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अध्यात्म गंगा
 

  • विवाह करके लड़कियों को ही पति के घर क्यों जाना होता है ?

    विवाह करके लड़कियों को ही पति के घर क्यों जाना होता है ?

    अंशु अपने को एक सतत जिज्ञासु कहती हैं। वर्तमान में संस्कृति आर्य गुरुकुलम में शिष्य तथा शिक्षक हैं। दर्शन, वैदिक शिक्षा और आयुर्वेद गुरुकुल में शिक्षण के मुख्य विषय हैं।

  • नींद से जगा देता है दुख का पहाड़ !

    नींद से जगा देता है दुख का पहाड़ !

    महात्मा बुद्ध ने वर्तमान का सदुपयोग करने की शिक्षा दी है। बुद्ध ने अतीत के खंडहरों और भविष्य के हवा महल से निकाल कर मनुष्य को वर्तमान में खड़ा रहने की शिक्षा दी है।

  • भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा के कुछ रोमांचक व रहस्यमयी तथ्य

    भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा के कुछ रोमांचक व रहस्यमयी तथ्य

    रथ यात्रा का महोत्सव 10 दिनों का होता है जो शुक्ल पक्ष के 11वें दिन समाप्त होता है। इस महोत्सव में देवों की प्रतिमाओं को रथों में बैठाया जाता है, जिस प्रक्रिया को महेंद्र महोत्सव कहा जाता है।

  • गर्भ संस्कार के भारत के प्राचीन विज्ञान के रहस्य

    गर्भ संस्कार के भारत के प्राचीन विज्ञान के रहस्य

    आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की हज़ारों वर्षों पहले, जब किसी प्रकार की सोनोग्राफी आदि के यंत्र के आविष्कार की कल्पना भी नहीं थी, तभी ऋषि-मुनियों ने विस्तृत कर दिया था

  • सत्य से संचित शक्ति का वैभव

    सत्य से संचित शक्ति का वैभव

    सत्य से संचित शक्ति का वैभव - डॉ. चन्द्रकुमार जैन गांधीजी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग की बानगी है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वस्तुतः उनका जीवन और सत्य एक दूसरे के पर्याय हैं। सत्य उनके लिए कसौटी था। सत्य का आनंद ही उनका परम ध्येय था। बापू ने संसार को सत्य की प्रयोगशाला माना। उनकी जीवनी और आत्मकथा दोनों सत्य के साक्षात्कार तथा उसके आत्मसातीकरण की खुली किताबों के समान हैं। सत्य को ईश्वर के रूप में पहचानने वाले गांधी, वास्तव में सत्य के सार्वभौमिक प्रवक्ता हैं। सत्य उनके साधना-पथ का साध्य रहा और उस सत्य को साधने के लिए अहिंसा को उन्होंने एक कारगर माध्यम बनाया। गांधी जी का जीवन कथनी का नहीं, करनी का था। उन्होंने जो कहा उसके उदाहरण पहले स्वयं बने। वाद-विवाद से दूर संवाद के समीप रहा उनका जीवन। इसलिए समझना होगा कि गांधीवाद उनका कोई पंथ नहीं है अपितु उनके सिद्धांतों, मन्तव्यों का संग्रह है। अपनी किसी राह पर लोगों को चलने के लिए उन्होंने किसी को बाध्य नहीं किया, बल्कि कहा सत्य और अहिंसा की राह पर चलो। बापू ने कहा - मैं कभी इस बात का दावा नहीं करता कि मैंने नया सिद्धांत चलाया है। मैंने शाश्वत सत्यों को अपने नित्य के जीवन और प्रश्नों से सम्बन्ध करने का प्रयास अपने ढंग से किया। आप लोग इसे गांधीवाद न कहें, इसमें वाद जैसा कुछ भी नहीं है। गांधी ने शाश्वत सत्य का पाठ विश्व के महान सन्तों एवं मनीषियों से सीखा था। गांधीजी का सत्य जीवन का व्यावहारिक आलोक है। वास्तव में गाँधी जी विश्व को सत्य एवं अहिंसा के आदर्शों पर चलता हुआ देखना चाहते थे। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति इस अभिप्राय को प्राप्त करने का एक साधन मात्र थी। राष्ट्रपिता के लिए सर्वोच्च था। उन्होंने हरिजन ( 22 फरवरी, 1942 ) में लिखा - सत्य सर्वव्यापाक है। यह अहिंसा में समाहित नहीं, वरन अहिंसा इसमें समाहित है। गांधी जी ने सत्य को जी कर दिखाया। सत्य को ही जीवन बनाया। यहां तक उन्होंने देश की स्वतंत्रता से भी सत्य को लेकर कोई समझौता नहीं किया। सत्य समर्पण की यह गहन दृष्टि गांधी जी के सत्यशोधन का सार कही जा सकती है। सत्य के लिए भावावेश उनके जीवन पर छाया हुआ था। इसने उनके ह्रदय पर इतना प्रभाव डाला कि वह अपरिमित शक्तिशाली बन गया। गांधी जी सत्य साधक ही नहीं, सत्य अन्वेषक भी थे। स्मरण रहे कि इसका उन्होंने विशाल पैमाने पर सत्य प्रयोग किया और उन्हें सफलता मिली। मो. 9301054300

