Saturday, March 2, 2024
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देश के विभिन्न क्षेत्रों में बिहारी मजदूरों व छात्रों के साथ होने वाली हिंसा से कैसे निपटें

अमित श्रीवास्तव

तमिलनाडु में बिहारी युवाओं व मजदूरों के साथ हिंसा की अप्रिय सूचना मिल रही है। इसके पीछे का कारण क्या क्षेत्रवाद है या क्षेत्रवाद के सहारे अगले वर्ष होने जा रहे लोकसभा चुनाव को साधने के प्रयास है?

इसे समझने के लिए विगत के कुछ चुनाव परिणामों को देखना आवश्यक है।

2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव जिसमे बिहार की दो क्षेत्रीय पार्टियां राजद व जदयू के महागठबंधन का मुकाबला राष्ट्रीय पार्टी भाजपा के बीच था। महागठबंधन के लिए चुनावी रणनीति बना रहे थे प्रशांत किशोर।

प्रशांत किशोर की नीति के अनुसार महागठबंधन ने एक शिगूफा छेड़ा था – बिहार को बिहारी चलाएंगे या गुजराती। जाहिर तौर पर उनका निशाना भाजपा के शीर्ष नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह पर था। बाहरी बनाम बिहारी के द्वंद का असर यह हुआ कि भाजपा को चुनाव के मध्य ही अपने पोस्टर पर क्षेत्रीय नेताओं की छवि प्रमुखता से लगाने के बाद भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।

चुनाव जीतने के लिए बाहरी बनाम भीतरी का फॉर्मूला 2015 में सफल हो गया।

ततपश्चात 2017 में भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी बाहरी बनाम भीतरी के नारे में नए रूप में प्रस्तुत करते हुए समाजवादी पार्टी व कॉंग्रेस गठबंधन ने “यूपी के लड़के” के रूप में अखिलेश यादव व राहुल गांधी को प्रस्तुत किया। इस रणनीति के रणनीतिकार भी प्रशांत किशोर ही थे। यहाँ भी इस गठबंधन का सीधा मुकाबला भाजपा के साथ ही था। चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं काशी से सांसद थे और अमित शाह 2014 से उत्तर प्रदेश में कार्य कर रहे थे परिणामस्वरूप यह नारा असफल रहा। इसका एक कारण यह भी था कि उत्तर प्रदेश की जनता प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों को अनुभव भी कर रही थी व केंद्र सरकार की कई योजनाओं का लाभ भी उन्हें मिल रहा था।

इसके पश्चात 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में भी बाहरी बनाम भीतरी जैसी क्षेत्रवादी राजनीति को हवा दी गई। बंगाल जो भाषायी रूप से हिंदी से अलग स्थान रखता है वहां भी बंगाल के क्षेत्रीय दल तृणमूल कांग्रेस की सीधी टक्कर भाजपा से थी जिसे भारत में उत्तर भारत व हिंदीभाषी क्षेत्र की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बंगाल की लड़ाई भी बाहरी बनाम भीतरी की नीति पर ही लड़ी गई जिसमें बंगाल की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की जीत हुई। संयोग यह भी है कि इस चुनाव में भी तृणमूल कांग्रेस की रणनीति प्रशांत किशोर ही तय कर रहे थे।
तमिलनाडु में पिछले कुछ महीनों से क्षेत्रवाद की लड़ाई ने जोड़ पकड़ लिया है। यद्यपि अंग्रेजों द्वारा किए गए सत्ता के स्थानांतरण के उपरांत व राज्यों के निर्माण के साथ ही तमिलनाडु क्षेत्रवाद की राजनीति की प्रयोगशाला रही है किंतु अखिल भारतीय स्तर पर भाजपा के विस्तार को रोकने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय दलों के द्वारा भी अपने प्रभाव के राज्यों में क्षेत्रवाद की राजनीति को पुनः हवा दी जा रही है जिसमें तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके भी पीछे नहीं है।

हालिया विवाद तब और बढ़ गया जब तमिलनाडु के तात्कालिक महामहिम राज्यपाल श्री आर एन रवि ने तमिलनाडु का नाम बदलने की सलाह दे डाली। श्री रवि ने तमिलनाडु का नाम बदल कर तमीझगम करने की बात की। जिसका विरोध द्रविड़ राजनीति करने वाली पार्टियों ने खुलकर कर दिया। इन पार्टियों ने राज्यपाल के इस बयान को भाजपा की मंशा जोड़ते हुए यह तर्क दिया कि राज्यपाल केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त व्यक्ति हैं अतः यह हिंदीभाषी पार्टी भाजपा की मंशा है और यह तमिल अस्मिता पर आघात है।

स्वातंत्र्य भारत के साथ ही तात्कालिक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय मे उतपन्न हुई द्रविड़ राजनीति का आधार तमिल संस्कृति ही रही है। यही कारण है कि किसी भी राष्ट्रीय पार्टी से ज्यादा प्रभाव वहाँ की क्षेत्रीय पार्टियों का रहा है और यही उनकी राजनियिक स्वीकार्यता का आधार भी है।

