नाना पाटेकर गुस्सा नहीं निभाते थे। वे उस आदमी को निभाते थे जिसने गुस्से का हिसाब लगा लिया है—और हिसाब जोड़कर पाया है कि सामने जो नुकसान है, उसके सामने क्रोध भी नाकाफी है। इसलिए उनका गुस्सा विस्फोट से अधिक अवशेष है। वह उस आग की तरह है जिसमें लकड़ी जल चुकी है, पर राख अभी गर्म है। वे चीखते थे तो लगता था कि वह आवाज़ अभी पूरी निकली नहीं, जो बहुत देर से भीतर घूम रही थी। वे चुप होते थे तो लगता था कि उस चुप्पी में संवाद से अधिक सामग्री है।

यही कारण है कि नाना पाटेकर के पात्रों को केवल “क्रोधित”, “आक्रामक” या “विद्रोही” कहना उनके अभिनय की प्रकृति को छोटा कर देता है। क्रोध सामान्यतः तत्काल प्रतिक्रिया है; नाना का क्रोध स्मृति से बना हुआ है। उसमें घटना से अधिक घटनाओं का संचय है। वह किसी एक अपमान का उत्तर नहीं देता; वह अपमानों की पूरी बही लेकर बैठा है। सामने वाला शायद पहली बार कोई बात कह रहा है, लेकिन नाना का पात्र उसे पहली बार नहीं सुन रहा। वह उस वाक्य के पीछे पिछले बीस वाक्य सुन रहा है। इसलिए उनकी आँखें अक्सर संवाद से पहले बोलती हैं।

1986 की अंकुश में मैंने सबसे पहले उन्हें देखा था। वह फिल्म उन्हें ऐसे युवकों के संसार में रखती है जो बेरोजगारी, शहर, व्यवस्था और अपने ही भविष्य से जूझ रहे हैं। लेकिन नाना का चेहरा उस समूह में एक महत्वपूर्ण अंतर पैदा करता है। वे केवल बेरोजगार युवक नहीं लगते; वे ऐसे युवक लगते हैं जिसने बेरोजगारी को निजी अपमान में बदलते हुए देख लिया है। उनके चेहरे पर युवावस्था की बेचैनी कम और व्यवस्था की चाल पहचान लेने की बेचैनी अधिक है। वह लड़का अभी युवा है, लेकिन उसकी आँखें युवा नहीं हैं।

यहीं से नाना पाटेकर की एक बड़ी अभिनय-परंपरा शुरू होती है—वे पात्र की उम्र से पहले उसकी थकान को पकड़ लेते हैं।

यह उनकी विशिष्टता थी। दूसरे अभिनेता अक्सर चरित्र की उम्र, सामाजिक स्थिति, पेशा और बाहरी व्यक्तित्व को ग्रहण करते हैं; नाना कई बार उसके भीतर जमा हुआ हिसाब ग्रहण करते हैं। इसलिए उनका चेहरा किसी दृश्य में यह नहीं कहता कि “मैं नाराज़ हूँ”; वह कहता है—“मैं यह सब पहले देख चुका हूँ।” और इन दोनों वाक्यों के बीच अभिनय की पूरी एक दुनिया है।

उनकी आँखों में इसलिए एक अजीब-सी गणित दिखाई देती है। वे सामने वाले को देखते हैं और जैसे तत्काल जोड़ लगाते हैं—यह आदमी क्या कह रहा है, क्यों कह रहा है, इसके पीछे क्या है, इससे पहले क्या हुआ था, और अंततः इससे मुझे क्या मिलेगा? फिर जब उस गणित का परिणाम शून्य या ऋणात्मक निकलता है, तभी उनकी आवाज़ उठती है। इसलिए नाना की आवाज़ में केवल क्रोध नहीं होता; उसमें निर्णय होता है।

शायद इसीलिए उनका सबसे प्रभावशाली अभिनय उन क्षणों में भी दिखाई देता है जब वे कुछ नहीं कर रहे होते। उनके पात्र कमरे में बैठे हों, किसी को देख रहे हों, सिगरेट पी रहे हों, चुपचाप सुन रहे हों—फिर भी दृश्य में उनकी उपस्थिति सक्रिय रहती है। अभिनेता की उपस्थिति का अर्थ केवल यह नहीं कि वह फ्रेम में है; अर्थ यह है कि दर्शक लगातार यह अनुभव करे कि उसके भीतर कुछ घट रहा है।