  • शंकराचार्य कृत सौन्दर्यलहरी का एक  सांस्कृतिक विमर्श

    शंकराचार्य कृत सौन्दर्यलहरी का एक सांस्कृतिक विमर्श

    शंकराचार्य कृत सौन्दर्यलहरी का एक सांस्कृतिक विमर्श आनंद कुमार पर्वत की ऊँची चोटी के लिए संस्कृत में “शिखर”, और उसे धारण करने वाले, यानी पर्वत के लिए “शिखरि” शब्द प्रयुक्त होता है। इसी का स्त्रीलिंग “शिखरिणी” हो जाएगा। इसी शब्द “शिखरिणी” का एक और उपयोग “सुन्दर कन्या” के लिए भी होता है। शिखरिणी संस्कृत काव्य का एक छन्द भी है। इसी शिखरिणी छन्द में आदि शंकराचार्य ने सौंदर्यलहरी की रचना की थी। संस्कृत जानने वालों के लिए, शाक्त उपासकों के लिए या तंत्र की साधना करने वालों के लिए सौन्दर्यलहरी कितना महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी पैंतीस से अधिक टीकाएँ, केवल संस्कृत में हैं। हिन्दी-अंग्रेजी भी जोड़ें तो पता नहीं गिनती कहाँ तक जाएगी। आदि शंकराचार्य के सौन्दर्यलहरी की रचना के साथ भी एक किम्वदंती जुड़ी हुई है। कहते हैं वो एक बार कैलाश पर्वत पर गए और वहां भगवान शिव ने उन्हें सौ श्लोकों वाला एक ग्रन्थ दिया। देवी के अनेक रूपों के वर्णन वाले ग्रन्थ को उपहार में पाकर प्रसन्न आदि शंकराचार्य लौट ही रहे थे कि रास्ते में उन्हें नन्दी मिले। नन्दी ने उनसे ग्रन्थ छीन लेना चाहा और इस क्रम में ग्रन्थ आधा फट गया! आदि शंकराचार्य के पास शुरू के 41 श्लोक रहे और बाकी लेकर नन्दी भाग गए। आदि शंकराचार्य ने वापस जाकर भगवान शंकर को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, 41वें से आगे के श्लोकों को देवी की स्तुति में तुम स्वयं ही रच दो! तो इस तरह तंत्र के साधकों का ये प्रिय ग्रन्थ दो भागों में बंटा हुआ है। पहले 41 श्लोक देवी के महात्म्य से जुड़े हैं और आनन्दलहरी के नाम से जाने जाते हैं। जहाँ से देवी के सौन्दर्य का बखान है उस 42वें से लेकर सौवें श्लोक को सौन्दर्यलहरी कहते हैं। अब जिस छन्द में ये रचा गया है उस “शिखरिणी” पर वापस चलें तो उसका पहला अर्थ पहाड़ की चोटी बताया जाता है। नन्दा देवी या वैष्णो देवी जैसी जगहों के बारे में सुना हो तो याद आ जायेगा कि देवी को पर्वत की चोटी पर रहने वाली भी बताया जाता है। दूसरे हिस्से के लिए अगर “शिखरिणी” का दूसरा अर्थ सुन्दर कन्या लें, तो नवरात्र में कन्या पूजन भी याद आ जायेगा। एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानि मानवविज्ञानी जब धर्म का अध्ययन करते हैं तो उसे दो भागों में बांटने की कोशिश करते हैं। रिलिजन या मजहब के लिए संभवतः ये तरीका आसान होगा। वृहत (ग्रेटर) धारा में वो उस हिस्से को डालते हैं जिसमें सब कुछ लिखित हो और उस लिखे हुए को पढ़ने, समझने और समझाने के लिए कुछ ख़ास लोग नियुक्त हों। छोटी (लिटिल) धारा उसे कहते हैं जो लोकव्यवहार में हो, उसके लिखित ग्रन्थ नहीं होते और कोई शिक्षक भी नियुक्त नहीं किये जाते। भारत में धर्म की शाक्त परम्पराओं में ये वर्गीकरण काम नहीं करता क्योंकि आदि शंकराचार्य को किसी ने “नियुक्त” नहीं किया था। रामकृष्ण परमहंस या बाम-खेपा जैसे शाक्त उपासकों को देखें तो बांग्ला में “खेपा” का मतलब पागल होता है। इससे उनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं आती, ना ही उनकी उपासना पद्दति कमतर या छोटी होती है। तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है। सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता सृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं। इसके अंतिम के तीन-चार श्लोक (सौवें के बाद के) जो आज मिलते हैं, उन्हें बाद के विद्वानों का जोड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है। शायद यही वजह होगी कि इसपर हिन्दी में कम लिखा गया है। इसपर दो अच्छे (अंग्रेजी) प्रचलित ग्रन्थ जो हाल के समय में लिखे गए हैं उनमें से एक रामकृष्ण मिशन के प्रकाशन से आता है और दूसरा बिहार योग केंद्र (मुंगेर) का है। दक्षिण और उत्तर में एक अंतर समझना हो तो ये भी दिखेगा कि सौन्दर्यलहरी में श्लोकों की व्याख्या और सम्बन्ध बताया जाता है। श्लोक का स्वरुप, उसके प्रयोग या अर्थ से जुड़ी ऐसी व्याख्या वाले ग्रन्थ दुर्गा सप्तशती के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। बाकी आस पास के रामकृष्ण मिशन या दूसरे जो भी योग अथवा संस्कृत विद्यालय हों, वहां तक जाकर भी देखिये। संस्कृति को जीवित रखना समाज का ही कर्तव्य है। इसके अंतिम के तीन-चार श्लोक (सौवें के बाद के) जो आज मिलते हैं, उन्हें बाद के विद्वानों का जोड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है।

