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मृत महापुरुषों की आत्मा से संपर्क कैसे करें ?

यह जान कर आपको हैरानी होगी कि महावीर के मर जाने के पांच सौ वर्ष बाद तक, महावीर अपने प्रेमियों से, कुछ लोगों से संबंध स्थापित किए रहे। और इसीलिए पांच सौ वर्ष बाद महावीर के ग्रंथ लिखे गए। और तब लिखे गए ग्रंथ, जब इसकी संभावना खतम हो गई कि अब कोई आदमी इस योग्य नहीं है जिससे अंतर्संबंध रखे जा सकें। और वाणी खो जाएगी, इसलिए लिख ली जाए।*

हजारों साल तक ग्रंथ लिखे ही नहीं गए। और वे इसीलिए नहीं लिखे गए कि जब तक इस बात की संभावना थी कि मरे हुए व्यक्ति और मरे हुए ज्ञानी से भी संबंध स्थापित रखा जा सकता है, तब तक किताब लिखने की कोई जरूरत न थी। यह जान कर आप हैरान होंगे कि किताब लिखना सिर्फ विकास ही नहीं है, एक लिहाज से पतन भी है। हजारों साल तक वेद लिखा नहीं गया था। हजारों वर्ष तक कोई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे नहीं गए थे। ग्रंथ लिखे गए मजबूरी में! महावीर के मरने के पांच सौ साल तक किताब लिखने की जरूरत नहीं पड़ी। क्योंकि महावीर से पूछा जा सकता था। लेकिन जब उस योग्यता के व्यक्ति खो गए, फिर उन ग्रंथों को लिख लेना जरूरी हो गया।

बुद्ध के मरने के डेढ़ सौ वर्ष बाद ग्रंथ लिखे गए। और जीसस के संबंध में तो बात और भी अदभुत है। और यह भी मैं कहना चाहता हूं कि आज महावीर से संबंध स्थापित करने वाला महावीर के साधुओं में एक भी आदमी नहीं है। लेकिन बुद्ध से संबंध स्थापित करने वाले साधु आज भी मौजूद हैं। और जीसस से संबंध स्थापित करने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। और जिस धर्म के मूलस्रोत से संबंध स्थापित करने की संभावना रहती है, वह धर्म तब तक जीवित मालूम पड़ता है। और जैसे ही संबंध नष्ट हो जाता है, वह जीवित संबंध नष्ट हो जाता है।*

यह भी मैं आपसे कहना चाहता हूं कि गांधी जिंदगी भर मेहनत किए, लेकिन उन्होंने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया कि उनके पास एक भी आदमी नहीं है, जिससे मर जाने के बाद वे संबंध स्थापित कर सकें।*

लेकिन ऐसा नहीं है कि यह महावीर-बुद्ध ने ही किया, आज भी जारी है। ब्लावट्स्की के मर जाने के बाद एनीबीसेंट से ब्लावट्स्की के संबंध जारी रहे। एनीबीसेंट के मर जाने के बाद भी जे. कृष्णमूर्ति से एनीबीसेंट के संबंध आंतरिक जारी हैं। लेकिन कृष्णमूर्ति थियोसॉफी के बाहर पड़ गए। और थियोसॉफी का मूवमेंट मर गया, क्योंकि थियोसॉफी के भीतर किसी आदमी से एनीबीसेंट के, ब्लावट्स्की के संबंध आज जारी नहीं हैं।*

मरे हुए व्यक्तियों से भी संबंध जारी रखे जा सकते हैं। बल्कि जिंदा व्यक्तियों से संबंध रखने में बहुत अड़चन होती है, क्योंकि शरीर हमेशा बाधा की तरह खड़ा हो जाता है। पूछ ही लिया है, इसलिए मैं कहता हूं कि जिंदा में गांधी से मेरे कोई संबंध नहीं थे। लेकिन मरने के बाद, इधर मैंने संबंध जारी रखने की पूरी कोशिश की है। और यह भी मैं आपसे कह देना चाहता हूं कि थोड़ा सा प्रयोग करें तो किसी भी व्यक्ति से संबंध जारी रखे जा सकते हैं।*

और यह भी मैं आपको बताना चाहता हूं कि गांधी का अभी कोई जन्म नहीं हो गया है। और जन्म होना बहुत मुश्किल है। क्योंकि कोई गर्भ इस योग्य नहीं कि उस व्यक्ति को जन्म दे सके। बहुत लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।*

लेकिन ये दूसरी बातें हैं। और इसलिए इनकी बात कभी नहीं करता हूं, क्योंकि इन बातों के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता, कुछ भी नहीं सोचा जा सकता और इन बातों के संबंध में कोई प्रमाण नहीं दिया जा सकता है। इसलिए इनको छोड़ देता हूं। लेकिन पूछ लिया गया इसलिए मैंने कहा। और यह मैं कह देना चाहता हूं कि मैंने गांधी की आलोचना, गांधी से बिना पूछताछ के नहीं की है। अन्यथा मैं कभी नहीं करता; उसकी बात भी नहीं उठाता। और जब मुझे यह पक्का मालूम हो गया कि आलोचना की जानी चाहिए और गांधी की सहमति हो सकती है, तभी उस पर बात की।*

लेकिन इधर मुझे ऐसा लगता है कि बेकार है मेहनत करनी! गांधी के साथ मेहनत करनी बेकार मालूम पड़ती है! उनके शिष्यों ने उस आदमी को बिलकुल मरा हुआ समझ लिया है। इसलिए अब मरे हुए आदमी की बात करनी शायद उचित नहीं है। क्योंकि वे बार-बार मुझे लिखते हैं कि जो आदमी मर गया, उसकी आप बात क्यों उठाते हैं?*

गांधी जैसे आदमी मर नहीं जाते! लेकिन समझ में नहीं आता लोगों को कि ऐसे लोगों को भी मरा हुआ मान लेते हैं। और उसका कारण है, क्योंकि कोई भी उनके साथ जीवित संपर्क स्थापित नहीं कर सकता है, तो लगता है कि वे मर गए।*

इधर मेरी पूरी चेष्टा है कि कुछ लोग तैयार हों, तो जो मैं कह रहा हूं, उनको प्रायोगिक प्रमाण उसके दिलवाए जा सकें, उनके संबंध स्थापित करवाए जा सकें। लेकिन तैयारी तो बहुत दूर की बात है, बहुत दूर की बात है, मेरे पास आने में ही हजार बाधाएं खड़ी करने की कोशिश की जाएगी। तो बहुत गहरे तल पर जो इजोटेरिक वर्क हो सकता है, जो बहुत गहरे तल पर नये संवेदना के स्रोत खोले जा सकते हैं, उनसे कोई संबंध ही स्थापित नहीं हो पाता है।*

यह पृथ्वी रोज-रोज दरिद्र होती चली जाती है, क्योंकि इस पृथ्वी के पास अपनी ही श्रेष्ठतम आत्माओं से, जो अब भी मौजूद हैं, संबंध के सारे स्रोत शिथिल हो गए हैं। वे संबंध के स्रोत पुनरुज्जीवित किए जाने जरूरी हैं। लेकिन हमें तो सब ऊपर से दिखाई पड़ता है, भीतर से हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि भीतर की हमारी कोई दुनिया ही नहीं है। वहां देखने का कोई सवाल नहीं है।*

ओशो की पुस्तक तृषा गयी एक बून्द से साभार

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