायकी की रूह अता की थी। गाहे-बगाहे किसी-किसी मिसरे पर देर तक बतियाने के लिए आने वाले उनके कॉल का ताउम्र अब बस इंतज़ार ही रहेगा। अज्ञात अनंत के उनके लंबे सफ़र के लिए हम सब अदीबों की ओर से उन्हें सादर शुभकामनाएँ।

क्यूँकि बक़ौल ख़ुद हस्तीमल जी
“जिस्म की बात नहीं है उनके दिल तक जाना था,
लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है….।”
अलविदा शायर ए ज़माना…

उनकी अंतिम यात्रा
कल यानी 25 जून को सुबह 11.00 बजे सांताक्रुज़ स्थित उनके निवास से 502 करण, यात्रा होटल के पास भूमि टॉवर के सामने प्रभात कालोनी सांताक्रूज पूर्व से निकलेगी
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क्या ख़ास क्या है आम ये मालूम है मुझे
किसके हैं कितने दाम ये मालूम है मुझे
हम लड़ रहे हैं रात से लेकिन उजाले पर
होगा तुम्हारा नाम ये मालूम है मुझे
ख़ैरात मैं जो बांट रहा हूँ उसी के कल
देने पड़ेंगे दाम ये मालूम है मुझे
रखते हैं कहकहो में छुपा कर उदासियां
ये मयकदे तमाम ये मालूम है मुझे
जब तक हरा-भरा हूँ उसी रोज़ तक हैं बस
सारे दुआ सलाम ये मालूम है मुझे
~हस्तीमल हस्ती
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बारहा ख़ुद को आज़माते हैं
तब कहीं जा के जगमगाते हैं
शक़्ल हमने जिन्हें अता की है
वे हमें आईना दिखाते हैं
बोझ जब मैं उतार देता हूँ
तब मेरे पाँव लड़खड़ाते हैं
सुख परेशां है ये सुना जबसे
हम तो दुख को भी गुनगुनाते हैं
तीरगी तो रहेगी ही ऐ दोस्त
वे कहाँ मेरे घर पे आते हैं
~हस्तीमल हस्ती
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उस जगह सरहदें नहीं होती
जिस जगह नफ़रतें नहीं होती

उसका साया घना नहीं होता
जिसकी गहरी जड़ें नहीं होती

उलझे धागों से हमने समझा है
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा कुछ-कुछ
~हस्तीमल हस्ती
चाहे जितने तोड़ लो तुम मंदिरों के वास्ते
फूल फिर भी कम न होंगे तितलियों के वास्ते

जिस्म की बात नहीं थी, उनके दिल तक जाना था
लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है।

आग पीकर भी रौशनी देना
माँ के जैसा है ये दिया कुछ-कुछ

घोड़ा हो या पियादा हो राजा हो या वज़ीर हैं
वक्त के ग़ुलाम ज़रा ध्यान में रहे

कभी कभी तो आप भी हमसे, मिलने की तकलीफ़ करें
हरदम हम ही आएँ-जाएँ यूँ थोड़े ही होता है

बरसों रूत के मिज़ाज सहता है
पेड़ यूं ही बड़ा नहीं होता

काम सभी हम ही निबटाएँ, यूँ थोड़े ही होता है
आप तो बैठे हुक़म चलाएँ, यूँ थोड़े ही होता है

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औरों का भी ख़्याल कभी था अभी नहीं
इंसान इक मिसाल कभी था अभी नहीं
पत्थर भी तैर जाते थे तिनकों की ही तरह
चाहत में वो कमाल कभी था अभी नहीं
क्यों मैंने अपने ऐब छिपा कर नहीं रखे
इसका मुझे मलाल कभी था अभी नहीं
क्या होगा कायनात का गर सच नहीं रहा
हर दिल में ये ख़्याल कभी था अभी नहीं
क्यों दूर-दूर रहते हो पास आओ दोस्तों
ये ‘हस्ती’ तंग-हाल कभी था अभी नहीं

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उस जगह सरहदें नहीं होतीं
जिस जगह नफ़रतें नही होतीं
उसका साया घना नहीं होता

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जूगनू बन या तारा बन
राहों का उजियारा बन
सुर ही तेरा जीवन है
बंसी बन या तारा बन
आवारा का मतलब जान
शौक़ से फिर आवारा बन
एक किसी का क्या बनना
दुनिया भर का प्यारा बन
सच इसां की दुनिया में
घूम रहा बेचारा बन

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काम करेगी उसकी धार
बाकी लोहा है बेकार
कैसे बच सकता था मैं
पीछे ठग थे आगे यार
बोरी भर मेहनत पीसूँ
निकले इक मुट्ठी भर सार
भूखे को पकवान लगें
चटनी, रोटी, प्याज, अचार
जीवन है इक ऐसी डोर
गाठें जिसमें कई हजार
सारे तुगलक चुन चुनकर
हमने बनाई है सरकार
शुक्र है राजा मान गया
दो दूनी होते हैं चार
प्यार वो शै है हस्ती जी
जिसके चेहरे कई हजार

