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विश्व का सर्वाधिक न्यायपूर्ण और स्वतंत्र समाज रहा है हिन्दू समाज

इसमें मुख्य बात यह है कि धर्मशास्त्रों में जो व्यवस्थायें हैं, वे जाति व्यवस्था को अत्यधिक गतिशील और व्यापक व्यवस्था सिद्ध करते हैं जिसमें कई प्रकार की उन्नति और अवनति व्याख्यायित है। साथ ही इन विषयों में धर्मशास्त्रों के प्रतिपादन भी अनेक प्रकार के हैं। इससे स्पष्ट है कि यह एक अत्यन्त गतिशील और व्यापक व्यवस्था का प्रतिपादन है। नितांत रूढ़ और संकीर्ण समाज व्यवस्था वाले यूरोपीय ईसाइयों और अन्य समुदायों को यह गतिशीलता समझ में नहीं आती।

इस संदर्भ में श्रेणी, पूग, गण, व्रात एवं संघ शब्दों की जानकारी आवश्यक है। कात्यायन के मतानुसार ये सभी समूह या वर्ग कहे जाते थे:-
‘गणाः पाषण्डपूगाश्च व्राताश्च श्रेणयस्तथा। समूहस्थाश्च ये चान्ये वर्गाख्यास्ते बृहस्पतिः।। स्मृतिचन्द्रिका (व्यवहार) में उद्धृत कात्यायन-वचन।’

पाणिनि ने पूग, गण, संघ, व्रात की व्यत्पत्ति आदि की है। पाणिनि के काल तक इन शब्दों के विशिष्ट अर्थ स्थिर हो गये थे। महाभाष्य ने व्रात को उन लोगों का दल माना है, जो विविध जातियों के थे और उनके कोई विशिष्ट स्थिर व्यवसाय नहीं थे, केवल अपने शरीर के बल से ही अपनी जीविका चलाते थे। काशिका ने पूग को विविध जातियों के उन लोगों का दल माना है, जो कोई स्थिर व्यवसाय नहीं करते थे।

कौटिल्य ने एक स्थान पर सैनिकों एवं श्रमिकों में अन्तर बताया है, और दूसरे स्थान पर यह कहा है कि कम्बोज एवं सुराष्ट्र के क्षत्रियों की श्रेणियाँ आयुधजीवी एवं वार्ता (कृषि) जीवी है। वसिष्ठ धर्मसूत्र ने श्रेणी एवं विष्णुधर्मसूत्र ने गण का प्रयोग संगठित समाज के अर्थ में किया है। मनु ने संघ का प्रयोग इसी अर्थ में किया है। विविध भाष्य-कारों ने विविध ढंग से इन शब्दों की व्याख्या उपस्थित की है।

कात्यायन के अनुसार नैगम एक ही नगर के नागरिकों का एक समुदाय है, व्रात विविध अस्त्र धारी सैनिकों का एक झुंड है, पूग व्यापारियों का एक समुदाय है, गण ब्राह्मणों का एक दल है, संघ बौद्धों एवं जैनों का एक समाज है, तथा गुल्म चाण्डालों एवं श्वपचों का एक समूह है। वस्तुतः गणतंत्र का अर्थ है ब्राह्मणों के द्वारा प्रतिपादित सनातन धर्म के अनुसार चलने वाला तंत्र। वर्तमान में इसका यूरोप के रिपब्लिक के अर्थ में प्रयोग होता है। भारतीय अर्थ में नहीं।

याज्ञवल्क्य ने ऐसे कुलों, जातियों, श्रेणियों एव गणांे को दण्डित करने को कहा है, जो अपने आचार-व्यवहार से च्युत होते हैं। मिताक्षरा ने श्रेणी को पान के पत्तों के व्यापारियों का समुदाय कहा है और गण को हेलावुक कहा है। हेला का अर्थ है घोड़े। घोड़ो के व्यापारियों को हेलावुक कहते हैं। यहाँ गण का प्रयोग कात्यायन से नितान्त भिन्न अर्थ में है। क्योंकि गण का यह अर्थ होने पर गणतंत्र का अर्थ होगा घोड़े के व्यापारियों का तंत्र, जो दूरागत अर्थ में अंग्रेजों पर लागू हो सकता है। क्योंकि वे आरंभ में घोड़ों पर चढ़कर ही व्यापार करते थे और लड़ाइयां भी।

