Wednesday, May 22, 2024
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त्यौहारी…ईद की मीठी यादें

जब भी कोई त्यौहार आता, लड़की उदास हो जाती. उसे अपनी ज़िन्दगी की वीरानी डसने लगती. वो सोचती कि कितना अच्छा होता, अगर उसका भी अपना एक घर होता. घर का एक-एक कोना उसका अपना होता, जिसे वो ख़ूब सजाती-संवारती. उस घर में उसे बेपनाह मुहब्बत करने वाला शौहर होता, जो त्यौहार पर उसके लिए नये कपड़े लाता, चूड़ियां लाता, मेहंदी लाता. और वो नये कपड़े पहनकर चहक उठती, गोली कलाइयों में रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियां पहननती, जिसकी खनखनाहट दिल लुभाती. गुलाबी हथेलियों में मेहंदी से बेल-बूटे बनाती, जिसकी महक से उसका रोम-रोम महक उठता.

लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसकी ज़िन्दगी किसी बंजर ज़मीन जैसी थी, जिसमें कभी बहार नहीं आनी थी. बहार के इंतज़ार में उसकी उम्र ख़त्म हो रही थी. उसने हर उम्मीद छोड़ दी थी. अब बस सोचें बाक़ी थीं. ऐसी उदास सोचें, जिन पर उसका कोई अख़्तियार न था.
 
वो बड़े शहर में नौकरी करती थी और पेइंग गेस्ट के तौर पर दूर की एक रिश्तेदार के मकान में रहती थी, जो उसकी ख़ाला लगती थीं. जब भी कोई त्यौहार आता, तो ख़ाला अपनी बेटी के लिए त्यौहारी भेजतीं. वो सोचती कि अगर वो अपनी ससुराल में होती, तो उसके मायके से उसकी भी त्यौहारी आती. और ये सोचकर वो और ज़्यादा उदास हो जाती. हालांकि वो मान चुकी थी कि उसकी क़िस्मत में त्यौहारी नहीं है, न मायके से और न ससुराल से. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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नज़्म
ईद का चाद…
ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी…

उसी लम्हा
कितने अश्क
मेरी आंखों में
भर आए थे…

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी…

उसी लम्हा
कितनी यादें मेरे तसव्वुर में
उभर आईं थीं…

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी…

उसी लम्हा
कितने ख़्वाब
इन्द्रधनुषी रंगों से
झिलमिला उठे थे…

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी…

उसी लम्हा
मेरी हथेलियों की हिना
ख़ुशी से
चहक उठी थी…

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी…

उसी लम्हा
शब की तन्हाई
सुर्ख़ गुलाबों-सी
महक उठी थी…

ईद का चांद देखकर
कभी दिल ने
तुमसे मिलने की
दुआ मांगी थी…
-फ़िरदौस ख़ान
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नज़्म
मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना…

ऐ चांद !
मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना…
अब नहीं उठते हाथ
दुआ के लिए
तुम्हें पाने की ख़ातिर…
हमने
दिल की वीरानियों में
दफ़न कर दिया
उन सभी जज़्बात को
जो मचलते थे
तुम्हें पाने के लिए…
तुम्हें बेपनाह चाहने की 
अपनी हर ख़्वाहिश को
फ़ना कर डाला…
अब नहीं देखती
सहर के सूरज को
जो तुम्हारा ही अक्स लगता था…
अब नहीं बरसतीं आंखें
फुरक़त में तम्हारी 
क्योंकि 
दर्द की आग ने
अश्कों के समन्दर को
सहरा बना दिया…
अब कोई मंज़िल है
न कोई राह 
और
न ही कोई हसरत रही
जीने की
लेकिन
तुमसे कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं…
ऐ चांद !
मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना…
-फ़िरदौस ख़ान

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