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टूट जाने तलक गिरा मुझको
कैसी मिट्टी का हूँ बता मुझको
मेरी खुशबू भी मर न जाय कहीं
मेरी जड़ से न कर जुदा मुझको
एक भगवे लिबास का जादू
सब समझते हैं पारसा मुझको
अक़्ल कोई सजा़ है या ईनाम
बारहा सोचना पडा़ मुझको
हुस्न क्या चन्द रोज़ साथ रहा
आदतें अपनी दे गया मुझको
कोई मेरा मरज़ तो पहचाने
दर्द क्या और क्या दवा मुझको
मेरी ताक़त न जिस जगह पहुँची
उस जगह प्यार ले गया मुझको
आपका यूँ करीब आ जाना
मुझसे और दूर ले गया मुझको

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कितनी मुश्किल उठानी पड़ी
जब हक़ीक़त छुपानी पड़ी
शर्म आती है ये सोच कर
दोस्ती आजमानी पड़ी
हर मसीहा को हर दौर में
सच की क़ीमत चुकानी पड़ी
जो थी मेरी अना के ख़िलाफ़
रस्म वो भी निभानी पड़ी
रास्ते जो दिखाता रहा
राह उसको बतानी पड़ी
थी हर इक बात जिस बात से
बात वो भी भुलानी पड़ी

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कौन है धूप सा छाँव सा कौन है
मेरे अन्दर ये बहरूपिया कौन है
बेरूख़ी से कोई जब मिले सोचिये
द्श्त में पेड़ को सींचता कौन है
झूठ की शाख़ फल फूल देती नहीं
सोचना चाहिए सोचता कौन है
आँख भीगी मिले नींद में भी मेरी
मुझमें चुपचाप ये भीगता कौन है
अपने बारे में ‘हस्ती’ कभी सोचना
अक्स किसके हो तुम आईना कौन है

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सच के हक़ में खडा हुआ जाए
जुर्म भी है तो ये किया जाए
हर मुसाफ़िर मे शऊर कहाँ
कब रुका जाए कब चला जाए
बात करने से बात बनती है
कुछ कहा जाए कुछ सुना जाए
हर क़दम पर है एक गुमराही
किस तरफ़ मेरा काफ़िला जाए
इसकी तह में है कितनी आवाजें
ख़ामशी को कभी सुना जाए

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सबकी सुनना अपनी करना
प्रेम-नगर से जब भी ग़ुजरना
बरसों याद रक्खें ये मौजे
दरिया से यूँ पार उतरना
अनगिन बूँदों में कुछ को ही
आता है फूलों में ठहरना
फूलों का अंदाज़ सिमटना
खुशबू का अंदाज बिखरना
अपनी मंजिल ध्यान में रख कर
दुनिया की राहों से ग़ुजरना

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बेशक़ मुझको तौल तू, कहाँ मुझे इनक़ार
पहले अपने बाट तो, जाँच-परख ले यार
जाने किससे है बनी प्रीत नाम की डोर
सह जाती है बावरी दुनिया भर का ज़ोर
पार उतर जाए कुशल किसकी इतनी धाक
डूबे अँखियाँ झील में बड़े – बड़े तैराक
होता बिलकुल सामने प्रीत नाम का गाँव
थक जाते फिर भी बहुत राहगीर के पाँव
तन बुनता है चदरिया, मन बुनता है पीर
दास कबीरा सी रही, अपनी भी तक़दीर
फीकी है हर चुनरी फीका हर बन्देज
जो रंगता है रूप को वो असली रंगरेज
~हस्तीमल हस्ती
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चिराग़ दिल का मुकाबिल हवा के रखते हैं,
हरेक हाल में तेवर बला के रखते हैं।
मिला दिया हैं पसीना भले ही मिट्टी में,
हम अपनी आंख का पानी बचा के रखते हैं।
हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी,
जिसे निशाने पे रखें बता के रखते हैं।
कहीं ख़ुलूस,कहीं दोस्ती,कहीं पे वफ़ा,
बडॆ करीने से घर को सजा के रखते हैं।
अना पसंद हैं “हस्तीजी” सच सही लेकिन,
नज़र को अपनी हमेशा झुका के रखते हैं।

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जग का खूब तमाशा देखा
मैखानों को प्यासा देखा
रूप नया जीवन का देखा
बूढ़े में जब बच्चा देखा
कोठे देखे सजे-सजीले
मंदिर उजड़ा-उजड़ा
एक झलक उसकी क्या देखी
भूल गया सब जो था देखा
जो न कभी आने वाला है
हमने उसका रस्ता देखा

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रास्ते उल्टे बताये जाएंगे
कुछ सबक यूँ भी सिखाये जाएंगे
जिनका हासिल कुछ नहीं होता कभी
फ़िर वही सपने दिखाये जाएंगे
क्या ख़बर थी असली सिक्कों की तरह
खोटे सिक्के भी चलाये जाएंगे
ख़्वाब बन कर रह गई ये आस भी
हमको अपने हक़ दिलाये जाएंगे
हाथ हर युग में कटेगें ‘हस्तीजी’
ताज जब-जब भी बनाये जाएंगे
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क्या ख़ास क्या है आम ये मालूम है मुझे
किसके हैं कितने दाम ये मालूम है मुझे
हम लड़ रहे हैं रात से लेकिन उजाले पर
होगा तुम्हारा नाम ये मालूम है मुझे
ख़ैरात मैं जो बांट रहा हूँ उसी के कल
देने पड़ेंगे दाम ये मालूम है मुझे
रखते हैं कहकहो में छुपा कर उदासियां
ये मयकदे तमाम ये मालूम है मुझे
जब तक हरा-भरा हूँ उसी रोज़ तक हैं बस
सारे दुआ सलाम ये मालूम है मुझे
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