2026 की भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा यात्रा आगामी 24 जुलाई को है।चतुर्धा देवविग्रह गुण्डीचा मंदिर में गुण्डीचा महोत्सव मनाकर तथा सात दिनों तक विश्रामकर लक्ष्मी-नारायण रुप में रथारुढ़ होकर बाहुड़ा विजय करेंगे।वे पुनः अपने जन्मवेदी(गुण्डीचा)से श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर वापस लौटेंगे।उस दिन सुबह  गुण्डीचा मंदिर में चतुर्धा देवविग्रहों की सुबह में मंगल आरती होगी,मयलम,तडपलागी और रोसडा भोग होगा।अवकाश,सूर्यपूजा,द्वारपाल पूजा,शेषवेश आदि विधि-विधान संपन्न  होगा।चतुर्धा देवविग्रहों को गोपालवल्लव भोग(खिचडी भोग) निवेदित कराकर एक-एककर पहण्डी विजय कराकर उनके सुनिश्चित रथों पर आरुढ़ किया जाएगा।भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक पुरी के गजपति महाराजा श्री श्री दिव्य सिंहदेवजी महाराजा अपने राजमहल श्रीनाहर से पालकी में पधारकर तीनों रथों पर चंदनमिश्रित पवित्र जल छिडककर छेरापंहरा करेंगे।  उसके उपरांत तीनों रथों पर लगीं नारियल की सीढियों को हटा दिया जाएगा तथा रथों को उनके घोड़ों से जोड़ दिया जाएगा।तीनों रथ क्रमशः तालध्वज, देवदलन तथा नंदिघोष को समस्त जगन्नाथ भक्तगण जय जगन्नाथ तथा हरिबोल के जयघोष के साथ खींचकर श्रीमंदिर के सिंहद्वार के समीप लाएंगे।


आगामी 25 जुलाई को रथ पर ही चतुर्धा देवविग्रहों का सोना वेष होगा जिसमें श्रीमंदिर के रत्नभण्डार से कुल बारह हजार तोले के सोने के अनेक आभूषण,हीरे-जवाहरात आदि से चतुर्धा देवविग्रहों को नख से लेकर मस्तक तक सुशोभित किया जाएगा।वह अभूतपूर्व रुप भगवान जगन्नाथ की ऐश्वर्य लीला का प्रत्यक्ष प्रमाण होता है।अगले दिन अर्थात् 26 जुलाई को चतुर्धा देवविग्रहों का अधरपडा होता है। आगामी 27 जुलाई को नीलाद्रि विजय कर भगवान जगन्नाथ अपने रत्नवेदी पर पुनः आरुढ़ होकर अपने भक्तों को दर्शन देंगे।

श्रीपुरी धाम का गुण्डीचा मंदिर(2026)




श्रीपुरी धाम का गुण्डीचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की जन्मस्थली है।इसे गुण्डीचा घर,ब्रह्मलोक,सुंदराचल तथा जनकपुरी के नाम से भी जाना जाता हैं।गुण्डीचा मंदिर का निर्माण मालवा नरेश इन्द्रद्युम्न ने अपनी महारानी गुण्डीचा के नाम पर करवाया था। गुण्डीचा मंदिर की रत्नवेदी चार फीट ऊंची तथा 19फीट लंबी है। मंदिर के आसपास का क्षेत्र श्रद्धाबाली कहलाता है जहां की बालुकाराशि के कण-कण में श्रद्धा का निवास है। पहली बार यहीं पर राजा इन्द्रद्युम्न ने एक हजार अश्वमेध यज्ञ किया था।


गुण्डीचा मंदिर का निर्माण हल्के भूरे रंग के सुंदर कलेवर में किया गया है। लगभग 5 एकड में फैले इस मंदिर के चारों तरफ अतिमोहक बाग-बगीचे हैं जो मंदिर की छटा को और अधिक आकर्षक बना देते हैं।इस मंदिर का भी निर्माण जगन्नाथ पुरी के मुख्य जगन्नाथ मंदिर(श्रीमंदिर) की तरह ही किया गया है।मंदिर के कुल चार परकोटे हैं-विमान, जगमोहन, नाट्यमण्डप और भोगमण्डप।गुण्डीचा मंदिर का पिछला हिस्सा विमान कहलाता है। उसके अंदर का भाग है जगमोहन।उसके बाद नाट्यमण्डप और उसके बाद है–भोगमण्डप। गुण्डीचा मंदिर भी जगन्नाथ मंदिर पुरी की तरह ही उत्कलीय स्थापत्य एवं मूर्तिकला का बेजोड उदाहरण है। भगवान जगन्नाथ प्रतिवर्ष अपनी विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के दौरान यहीं गुण्डीचा मंदिर में सात दिनों तक विश्राम करते हैं।प्रतिवर्ष रथयात्रा के दौरान सात दिनों के प्रवास के क्रम में चतुर्धा देवविग्रहों को मंदिर के रत्नवेदी पर आरुढ कराकर उनकी नित्य पूजा-अर्चना की जाती है जिसे गुण्डीचा महोत्सव कहा जाता है।

रथ-निर्माण की संस्कृति, कारीगरी और इसका सौंदर्य 
विश्व का एकमात्र संस्कृति संपन्न देश भारत  है जहां के आध्यात्मिक प्रदेश ओडिशा के श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में अनादिकाल से विराजमान हैं जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ। वे  श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर चतुर्धा देवविग्रह रुप में विराजमान हैं। वे  कलियुग के एकमात्र पूर्ण दारुब्रह्म हैं जो अपने दर्शन मात्र से भक्तों को विश्व को शांति,एकता और मैत्री का पावन संदेश देते हैं।