याज्ञवल्क्य एवं नारद ने श्रेणी, नैगम, पूग, व्रात, गण के नाम लिये हैं और उनके परम्परा से चले आये हुए व्यवसायों की ओर संकेत किया है। याज्ञवल्क्य ने कहा है कि पूगों एवं श्रेणियों को अपने-अपने समूह के भीतर के झगड़ों और विवादों पर निर्णय देने का पूर्ण अधिकार है और इस विषय में पूग को श्रेणी से उच्च स्थान प्राप्त है। मिताक्षरा ने इस कथन की व्याख्या करते हुए लिखा है कि पूग एक स्थान की विभिन्न जातियों एवं विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों का एक समुदाय है और श्रेणी विविध जातियों के लोगों का समुदाय है, जैसे हेलावुकों, ताम्बूलिकों, कुविन्दों एवं चर्मकारों की श्रेणियां। चाहमान विग्रहराज के प्रस्तरलेख में हेड़ाविकों को प्रत्येक घोड़े के लिये एक द्रम्म देने का उल्लेख है। (एपिग्रैफिया इण्डिका, जिल्द 2, पृष्ठ 124।)

एपिग्रैफिया इण्डिका में जिल्द 8 के पृष्ठ 88 में नासिक का एक अभिलेख उद्धृत है जिसके अनुसार राजा ईश्वर सेन के राज्य मेें कुम्हारों, तेलियों और यंत्र से पानी देने वालों (उदक-यंत्र-श्रेणी)की अलग-अलग श्रेणियां थीं। जिनके पास उनकी अपनी स्थिर सम्पत्तियां थीं। जिनके ब्याज से अस्वस्थ होने वाले भिक्षुओं का उपचार किया जाता था और अन्य सेवाकार किये जाते थे। एक अन्य शिलालेख में जुलाहों की श्रेणियों का भी उल्लेख नासिक की गुफाओं में है।

हुविष्क के शासन काल में आटा बनाने वाले (समित कर) लोगों की समिति का उल्लेख शिलालेख में है। इसी प्रकार जुन्नारगढ़ की गुफा के एक शिलालेख में ताम्रकारों, कांस्यकारों और बसोड़ों का यानी बांस का कार्य करने वालों का उल्लेख है। सम्राट स्कन्धगुप्त के इन्दौर ताम्रपत्र में तेलियों की एक श्रेणी का उल्लेख है। इन सब श्रेणियांे और संघों में राजा लोग भी तथा अन्य महाजन लोग भी धन जमा करते थे। जिस काम के लिये धन जमा किया जाता था, उसका स्पष्ट उल्लेख किया जाता था। शिलालेखों में इस प्रकार के स्पष्ट उल्लेख हैं।

इससे प्रामाणित है कि ईसा पूर्व से भारत में अनेक जातियों के समुदाय इतने अधिक व्यवस्थित और संगठित थे कि सम्पन्न लोग भी और राजा लोग भी तथा अन्य सर्वसाधारण भी उनके पास धन जमा करते थे और ब्याज सहित वह धन सुरक्षित रहता था जो समय-समय पर लोक-कल्याण के अलग-अलग कार्यों में उन लोगों द्वारा लगाया जाता था जो धन जमा करते थे।

इस प्रकार इस बात के भरपूर और प्रचुर प्रमाण हैं कि जातियां कुलों और व्यवसायों का ऐसा व्यवस्थित तथा सर्वमान्य समूह हैं जो ईसाइयत या इस्लाम आदि के जन्म से हजारों हजार साल पहले से अत्यन्त व्यवस्थित रहे हैं, जो पूरी तरह सार्वभौमिक अनुशासनों की मर्यादा में अर्थात् मानव धर्म की मर्यादा में स्वतंत्र रूप से अपने-अपने नियम और व्यवहार की विधियां बनाते रहे हैं, जिनमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप का कोई भी विचार भारत का कोई हिन्दू शासक कभी भी नहीं करता था और न कर सकता था। यह है स्वतंत्रता का मूल स्वरूप। राज्यकर्ता कोई समूह अपने दिमाग की खुजली से या अपनी काल्पनिक मान्यताओं से या ईसाइयों और मुसलमानों की प्रेरणा से या ईसाइयों की प्रबुद्ध शाखाओं (प्रबुद्ध यूरोपीय) अथवा बर्बर शाखाओं (कम्युनिस्ट) की प्रेरणा से कोई कानून बनाये और उसे भारत की जातियों, श्रेणियों, संघों, गणों, पूगों, व्रात आदि पर थोपे, यह भीषण अत्याचार हिन्दू धर्म ने और हिन्दू राज्य परम्परा में अकल्पित रहा है।

(लेखक भारतीय राष्ट्रीय व अध्यातममिक विषयों पर शोधपूर्ण लेख लिखते हैं, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद से सेवा निवृत्त हुए हैं)

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