आप यहाँ है :

चौथे औद्योगिक क्रांति का अगुवा बनता भारत

बाजार से विनिर्माण (मार्केट से फैक्ट्री) की ओर बढ़ता भारत

चौथे औद्योगिक क्रांति का आधार बनता मेक इन इंडिया

 

 

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर, 2022 को कहा कि भारत में चौथी औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व करने की क्षमता है और सरकार ने देश को दुनिया का विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए सुधारों पर काम किया है। पिछले अवसरों को चुकने वाले भारत के इतिहास में पहली बार, जनसांख्यिकी, मांग और निर्णायक शासन जैसे कई अलग-अलग कारक एक साथ आ रहे हैं। आइये इन बिंदुओं के निहितार्थों को विनिर्माण के परिप्रेक्ष्य में समझें। भारत में बिकने वाले लैपटॉप से लेकर खिलौने तक कभी आपने सोचा कि क्यों मेड इन चाइना होते हैं? विचार करें कि यह जीवन उपयोगी सस्ते सामान भारत में क्यों नहीं बनते और किस प्रकार से चीन की सरकार ने पूरी दुनिया के विनिर्माण को अपने देश में आकर्षित कर एक लगभग अजेय सी आर्थिक शक्ति बन चुकी है। कुछ लोग इसके पीछे चीन के सस्ते श्रम को इसका कारण मानते हैं परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। आइए समझते हैं कि मोदी सरकार की वह कौन सी नीतियां एवं प्रयास हैं जिससे हम चीन से “दुनिया के कारखाने” की पहचान छीन भारत को चौथे औद्योगिक क्रांति का अगुवा बना सकते हैं।

            

चतुर्थ औद्योगिक क्रांति का विचार वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के संस्थापक और कार्यकारी अध्यक्ष क्लॉस श्वाब द्वारा गढ़ा गया था। चौथी औद्योगिक क्रांति का दौर अपने शैशव के साथ प्रारम्भ हो चुका है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), रोबोटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), 3डी प्रिंटिंग, ब्लॉकचेन, जेनेटिक इंजीनियरिंग, क्वांटम कंप्यूटिंग और अन्य तकनीकों जैसी तकनीकों का मिश्रण है। यह नई तकनीकियां कई उत्पादों और सेवाओं के पीछे की वह सामूहिक शक्ति है जो आधुनिक जीवन के लिए तेजी से अपरिहार्य होते जा रहे हैं।

चौथे औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व वह देश करेगा जिसके पार विनिर्माण की शक्ति होगी। भारत सेवाओं के क्षेत्र में तो विश्व भर में अपनी उत्कृष्ट पहचान बना चुका है लेकिन विनिर्माण में अभी भी बहुत पीछे है। सेवाक्षेत्र हेतु इंफ़्रा तथा सप्लाई चेन पर बड़े निवेश की आवश्यकता नहीं होती एवं आउटसोर्सिंग के अधिकतर कार्य लैपटॉप पर सम्पादित हो जाते हैं। इसी कारण सेवाक्षेत्र कम एवं शिक्षित लोगों को रोजगार देता है। इसमें द्वितीयक स्तर के रोजगार कम सृजित होते हैं। दूसरी ओर विनिर्माण एक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को जन्म देता है जिसमें शिक्षित से लेकर श्रमिक वर्ग तक सभी के लिए रोजगार के अवसर बनते हैं। भारत में विभिन्न कौशल एवं आर्थिक स्तरों पर रोजगार के सृजन से सभी के लिए आय का अवसर पैदा होगा।  

विश्व का कारखाना है चीन:

चीन में कम्युनिस्ट शासन आते ही विनिर्माण के प्रयासों को बल मिल गया था। 2010 में चीन ने निर्णायक रूप से अमेरिका पर बढ़त बनाते हुए विश्व का सबसे बड़ा विनिर्माण आधारित देश बनकर उभरा है। साथ ही चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भी एक रहा है। यूएस नेशनल साइंटिफिक फाउंडेशन के एक रिपोर्ट के अनुसार 2012 से चीन उच्च गुणवत्ता विनिर्माण में भी दूसरे नंबर पर स्थापित चुका है। 2019 की डेटा के मुताबिक वैश्विक बाजार में 50% हिस्सेदारी के साथ चीन ई-कॉमर्स में भी सबसे आगे हैं साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स वही कल के क्षेत्र में भी चीन ने विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा एक निर्णायक बढ़त ले लिया है।