ऐसे में जब भाजपा का विस्तार कर्नाटक के बाद अब दक्षिण के दूसरे राज्यों में भी तेजी से होता दिख रहा है तो जाहिर है कि तमिलनाडु के क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए पुनः क्षेत्रवाद की सुसुप्त आग को हवा दे रहे हैं। जिसमे उन्हें राज्यपाल आर एन रवि का उपरोक्त बयान एक मौका के रूप में हाथ लग गया।

भले ही आर एन रवि का यह बयान संप्रभु राष्ट्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं अर्थ व तर्कसंगत हो किंतु क्षेत्रवाद की ज्वाला को भगकाने के लिए इसका उपयोग हो रहा है।
विगत के बिहार व बंगाल चुनाव के नतीजों ने जहाँ मृतप्राय क्षेत्रवाद की राजनीति को पुनः जीत की गारंटी बना दिता है ऐसे में स्वाभाविक रूप से भाजपा के दक्षिण में विस्तार से चिंतित क्षेत्रीय दल क्षेत्रवाद के सहारे अपनी डूबती नैया पार करवाने की जुगत में लग गए हैं। यही कारण है कि पहले बंगाल व अब तमिलनाडु में भी बिहारियों के साथ हिंसा देखने को मिल गया है।

प्रश्न यह है कि आखिर बिहारियों को ही ऐसी प्रताड़ना का सामना क्यों करना पड़ रहा है? इसके दो कारण है। एक यह कि बिहारी पूरे भारत में फैले हुए हैं। रोजगार की खोज व उच्च शिक्षा के अभाव में बिहारी पूरे भारत में फैल चुके हैं। जिनमे निम्वर्ग के साथ साथ उच्च मध्यमवर्ग के लोग शामिल हैं। जो राजनीतिक रूप से मुखर भी हैं। इन पर हमले का विरोध राष्ट्रीय स्तर की चर्चा बनती है, जिसका लाभ पीड़ित बिहारियों से ज्यादा उत्पीड़न करने वाली क्षेत्रवादी शक्तियों को मिलता है और ये अरक्षित अथवा आसान लक्ष्य भी प्रतीत होते हैं। जिस कारण इन्हें प्रताड़ित करना आसान है। इनमें निम्न वर्ग की संख्या अधिक होने के कारण भी ये प्रताड़ना का शिकार होते हैं।
दूसरा बड़ा कारण बिहार की अक्षम राजनीति भी है। एक तो पलायन जैसी समस्या के निपटान के लिए बिहार के लिए क्षेत्रीय दल व इनके नेताओं ने कभी कोई नीति बनाई ही नहीं एवं ऐसे किसी भी प्रताड़ना का कड़ा विरोध भी कभी बिहार के नेताओं ने किया ही नहीं। बिहारियों पर हुए ऐसी हिंसा का विरोध भी कभी बिहार से बाहर हुआ ही नहीं है। ऐसे विषयों पर कोई प्रदर्शन कभी बिहार के नेताओं ने दिल्ली अथबा अन्य जगहों पर किया ही नहीं। ऐसी हिंसा का विरोध केवल और केवल बिहार में ही देखने को मिलता है। जबकि ऐसे विरोध का उद्देश्य केवल बिहार में अपनी राजनीति चमकाने के लिए ही किया जाता है। अपने कार्यक्षेत्र व लक्षित मतदाताओं के दिखावे के लिए बिहार के नेता अपने क्षेत्र में ही विरोध का ड्रामा करते हैं। इससे ज्यादा कभी कुछ हुआ ही नहीं। यही कारण है कि इनका विरोध बाहर के राज्यों व ऐसी देशविरोधी शक्तियों के मन में कोई डर उतपन्न नहीं कर पाता और बिहारी हर जगह पिटता ही जाता है।

जो गैर राजनीतिक बिहारी जमात देश के विभिन्न क्षेत्रों में व विभिन्न रोजगार के कारण भारत में फैले हुए हैं उन्हें भी ऐसी घटनाओं पर कभी रोष प्रकार करते नहीं देखा जाता। मीडिया में बिहारी पत्रकारों की बड़ी संख्या है किंतु वे भी इस विषय को एक खबर से ज्यादा महत्व नहीं देते। इन विपरीत परिस्थितियों में बिहार से बाहर रह रहे बिहारी मजदूरों व विद्यार्थियों का साथ देने वाला कोई नहीं है। हद तो ये है कि पलायन पर बात करते हुए उप मुख्यमंत्री बनें तेजस्वी यादव व वर्षों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज नीतीश कुमार इस बार इस अप्रिय घटना को स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं।

तमिलनाडु से जान बचाकर भागे मजदूर बार बार कह रहे हैं कि उनके साथ हिंसा हुई किंतु बिहार की सत्तारूढ़ पार्टियां इसे झुठलाने में लगी है।

ऐसे में अब समय है कि बिहार से बाहर खासकर दिल्ली में रहने वाले बिहारी इस विषय पर दिल्ली में प्रदर्शन करें। एक नियत तिथि व स्थान पर बड़ा कार्यक्रम तय कर ऐसी देशविरोधी घटनाओं का विरोध किया जाए। तभी शायद ऐसी घटनाओं में कमी आ सकती है।

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