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जड़ी बूटियाँ और हमारा देश भारत

भारतीय सभ्यता संस्कृति की परंपराओं के हर आयाम व उसके हमारे देश में चिकित्सा का इतिहास बहुत पुराना है विभिन्न क्षेत्रों मे उनके विभिन्न गुणों से भरे प्राकृतिक रूप में विकसित हर तरह के सामान्य व जंगली पेड़-पौधों का विशाल समूह हमारे राष्ट्र की धरोहर ही नहीं वरन् वर्तमान समय की ऐसी विशिष्ट उपलब्धि है जिसे आने वाली कई पीढियों तक भुलाया नहीं जा सकता है।कुदरत के दिए गए वरदानों में पेड-पौधो का महत्वपूर्ण स्थान है।ये मानव जीवन चक्र मे एक महत्वपूर्ण स्थान रखते है इसका अनुभव हम सभी को है ।

हमारे देश में देवभूमि कहलाने वाली हिमालय की पहाड़ियों से लेकर कन्याकुमारी तक फैले हर प्रकार के विशेष ही नहीं वरन् महत्वपूर्ण जंगलों का एक ऐसा विशिष्ठ समूह हमारी धरोहर है। देव भूमि कहलाने वाले हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक के जंगलों में आदिकाल से ही हमारे ऋषि-मुनियों का इस क्षेत्र मे प्रताप कुछ कम नही था ।इससे प्राप्त इस धरा की बहुत ही सुंदर जो महत्वपूर्ण व अनादिकाल से चली आ रही चिकित्सा पध्दति के लिए एक अनमोल खजाने के रूप में जडी बूटियों का विशाल भंडार उपलब्ध है।इसके हर प्रकार के रूप को व उसके गुणों को हमारे देश के महान आयुर्वेदाचार्य व हमारे ऋषि-मुनियों व उनके व्दारा अपनाए गए विभिन्न उपयोगी जडी बूटियों को कुछ इस तरह हमें बताते हुए उपलब्ध कराया है । हमारे देश की धरोहर के रूप में धन्वंतरि,चरक,च्यवन और सुश्रुत को आयुर्वेद का जनक माना जाता है जिन्होंने आयुर्वेद को एक व्यव्स्थित रूप दिया

उन्होंने पेड़-पौधो और वनस्पतियों पर आधारित एक चिकित्सा शास्त्र परिचय कराया ।महर्षि चरक को भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रर्वतको में से एक माना जाता है । उन्होंने लगभग 300-200 ईसापूर्व एक ग्रंथ आयुर्वेद पर हमें दे दिया था जिसे हम ‘’चरक संहिता’’ कहते है । कुछ ऐसी भी मान्यताएँ भी हमारे सामने आती है,जिसे हर किसी के द्वारा स्वीकार कर लेना कठिन ही लगता है ,ऐसा कहा जाता है कि आयुर्वेद का अविष्कार ऋषि-मुनियों ने मोक्ष के मार्ग में आने वाली विभिन्न बाधाओं के निराकरण के लिए किया फिर एक चिकित्सा पध्दति के रूप में सेहतमंद रहकर मोक्ष पाने के मार्ग को पाने के लिए एक दिशा है ।

चरक संहिता ने हमारे लिए बहुत कुछ दिया उसी में एक बात भी लिखी गई इंसान की सेहत व बिमारी का पहले से कोई निर्धारण नहीं होता ।इसके लिए जीवन पध्दति ही इसका मबल कारण माना केवल हमारे संयमित जीवन पध्दति ही इसका निदान है ।इनकी शिक्षा तक्षशिला में हुई ।जो वर्तमान में पाकिस्तान में है खण्हर के रूप में ,प्रचीन साहित्य यह भी बताता है की चरक शेषनाग के अवतार है ।

इसी क्रम में एक नाम और भी है जिसे सुश्रुत के नाम से जाना जाता है जिन्होने सुश्रुत संहिता के माध्यम से बहुत सारी बाते बताई है ।इन्होने 2600 वर्ष पूर्व ही शल्य चिक्तिसा ,शल्यक्रिया के लिए जाने जाते है इन्होंने अपने समय मे लगभग 125 से अधिक औजारो के माध्यम से यह किया और इन्ही के व्दार प्लास्टिकसर्जरी के सूत्र मिलते है ।आज हमारा आदुनिक विज्ञान मात्र 400 वर्ष पुराना है पर इस विज्ञान ने बहुत चमत्कार कर जीवन को सेहतमंद बने गहने और लम्बी आयु के लिए बहुत अधिक योगदान भी किया है ।यहाँ इस बात को मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि हमारी अन्य चिक्तिसा पध्दतियाँ भी बहुत विकसित है। जो आजकल हर तरह के असाध्य रोगों के इलाज के लिए उपयोगी भी है ।

इसकी हमारी वर्तमान कोरोनाकाल के समय की माँग ने तो इसके सहारे हर तरह के नये आयाम पैदा किए जिसके लिए विश्व के अनेक समपन्न देश भी नतमस्तक हुए ।इनके बताए कई तरह से उपयोगी इनके गुणों के आधार पर हमें बहुत सारी बातों का ज्ञान मिला । जिसने हमारे देश की ऐसी चिकित्सा पध्दती को जिसे आयुर्वेदिक पध्दति का स्वरूप प्रदान करते हुए इसको विश्व के कई देशों में इसके लिए नये रास्ते बनाए ।इसमें न केवल भोजन संबधी आवश्यकताओं की पूर्ती होती है,वरन् जीव जगत से नाजुक संतुलन का भी काम होता है जो कार्बन चक्र हो या भोजन श्रखला के पिरामिड में भी सबसे ऊपर का स्थान है ।कई तरह के विभाजन इनके देखने को मिलते है ।यहाँ औषधिय पौधे जिनका न सिर्फ औषधिय महत्व है बल्कि आय के भी साधन बने है ।इस तरह इनके व्दारा हमारे सीर को निरोगी बनाए रखने में इनका महत्व बहुत ही सकारात्मक व अतुलनीय है।हमारे भारतीय ग्रंथों मे जैसे पुराणो,उपनिषदों,रामायण व महाभारत आदि में इनके महत्व व उपयोग के अनेक साक्ष्य मिलते है ।भगवान लक्ष्मण की जान बचाने में हनुमान का जडी-बूटी के पर्वत लाना । यह वर्तमान में भी उतने साध्य है ये आजकल के चिक्तिसको व्दारा इनके उपयोग से पता चलता है ।इसके साथ इनके अदभुत गुणों के कारण हमारी धार्मिक आस्था के आयाम भी जुडे है ।पूजा-अर्चना के लिए उपयोगी पेड-पौधे-तुलसी,पीपल,आक,बरगद और नीम आदि।

इस तरह एक लंबी सूची इस प्रकार के औषधी वाले पौधो की है ,इसके अलावा और भी बहुत है ।हमारे देश में एक बात बहुत प्रचलित है अगर पेड पौधो के विषय में जानकार लोगों को हर पेड में कोई न कोई औषधी के गुणों का भंडार है ,ऐसा माना जाता है ।इस कोरोना काल में बहुत ज्यादा उपयोगी व सभी के मुख से हमेशा यह सुनने में आया गिलोय का सत, काढा आदि के गुणों के कारण शरीर की हमारी प्रतिरोधक क्षमता ने व हमारी भारतीय खान-पान पध्दती ने हमारे देश को इस महामारी के और अधिक विशाद से बचाने में मदद की है ।

1 . नीम (Azadirachta indica) 2. तुलसी (ocimum sanctum)3 . ब्राम्ही/ बेंग साग (hydrocotyle asiatica)4 . ब्राम्ही (cetella asiatica)5 .हल्दी (curcuma longa): 6 . चिरायता / भुईनीम (Andrographis paniculata): 7. अडूसा: 8 . सदाबहार (Catharanthus roseus) 9 . सहिजन / मुनगा(Moringa oleifera): 10. हडजोरा10.1-Tinosporacordifolia, गिलोय (tinospora cardifolia):टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया) (अन्य नाम – गुच्छ) की एक बहुवर्षिय लता होती है। इसके पत्ते पान के पत्ते की तरह होते हैं। आयुर्वेद में इसको कई नामों से जाना जाता है यथा अमृता, गुडुची, छिन्नरुहा, चक्रांगी, आदि।

