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भारत को जानना है तो ‘जीवन का भारतीय प्रतिमान’ व्याख्यान माला से जुड़िये

एक अत्यंत विचारप्रवर्तक, भारतीय जीवन की श्रेष्ठता का परिचय कराने वाली, श्रेष्ठ भारतीय तत्वज्ञान के अनुसार जीवन कैसे जी सकते हैं यह बताने वाली, प्रत्यक्ष व्यवहार से ‘ सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को पोषित करने वाली, आत्मविश्वास जगाने वाली, बुद्धि को उन्नत स्तरपर आनंद देने वाली और वर्तमान अभारतीय जीवन से मुक्त कर फिर से भारतीय जीवन की ओर बढने के लिए कृतीप्रवण कराने वाली.. ऑनलाईन व्याख्यानमाला…

जीवन का भारतीय प्रतिमान व्याख्यान माला

संकल्पना – जीवन से जुडे विभिन्न विषयों और क्षेत्रों से सम्बन्धित भारतीय दृष्टि की प्रस्तुति के लिए, किया हुआ यह प्रयास है। भारतीय जीवन याने भारतीय जीवन दृष्टि, जीवन के व्यवहार सूत्र, सामाजिक व्यवस्थाएँ और भारतीय समाज के अद्वितीय सामाजिक संगठन आदि की, जो भारत के ‘विश्वगुरु’त्व की नींव था, उसे स्पष्ट करने का यह प्रयास है।

वर्तमान में हम भारतीयों की स्थिति त्रिशंकु जैसी है। रीति रिवाज या कर्मकाण्ड के रूप में हम में अब भी कुछ भारतीयता शेष है। लेकिन विचार, व्यवहार और व्यवस्थाएँ तो सभी या तो अभारतीय बन गईं हैं, या बनती जा रही हैं। हमारी पहचान भी ‘इण्डिया दॅट इज भारत’ है। भारतीय के रूप में जन्म लिए बालक को ‘भारतीय’ बनाने के लिए भी संस्कार और शिक्षा की आवश्यकता तो होती ही है। लेकिन इसकी कोई सामान्य व्यवस्था भी भारत में नहीं हैं l

हमारी सोच भी अभारतीय बन गयी है। हम अब कर्तव्यों के पालन में विश्वास नहीं रखते। हमारे ग्राम अब स्वावलम्बी ग्रामकुल नहीं रहे हैं, वे व्हिलेज बन गए हैं। वर्तमान में हमारे कुटुम्ब नहीं होते, फॅमिली होती है। हम दो और हमपर निर्भर बच्चे। हमारे विवाह भी अब संस्कार नहीं होते, रजिस्टर्ड अँग्रीमेंट होते हैं। हम गति से ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की ओर बढ रहे हैं। हमारा अब पुनर्जन्म में विश्वास नहीं है। हमारी अब श्रीमद्भगवद्गीता के सन्देशपर श्रद्धा नहीं है। वेदों का शायद हम नाम लेते हैं लेकिन वेदों में भी हमारी श्रद्धा है ऐसा हमारा व्यवहार तो नहीं है। यह वैचारिक क्षेत्र के नेतृत्व का दोष ही है कि शिक्षा अभी भी अभारतीय ही है। आज भी हम शिक्षणशास्त्र, राजशास्त्र, समाज शास्त्र, न्यायशास्त्र,अर्थशास्त्र आदि सभी तो अभारतीय ही पढाते हैं।

गत १०-११ पीढ़ियों की अभारतीय शिक्षा ने जीवन की ओर देखने की हमारी दृष्टि को अभारतीय बना दिया है। फलस्वरूप जितना अधिक जो पढ़ जाता है भारतीयता से उस की दूरी उतनी ही बढ़ती जाती है। हमारी युनिव्हर्सिटीयों में विविध विषयों के पाठ्यक्रमों के निर्माण करने के लिए बोर्ड ऑफ़ स्टडीज हैं। लेकिन बोर्ड के सदस्यों को उनके विषय से सम्बन्धित भारतीय दृष्टि का पर्याप्त या शायद अल्प भी ज्ञान नहीं है। वे बस यूरो-अमरीकी देशों की नक़ल करते रहते हैं। भारतीयों की अभारतीयता को बढ़ाने में योगदान देते रहते हैं।

जीवन की ओर देखने की भारतीय दृष्टि चिरकाल से “सर्वे भवन्तु सुखिन:” याने चराचर से आत्मीयता की और समग्रता की ही रही है। हम में से कुछ लोग जानकारी के स्तरपर शायद इसे जानते भी होंगे। लेकिन उसके आधारपर अपना व्यवहार कैसा होना चाहिए यह हम भूल गए हैं। इतिहास के सम्बन्ध में कहा जाता है – जबतक शेर अपनी भूमिका से अपना इतिहास नहीं लिखता इतिहास तो शिकारी की दृष्टि से लिखा हुआ मिलेगा। तथ्य तो वही रहते हैं। लेकिन उनका विश्लेषण ही इतिहास को विकृत या प्रभावी बना देता है। फिर भी स्वाधीनता के ७५ वर्षों के उपरान्त भी हमने भारतीयता की भूमिका से अपने इतिहास के लेखन का शिक्षणशास्त्र के लेखन का, रक्षणशास्त्र के लेखन का, पोषणशास्त्र के लेखन का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया है।

‘जीवन का भारतीय प्रतिमान’ – यह व्याख्यानमाला इसभारतीय समाज को योग्य दिशा का दर्शन कराने का एक प्रयास है l
आप से अनुरोध है कि आप इस व्याख्यानमाला से जुडिये और औरों को भी जुडने का आग्रह किजिये l

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