  • अगत्स्य ऋषि और रावण का संबंध

    अगत्स्य ऋषि और रावण का संबंध

    रावण ने रक्षों का नये ढंग से संगठन किया। वेदों में से इंद्र, वरुण, अग्नि व विष्णु की ऋचाओं को हटा दिया, कैलाश स्थित महादेव शिव को वैदिक रुद्र का ही प्रतिनिधि मानकर उन्हें सर्वोच्च देवता

  • सुंदर कांड के पच्चीसवें दोहे का रहस्य

    सुंदर कांड के पच्चीसवें दोहे का रहस्य

    आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है,

  • रामचरित मानस के मुद्रिका प्रसंग के गूढ़ रहस्य

    रामचरित मानस के मुद्रिका प्रसंग के गूढ़ रहस्य

    गोस्वामी जी ने रामनाम की महिमा का वर्णन करने के लिए ही ऐसा लिखा है क्योंकि प्रभुमुद्रिका के ऊपर रामनाम अंकित है ।

  • तपस्वी सिध्दार्थ से सम्यक संबोधि

    जो राजा से फकीर बन कर सम्यक संबोध बने. उनकी संपूर्ण शक्ति सत्य की खोज पर केंद्रित थी.राज गृह त्याग कर गौतम ने हाथ में भिक्षा पात्र लेकर गली-गली घर घर द्वार द्वार भिक्षा मांगी.

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