प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा अनुष्ठित होती है जो अपने आपमें एक सांस्कृतिक महोत्सव होता है।2026 की रथयात्रा आगामी 16 जुलाई को है।

भगवान जगन्नाथजी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए प्रतिवर्ष तीन नये रथों का निर्माण होता है। श्रीमंदिर के समस्त रीति-नीति के तहत वैशाख मास की अक्षय तृतीया से रथनिर्माण का कार्य आरंभ होता है।रथ-निर्माण में कुल लगभग 45 दिन लगते हैं।काष्ठ संग्रह का कार्य बसंतपंचमी से आरंभ होता है।



रथ-निर्माण की अत्यंत गौरवशाली और सुदीर्घ परम्परा रही है। इस कार्य को वंशानुगत क्रम से सुनिश्चित सेवायत बढईगण ही करते हैं। यह कार्य पूर्णतः शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न होता है। तीनों रथ, बलभद्रजी का रथ तालध्वज रथ,सुभद्राजी का रथ देवदलन रथ तथा भगवान जगन्नाथ के रथ नंदिघोष रथ का निर्माण पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से होता है। रथ-निर्माण में कुल लगभग 205 प्रकार के अलग-अलग सेवायतगण सहयोग करते हैं। रथ निर्माण के क्रम में ऐसी मान्यता है कि जिस प्रकार पंचतत्वों से मानव-शरीर का निर्माण हुआ है, ठीक उसी प्रकार काष्ठ,धातु,रंग,परिधान तथा सजावटी वस्तु, पंच  सामग्रियों से रथों का पूर्णरुपेण निर्माण होता है। पौराणिक मान्यता के आधार पर रथ ही मानव-शरीर होता है ,रथि मानव-आत्मा,सारथि-मानव-बुद्धि,लगाम मानव-मन तथा रथ के घोडे मानव-इन्द्रीयगण के प्रतीक हैं। जगन्नाथ जी की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा के दिन तीनों ही रथ चलते-फिरते मंदिर होते हैं।



































रथों का विवरणः तालध्वज रथ
भगवान जगन्नाथ जी के बड़े भाई बलभद्रजी के रथ का नाम तालध्वज है। इसे बहलध्वज भी कहते हैं।इसे ताल जंगव के देवताओं ने बलभद्रजी को भेंट किया था। यह 44फीट ऊंचा होता है जिसमें 14चक्के लगे होते हैं। इसके निर्माण में कुल 763 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। इस रथ पर लगे पताके का नाम उन्नानी है। इस रथ पर लगे नये परिधान के रंग लाल-हरा होता है। इसके घोडों का नामःतीव्र,घोर,दीर्घाश्रम और स्वर्णनाभ हैं। घोडों का रंग काला होता है। रथ के रस्से का नाम बासुकी होता है।रथ के पार्श्व देव-देवतागण के रुप में गणेश, कार्तिकेय,सर्वमंगला,प्रलंबरी,हलयुध,मृत्युंजय,नतंभरा, मुक्तेश्वर तथा शेषदेव हैं। रथ के सारथि का नाम मातली है तथा रथ के रक्षक हैं-वासुदेव।

देवदलन रथ

यह रथ भगवान जगन्नाथ की लाड़ली बहन सुभद्राजी का है जिसं देवदलन तथा दर्पदलन भी कहा जाता है। यह 43फीट ऊंचा होता है।इसमें कुल 593 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। इसपर लगे नये परिधान का रंग लाल-काला होता है। इसमें 12 चक्के लगे होते हैं। रथ के सारथि का नाम अर्जुन है। रक्षक जयदुर्गा हैं। रथ पर लगे पताके का नाम नदंबिका है। रथ के चार घोडे हैं –रुचिका,मोचिका,जीत तथा अपराजिता हैं। घोडों का रंग भूरा है। रथ में उपयोग में आनेवाले रस्से का नाम स्वर्णचूड़ है। रथ के पार्श्व देव-देवियां हैःचण्डी, चमुण्डी, उग्रतारा, शुलीदुर्गा, वराही, श्यामकाली,मंगला और विमला हैं।

नन्दिघोष रथ
भगवान जगन्नाथजी के रथ का नाम नंदिघोष रथ है। इसे गरुड़धव्ज तथा कपिध्वज भी कहते हैं।इसे स्वयं देवराज इन्द्र ने भगवान जगन्नाथ को प्रदान किया था। रथ की ऊंचाई 45फीट होता है। इसमें 16चक्के होते हैं। इसके निर्माण में कुल 832 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। रथ पर लगे नये परिधानों का रंग लाल-पीला होता है। इसपर लगे पताके का नाम त्रैलोक्यमोहिनी है। इसके सारथि दारुक तथा रक्षक हैं –गरुण। इसके चार घोडे हैःशंख,बलाहक,सुश्वेत तथा हरिदाश्व।इस रथ में लगे रस्से का नामः शंखचूड है। रथ के पार्श्व देव-देवियां हैःवराह, गोवर्धन। कृष्ण,गोपीकृष्ण,नरसिंह, राम, नारायण,त्रिविक्रम,हनुमान तथा रुद्र हैं।

(लेखक भुवनेश्वर में रहते हैं और ओड़िशा के साहित्यक, धार्मिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विषयों पर निरंतर लेखन करते हैं)