   

चीन इन इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी एवं उनके उपकरणों का भी सबसे बड़ा उत्पादक है। कई रिपोर्ट्स के अनुसार चीन का संपूर्ण विनिर्माण निर्गम प्रतिवर्ष 7:30 से 10% के बीच में रहा है। 2020 के डाटा के अनुसार चीन के सकल घरेलू उत्पाद का 26.18% उसके विनिर्माण क्षेत्र से ही आता है। दुनिया के एक्सपर्ट्स का मानना है कि चीन की श्रम शक्ति दुनिया के सभी विकासशील देशों की श्रम शक्ति से अधिक है तथा यह लगभग सभी औद्योगिक क्षेत्रों में बटा हुआ है। यही कारण है कि चीन को विश्व की फैक्ट्री कहा जाता है।

चीन के विनिर्माण सफलता के कारण:

प्रारंभिक बीसवीं शताब्दी तक चीन और भारत लगभग समान औद्योगिक एवं निर्यात स्थितियों में थे। 1978 में चीन के नेता देन जाओ पिंग के ओपन डोर नीति औद्योगिक सुधारवादी नीतियों के चलते यहां के विनिर्माण उद्योग को शिखर पर पहुंचा दिया। चीन के दूरगामी योजनाओं तथा बाजारवादी सुधारो ने एक मजबूत प्राइवेट सेक्टर तथा स्टेट नियंत्रित क्षेत्रों के बेहतरीन समन्वय को तैयार किया।

            

चीन अपने यहां न्यूनतम मजदूरी नीति के आधार पर लोगों को नियुक्त करता है इसलिए यहां पर विनिर्माण उद्योग में बहुत अधिक श्रम शक्ति उपलब्ध है। चीन संसार का सबसे अधिक आबादी वाला देश है जहां श्रम की प्रचुरता है साथ ही चीन के विनिर्माण उद्योग बाल मजदूरी, कार्य के घंटे तथा न्यूनतम मजदूरी दर जैसे कानूनों को बहुत कठोरता से पालन नहीं करते इसलिए उनका लागत मूल्य भी कमाता है साथ ही विनिर्माण संयंत्रों में चौबीसों घंटे कार्य सुनिश्चित हो पाता है।

            

सन 1950 से ही चीन ने अपने देश में क्षेत्रीय औद्योगिक समूह बनाना प्रारंभ कर दिया था जिसमें शानदोंग, जियांगसू, गुआंगडोंग एवम सिंहियांग जैसे समूह उस समय की ही परिकल्पना का परिणाम है। इन औद्योगिक समूहों के औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के साथ साथ निपुण श्रम शक्ति को उपलब्ध कराने हेतु विश्वविद्यालयों की भी स्थापना करके उन्हें इन उद्योग समूहों से जोड़ा गया। ऐसी वर्कफोर्स वहां के उच्च गुणवत्ता के निर्माण में अपना योगदान सुनिश्चित करते हैं। चीन का विनिर्माण उद्योग वहां के व्यापारिक पारिस्थितिकी तंत्र के कारण भी सफल हो सका। क्योंकि कोई भी उद्योग एकाकी रहकर सफल नहीं हो सकता है इसलिए उससे जुड़े हुए आपूर्तिकर्ता, उपकरण, विनिर्माणकर्ता, वितरक, सरकारी एजेंसी तथा उपभोक्ता संरचना भी मौजूद रहनी चाहिए। 