उनका अभिनय इस अर्थ में संवादप्रधान होते हुए भी संवाद पर निर्भर नहीं है।

यह बात परिंदा में और स्पष्ट होती है। वहाँ हिंसा केवल शारीरिक नहीं है; शहर स्वयं एक हिंसक संरचना बन जाता है। नाना का चरित्र उस संसार में केवल हिंसा करने वाला आदमी नहीं है। वह हिंसा की कीमत पहचानता है। उसके भीतर अपराधी संसार की कठोरता है, लेकिन साथ ही उस कठोरता का ज्ञान भी है। यही ज्ञान उसे महज “विलेन” या “हिंसक आदमी” बनने से बचाता है। वह जानता है कि इस दुनिया में आदमी केवल दूसरे को नहीं मारता—धीरे-धीरे अपने भीतर के किसी हिस्से को भी मारता चलता है।

नाना पाटेकर के यहाँ हिंसा का यह आत्मज्ञान बार-बार लौटता है।

हिंदी सिनेमा में क्रोध का एक लंबा इतिहास है। अमिताभ बच्चन के “क्रोधित युवक” में व्यवस्था से संघर्ष की एक नैतिक ऊर्जा थी। वह व्यवस्था से कहता था—तुमने मुझे जो दिया है, मैं उसे स्वीकार नहीं करता। उसके पास क्रोध था और क्रोध के पीछे एक दावा था: न्याय का दावा। वह व्यवस्था के सामने खड़ा होकर कहता था कि मैं तुम्हारा नियम नहीं मानता।

नाना के यहाँ स्थिति कुछ आगे की है। उनका पात्र कई बार उस मुकाम पर पहुँच चुका है जहाँ उसे पता है कि व्यवस्था गलत है, समाज पाखंडी है, निजी संबंध स्वार्थ से भरे हैं और नैतिक भाषा का इस्तेमाल भी सत्ता के लिए किया जा सकता है। इसलिए उसका क्रोध किसी नैतिक उद्घोषणा की तरह नहीं आता। उसमें नैतिक थकान भी होती है।

उनके पात्रों की सबसे बड़ी बेचैनी यह नहीं कि “मेरे साथ अन्याय हुआ”; बल्कि यह है कि “मुझे अब आश्चर्य भी नहीं होता कि अन्याय हुआ।”

इसीलिए उनके पात्रों में अक्सर एक अजीब-सी “पूर्वसूचना” होती है। दर्शक को लगता है कि यह आदमी कुछ जानता है जो अभी बाकी पात्र नहीं जानते। वह इसलिए चुप है क्योंकि वह समझ रहा है। वह इसलिए नहीं बोल रहा कि उसके पास शब्द नहीं हैं; वह इसलिए नहीं बोल रहा कि शब्दों का परिणाम वह पहले देख चुका है। और जब अंततः वह बोलता है, तो संवाद अचानक बड़ा हो जाता है। तब वह बोलता नहीं, फट पड़ता है।

उनकी अभिनय-शैली में एक तरह की अस्तित्वगत खीझ थी—जैसे आदमी केवल परिस्थितियों से नहीं, अपने होने की स्थिति से भी परेशान हो। वह दुनिया को ठीक करना चाहता है, फिर अचानक समझता है कि दुनिया को ठीक करने की उसकी क्षमता ही सीमित है। वह आदमी को बदलना चाहता है, फिर पाता है कि आदमी बदलने के बजाय अपने तर्क बदल लेता है। वह न्याय चाहता है, फिर न्याय और प्रतिशोध के बीच की दूरी खो देता है।

और शायद इसलिए उनका सबसे बड़ा अभिनय-गुण आवाज़ नहीं, चेहरा भी नहीं—स्मृति है।उनके चेहरे पर ऐसा लगता है जैसे पात्र ने बहुत कुछ देखा है और कुछ भी पूरी तरह भुलाया नहीं है।

यही अंतिम बिंदु उनके अभिनय को इतना भारतीय बनाता था । भारतीय सामाजिक जीवन में अपमान अक्सर केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं होता; वह सामाजिक स्मृति बन जाता है। गरीब आदमी के पास संपत्ति न हो, तो भी उसके पास अपमान की स्मृति होती है। बेरोजगार युवक के पास पद न हो, तो उसके पास अपनी असफलताओं का लेखा होता है। पुलिसकर्मी के पास सत्ता हो सकती है, लेकिन उसके भीतर भी अपमानित होने का इतिहास हो सकता है। अपराधी के पास भय पैदा करने की शक्ति हो सकती है, लेकिन उसके भीतर कभी भयभीत रहे आदमी की स्मृति बची रहती है।

नाना ऐसे ही मनुष्यों के अभिनेता थे।

लेखक मध्यप्रदेश के सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं )