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हिन्दी वालों मौका है, नई शिक्षा नीति में हिन्दी को अँग्रेजों के चंगुल से मुक्त करो​

आश्चर्य है कि मैकाले की शिक्षा नीति से न न कहते कहते प्यार हो गया । घूमा फिरा के बात हो रही है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा में अँग्रेजी एक अनिवार्य विषय हो । दलीलें दी जा रही हैं कि अँग्रेजी में इंटेरनेट यूजर्स की बढ़ती संख्या की, विज्ञान साहित्य की उपलब्धि की, नौकरी पाने की । जापान, फ्रांस, जर्मनी आदि विकसित देशों ने अपनी भाषा में ही उत्कृष्ट विकास किया । इनके बहुत थोड़े लोगों ने अँग्रेजी अथवा अन्य विदेशी भाषा को इंटरफ़ेस भाषा की भाँति सीखा, और अच्छा खासा काम चलाया । 90%-95% शिक्षित लोग देश में ही रह जाते हें ; 5%-10% ही बाहर जाते हैं । हमारी पीढ़ी के छात्रों ने अंग्रेजी कक्षा 5 के बाद ही सीखी, आज उन सभी का देश विदेश में महत्व पूर्ण योगदान रहा है, उच्च पदों पर उत्कृष्ट सेवाएँ दी हैं ।

प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई का बोझ कम से कम हो ।

बच्चों के और समाज के आविष्कारोन्मुखी प्रवृति और इन्नोवेशन स्किल के विकास से ही राष्ट्र का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक विकास संभव है । यह मातृभाषा / लोक भाषा से ही सुनिश्चित कर सकते हैं ।

प्राथमिक स्तर की शिक्षा में अँग्रेजी एक अनिवार्य विषय होने से मनोवैज्ञानिक प्रवृति होगी कि हिन्दी / भारतीय भाषा में रुचि न लेकर अँग्रेजी की रटन्ति विद्या लें । अपनी भाषा के प्रति हीनभाव जड़ पकड़ेगा । विद्यार्थी समाज से कट जाएगा । शिक्षा की उपादेयता पर प्रश्न होंगे ।

सुझाव हो कि तकनीकी, प्रबंधन, आयुर्विज्ञान के डिग्री प्रोग्राम में प्रथम वर्ष में पढ़ाई इंग्लिश और हिन्दी / भारतीय भाषा में हो, इससे संकल्पनाओं को भली भांति समझने में आसानी होगी । डिप्रेशन, आत्महत्या, ड्रॉप आउट के केस नहीं होंगे ।

विचारार्थ निवेदन है ।
सविनय ….. ओम विकास
[email protected]
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ओम विकास जी आपसे पूरी तरह सहमत..कृपया शिक्षा मंत्रालय को इन विचारों को भेजें .अंग्रेजी प्राथमिक स्तर पैर कतई मंजूर नहीं .सरकार को यह बात कड़क सब्दों में बताने की जरुरत है .
प्रेमपाल शर्मा

डॉ. अमरनाथ ​
1. इस विषय में मैं प्रेमपाल शर्मा के सुक्षावों से सहमत हूं. दसवीं तक मातृभाषाओं में शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए. लेकिन एक समय सीमा के भीतर उच्च शिक्षा, कानून की शिक्षा यहाँ तक कि तकनीकी और मेडिकल आदि की शिक्षा भी मातृभाषाओं में देने की व्यवस्था होनी चाहिेए ताकि जो विद्यार्थी मातृभाषाओं में उच्च शिक्षा लेना चाहें उन्हें किसी तरह की असुविधा न हो. और वह समय सीमा भी पाँच वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए नहीं तो राजभाषा अधिनियम 1963 की तरह वह समय कभी खत्म ही नहीं होगा.

2. डॉ.विजयकुमार मल्होत्रा के विचार तो चौंकाने वाले हैं. वे तो देश के काले अंग्रेजों की भाषा बोल रहे हैं. उनका तर्क कि भारत जैसे विकासशील देश में आधुनिक ज्ञान विज्ञान की शिक्षा देने के लिेए अंग्रेजी आवश्यक ही नही अपरिहार्य है- से लगता है कि वे भारत को सदा विकासशील देश ही बनाए रखना चाहते हैं. क्या दुनिया में कोई ऐसा देश भी है जो दूसरे की भाषा में शिक्षा ग्रहण करके विकसित हो सका है? अमेरिका, इंग्लैण्ड, रूस फ्रांस, जर्मनी, जापान से लेकर चीन तक सभी अपनी भाषा में शिक्षित होकर महाशक्ति बन सके हैं. यदि दुनिया की सबसे कठिन लिपियों में से एक चीनी लिपि और चीनी भाषा में आधुनिक ज्ञान विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई हो सकती है तो हिन्दी और उसकी सबसे वैज्ञानिक लिपि देवनागरी में क्यों नहीं.? मल्होत्रा जी के सुक्षाव कि प्राथमिक स्तर से ही अंगेरेजी अनिवार्य होनी चाहिेए – से किसी भी तरह वह व्यक्ति सहमत नहीं हो सकता जो इस देश से प्यार करता है और इसका विकास चाहता है. हमारे बच्चों को विदेशी भाषा के जुए से अब मुक्त करने का समय आ गया है, अब और उसे गधे की तरह मत जोतिए.

3. आज भी अलगाववादी ताकतें देश के कोने कोने में सक्रिय हैं. कश्मीर और उत्तरपूर्व के कई राज्यों की दशा छिपी नहीं है. इस देश की एकता और अखंडता के लिेए एक मजबूत संपर्क भाषा अनिवार्य है और वह आतंक की भाषा अंग्रेजी नहीं, जन जन की भाषा हिन्दी ही हो सकती है. इसलिेए राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिक कक्षाओं में,हिन्दी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिेए. इस विषय में मेरा सुक्षाव है कि –

क. दर्जा पाँच तक सिर्फ मातृभाषा की और मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए ख. छठीं कक्षा से दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी होनी चाहिेए और ग. तीसरी भाषा अंग्रेजी या संस्कृत होनी चाहिेए. मांग बढ़ने पर सारा तकनीक और पाठ्यक्रम अपनी भाषाओं में उपलब्ध होते देर नहीं लगेगी.

4. दोहरी शिक्षा व्यवस्था पर अंकुश लगनी चाहिेए. गरीबों के लिेए घटिया और बदहाल शिक्षा तथा अमीरों के लिेए पांचसितारा शिक्षा बंद होनी चाहिेए. इस देश के गरीब का बच्चा भी प्रतिभाशाली हो सकता है और उसे पढ़ने का अधिकार है क्योंकि वह भी इसी देश का नागरिक है. इसलिेए जितना जल्दी हो, शिक्षा की खरीद- फरोख्त बंद होनी चाहिए. इसके लिेए शिक्षा के लिेए बजट बढ़ाएं, उसे जितना जल्दी हो, निजी क्षेत्र से निकालकर सार्वजनिक क्षेत्र में लाया जाना चाहिए. इस दृष्टि से पश्चिम के देश हमारे आदर्श नहीं बन सकते. हमारा अतीत अत्यंत उज्वल है हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें अच्छा मनुष्य बनाने पर जोर देने वाली रही है. हमें वही चाहिेए जिस पर हम गर्व करते रहे हैं.

डॉ. कामिनी. गुप्ता
भारतीय भाषाओं संस्कृति के संबंध में अनेक सुझाव इस समूह पर प्रस्तुत किए गए हैं, यह सराहनीय है। भावी पीढ़ियों में देश-प्रेम की भावना जागृत करने की दृष्टि से निम्न सुझाव समूह से सदस्यों के विचारार्थ प्रस्तुत कर रही हूँ।

1. आज से पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व तक बच्चे जो आज प्रौढ़ या वृद्ध हो चले हैं वे देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत होते थे क्योंकि उस समयपाठ्य पुस्तकों में देश-प्रेम की पाठ्य-सामग्री प्रचुर मात्रा में होती थी । बाद में विशेषकर अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों की बाढ़ के पश्चात बाद धीरे-धीरे पाठ्य पुस्तकों से देश-प्रेम की
पाठ्य-सामग्री गायब होती गई। इसके परिणामस्वरूप बाद की पीढ़यों में देश-प्रेम की वैसी भावना अब कम ही देखने को मिलती है। इसलिए योजनाबद्ध तरीके से स्कूली पाठ्यक्रम में विशेषकर प्राथमिक व माध्यमिक कक्षाओं देश-प्रेम की भावना जागृत करनेवाली पाठ्य-सामग्री का समावेश किया जाए ।

2. इसी प्रकार पहले बच्चों को अनेक देश-प्रेम के गीत व कविताएँ याद होती थीं लेकिन अब यह देखने में आता है कि बच्चों को देश-प्रेम के गीत व कविताएँ बिल्कुल नहीं आती। इसलिए सरकारी अथवा निजी स्कूल सभी के लिए कक्षाएँ प्रारंभ होने के पूर्व प्रार्थना के समय राष्ट्रगान और देश प्रेम के कोई दो गीतों का देश की भाषाओं मे गायन अनिवार्य किया जाए । इसी प्रकार स्वतंत्रता दिवस. गणतंत्र दिवस आदि राष्ट्रीय त्यौहारों पर भी देश-प्रेम के गीतों , कविताओं के गायन, एकांकी, नाटक आदि के कार्यक्रम आदि आयोजित किए जाने संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ । अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूल अक्सर इससे बचते हैं अत: उन पर कड़ी नजर रखी जाए।

सभी से अनुरोध है कि अपने सुझावों में देश-प्रेम व देश की भाषाओं के शिक्षण व मातृभाषा माध्यम से शिक्षण के सुझावों को अवश्य जोड़ें। हिंदी व मातृभाषा प्रेम का दावा करनेवाले शिक्षक, साहित्यकार, पत्रकार आदि भी अपने सुझाव भेजें ।

पत्रकार व संपादक आदि पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों की भी जागरूक करें।

डॉ. इंदुप्रकाश पाण्डेय
यह आधा-अधूरा नयी शिक्षा नीति का प्रस्ताव अंग्रेज़ी को स्थापित करने का प्रयत्न है. इस से न तो हिंदी का काम बनता है और न शिक्षा का. देश के लिए यह बेकार की कसरत है. अगर पहली कक्षा से हिंदी को अनिवार्य करते तो देश की शिक्षा नीति होती.

दूसरी बात जो और भी अधिक महत्व की है, वह है लाखों रुपयों की कैपीटेशन फीस. जब तक इस पद्धति का चलन रहेगा, शिक्षा केवल अमीरों के लिए रहेगी और देश के ग़रीबों के लिए बहुत दूर.
मैं यह विचार प्रचारित करने के लिए भेज रहा हूँ.
संपर्क
डॉ. इंदुप्रकाश पाण्डेय, जर्मनी
[email protected]
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प्रो. पुष्पेन्द्र दुबे
इस देश की सबसे बड़ी गलती यही है कि इसने अपनी शिक्षा नीति को तय करने का भार सरकार को दे दिया है। भारत में शिक्षा कभी भी राजा अथवा सरकार के हाथ में नहीं रही। यद्यपि सारी व्यवस्था राज्य ही करता रहा है। संस्कृत इस देश की कभी राष्ट्रभाषा रही है। इसमें उच्च कोटि के ज्ञान का विकास भारत ने किया। वास्तव में आज सरकार से शिक्षा छीन लेना चाहिए। शिक्षा समाज के हाथ में होना चाहिए। आज हमने शिक्षा के सारे इन्तजाम प्रतिनिधियों पर छोड़ दिए हैं। हम अपनी बुद्धि से नहीं सोचते हैं। सरकार अस्पताल खोल सकती है, लेकिन उसमें ​प्रेमपूर्वक सेवा करना नहीं सिखा सकती। सरकार कॉलेज खोल सकती है , लेकिन ज्ञान लालसा, निरंतर अध्ययनशीलता निर्माण नहीं र सकती। गुण वर्धन करना जनता का काम है।

सरकार गुण वर्धन नहीं कर सकती। विनोबा के शब्दों में ‘सरकार ऐसी भयानक वस्तू है कि उससे भयानक दूसरी चीज नहीं। समाज को उसने इतना नियंत्रित कर दिया है कि कुल लोगों की सत्ता मुट्ठीभर लोगों ने अपने हाथ में रखी है। लोग दींन हीन लाचार रहते हैं। सरकार यानी सर्वकार। सब कुछ सरकार को ही करना है। आज सारी दुनिया सरकार रूपी रोग से पीड़ित है। हिन्दुस्तान का समाज जहां-जहां आगे बढ़ा , वहां-वहां सत्पुरुषों के जरिये ही आगे बढ़ा। बुद्ध-महावीर का असर आज भी भारत पर दीखता है। वह उनके जमाने के किसी भी राजा का नहीं। कबीर और तुलसीदास का जो प्रभाव आज उत्तरप्रदेश पर है , वह वहां के किसी भी राजा का नहीं है। चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस और रविन्द्रनाथ का बंगाल पर जो असर है , वह किसी राजा का नहीं है। वैसे शंकर, रामानुज, माणिक्यवाचकर और नाम्म्ल्वार का तमिलनाड पर आज तक जो असर है , वह न किसी पांड्य का है, पल्लव का है , न चोल राजा का है।

सरकार विषयक भ्रम का दूर होना आवश्यक है। शिक्षा को अविलम्ब सरकार से मुक्त करना चाहिए।
​ प्रो. पुष्पेन्द्र दुबे
[email protected]

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लोचन मखीजा
“नयी शिक्षा नीति 2016” का प्रस्ताव-प्रारूप अंग्रेजी में जनता के सुझावों के लिए जारी कर दिया है। इसमें पहली कक्षा से अंग्रेजी अनिवार्य विषय प्रस्तावित है। राज्य चाहें तो मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा दे सकते हैं। भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा पर कोई विचार नहीं किया गया है। ३१ जुलाई अंतिम तिथि है सुझावों के लिए।
✅प्रस्तावित नीति का मसौदा www.mhrd.gov.in पर अवलोकनार्थ उपलब्ध है।

✅यह अभी मात्र प्रस्ताव है और इस पर सभी लोगों, आम जनता से सुझाव, टिप्पणियाँ मांगी गई हैं, उन पर विचार करने के बाद ही इसे अंतिम रूप दिया जाएगा।

✅अतः यदि हम भारतीय-भाषाओं से वास्तव में प्रेम करते हैं तो इस प्रस्ताव को पढ़ कर, भारतीय-भाषा-विरोधी इस प्रस्तावित-नीति के प्रति समुचित रूप से ऑनलाइन या मंत्रालय को पत्र लिख कर विरोध दर्ज कराना हमारा मात्र कर्तव्य ही नहीं, अधिकार भी है।

✅ जागो-जागो-जागो…….समय कम है… आखिरी तारीख 31 जुलाई 2016 है…… एक बार नीति बन गई…. तो फिर बाद में ना कहना कि हमें तो मालूम ही नहीं पड़ा…. साँप निकल जाने के बाद लकीर पीटना हमारी फितरत न बन जाए ….

✅अंग्रेज़ीपरस्त और भारतीय-भाषा-विरोधी-वर्ग, अधिक सक्रिय व चुस्त है….. उसने इस प्रस्ताव में भी अपनी व्यवस्था चुपचाप-से कर ली है….

✅आम भारतीय को यह समझना चाहिए और समय रहते इसका उचित स्थान (उक्त मंत्रालय व उसकी वैबसाइट) पर अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए, जरूरी सुझाव देना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी की शिक्षा-नीति में भारतीय-भाषाओं का उचित व सम्मानजनक स्थान बना रहे।

✅ध्यान रहे- अंतिम तारीख- 31-07-2016 है।

संपर्क
डॉ. अमरनाथ,
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय तथा अध्यक्ष, अपनी भाषा.
[email protected]
डॉ. कामिनी. गुप्ता

[email protected]

(लोचन मखीजा – लोचनम्), पुणे

[email protected]

प्रस्तुति-संपादन

डॉ. एमएल गुप्ता ‘आदित्य’

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कपिल शर्मा का यह वीडियो अवश्य देखें।

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वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
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वेबसाइट- वैश्विकहिंदी.भारत / www.vhindi.in

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