बहुवर्षायु तथा अमृत के समान गुणकारी होने से इसका नाम अमृता है।’ आयुर्वेद साहित्य में इसे ज्वर की महान औषधि माना गया है एवं जीवन्तिका नाम दिया गया है। गिलोय की लता जंगलों, खेतों की मेड़ों, पहाड़ों की चट्टानों आदि स्थानों पर सामान्यतः कुण्डलाकार चढ़ती पाई जाती है। नीम, आम्र के वृक्ष के आस-पास भी यह मिलती है। जिस वृक्ष को यह अपना आधार बनाती है, उसके गुण भी इसमें समाहित रहते हैं। इस दृष्टि से नीम पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ औषधि मानी जाती है। इसका काण्ड छोटी अंगुली से लेकर अँगूठे जितना मोटा होता है। बहुत पुरानी गिलोय में यह बाहु जैसा मोटा भी हो सकता है ।कोरोना काल ने इस औषधि पेड रूपी लता का परिचय कराया ।वास्तव में ये कई रोगों का शमन एक साथ करती है।शरीर से अतरिक्त चर्बी को तो हटाती ही है,साथ ही साथ पित्त तथा कफ तक को संतुलित भी करती है। 10.2 Vitis quadrangularis: हडजोरा का यह एक प्रकार है।11. करीपत्ता (Maurraya koengii): 12. दूधिया घास (Euphorbia hirat) 13. मीठा घास(Scoparia dulcis )14. भुई आंवला (phyllanthus niruri):15. अड़हुल (Hisbiscus rosasinensis):

16. घृतकुमारी/ घेंक्वार (Aloe vera):17. महुआ (madhuka indica):18. दूब घास ( cynodon dactylon)19. आंवला (Phyllanthus emblica) 20. पीपल (Ficus religiosa)

21. लाजवंती/लजौली (Mimosa pudica): 22. करेला (Mamordica charantia) 23. पिपली (Piperlongum) 24. अमरुद (Psidium guayava) 25. कंटकारी/ रेंगनी (Solanum Xanthocarpum)26. जामुन (Engenia jambolana) 27. इमली (Tamarindus indica) 28. अर्जुन (Terminalia arjuna) 29. बहेड़ा (Terminalia belerica)30. हर्रे (Terminalia chebula) 31. मेथी (Trigonella foenum) 32. सिन्दुआर/ निर्गुण्डी (Vitex negundo) 33. चरैयगोडवा (Vitex penduncularis) 34. बैर (ज़िज्य्फुस jujuba) 35. बांस (Bambax malabaricum) 36. पुनर्नवा / खपरा साग (Boerhavia diffusa) 37. सेमल (Bombax malabaricum) 38. पलाश (Butea fondosa)39. पत्थरचूर (Coleus aromaticus) 40. सरसों (Sinapis glauca) 41. चाकोड़ (Cassia obtusifolia) 42. मालकांगनी/ कुजरी (Celastrus paniculatus)43. दालचीनी (Cinnamonum cassia): 44. शतावर (Asparagus racemosus)

45. अनार (punica granatum)46. अशोक (Saraca indica) 47. अरण्डी/ एरण्ड (Ricinus communis)48. कुल्थी/ कुरथी (Dolichos biflorus) 49. डोरी (Bassia latifolia)50. चिरचिटी( Achyranthes aspera) 51. बबूल (Acacia arabica)52. कटहल (Artocarpus integrifolia)

(52)दाल चीनी (53)लौंग (54)अदरक(55)अश्वगंधा (56)ऐलोवेरा(57)इसबगोल(58)सब्जा(59)मेंहदी की पत्तियाँ आदि ।

( लिंगम चिरंजीव राव आंध्र प्रदेश में रहते हैं व हिंदी प्रेमी हैं)

संपर्क
म.न.11-1-21/1 , कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (532 312)
(आन्ध्रप्रदेश)

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