चीन के व्यापारिक पारिस्थितिकी तंत्र ने इन सभी को सुनिश्चित किया जिससे विनिर्माण निर्गम बढ़ता है। उदाहरण के लिए चीन का शेनझेन शहर इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों की वैश्विक मंडी कहलाती है। यहां विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखला को सहयोग करने के लिए एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाया गया है जिसमें उपकरण विनिर्माणकर्ता, सस्ता श्रम, तकनीकी श्रम, वितरणकर्ता एवं उपभोक्ता शामिल है। चीन ने अपने निर्यात वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक स्वीकार्य बनाने के लिए 1985 में निर्यात कर छूट नीति को मंजूरी दिया था जिसके तहत निर्यातित माल पर लगने वाले दोहरे कर की व्यवस्था को समाप्त किया गया। इस नीति के कारण ही विश्व के अन्य देशों में कार्य करने वाली कंपनियों ने भी चीन में अपने उद्योग स्थापित किए एवं यहां से सस्ते दरों पर विश्व के अन्य देशों में निर्यात किया।

चीन की सरकार उच्च गुणवत्ता के उत्पादन तथा उच्च प्रतिस्पर्धा के मानकों को कड़ाई से पालन करने के लिए प्रदर्शन आधारित अध्ययन भी करती है। चीन ने वैश्विक विनिर्माण को देश में आकर्षित करने के लिए अपने अवसंरचना यानी इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर बहुत अधिक पैसा खर्च किया है। परंतु पिछले कुछ समय से कुछ कारणों से चीन के विनिर्माण उद्योग की रफ्तार में कुछ कमी देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों के अनुसार कोविड-19 महामारी, ऊर्जा आवश्यकता, कोयले की कमी तथा कार्बन उत्सर्जन मानकों के कारण चीन के विनिर्माण उद्योग पर प्रभाव पड़ रहा है। दुनिया के अन्य देश इन सभी समस्याओं से सबक लेते हुए अब अपने विनिर्माण को चीन से बाहर निकालकर अन्य देशों में भी स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं जिससे कि किसी वैश्विक समस्या में अपने जोखिम को कम किया जा सके। सेमीकंडक्टर उद्योग में आए संकट के कारण भी चीन के विनिर्माण उद्योग पर बहुत गहरा असर पड़ा है साथ ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका एवं चीन के व्यापार युद्ध का भी असर चीन की विनिर्माण सुस्ती के रूप में दिखाई देता है।

विश्व विख्यात खिलौना कंपनी एसब्रों में चीन में अपने उत्पादन को आधा करके भारत में अपने संयंत्र स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रहा है। एप्पल का आईफोन तथा ऐमेज़ॉन का इको बनाने वाली ताइवान की कंपनी फॉक्सकॉन भी अब भारत में अपने निर्माण संयंत्रों की स्थापना पर कार्य कर रहा है।

क्या भारत भविष्य की विश्व फैक्ट्री बनेगा?

भारत को वर्तमान में विनिर्माण क्षेत्र में न केवल आत्मनिर्भर बनने अपितु इस क्षेत्र की महाशक्ति बनने की आवश्यकता है। जब चीन का विनिर्माण उद्योग निरंतर गिरावट की ओर बढ़ रहा है तो ऐसे में भारत का विनिर्माण उद्योग दुनिया के लिए एक बेहतर संभावना बन कर उभर रही है।

अप्रैल 2021 से जनवरी 2022 तक भारत में 335 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का सामान निर्यात किया था। इसमें भारत ने खनिज उत्पाद, रासायनिक उत्पाद, कीमती पत्थर एवं धातु, तथा कई कच्चे माल की भी सप्लाई करता है। साथ ही भारत का दवा निर्माण उद्योग भी दुनिया भर में सफल है। भारत पूरी दुनिया के 50% वैक्सीन बाजार पर कब्जा करता है अमेरिका के जेनेरिक दवाओं के 40% कारोबार पर भारत का कब्जा है साथ ही ब्रिटेन के कुल दवाओं की मांग का 25% भारत पूर्ण करता है। साथ ही खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योग के द्वारा भी बासमती चावल, मांस, समुद्री भोजन तथा चीनी का निर्यात दुनिया भर में किया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में भारत का विनिर्माण उद्योग बहुत तेजी से ऊपर जाने वाला है। 2025 तक भारत का उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार 21.18 बिलियन यूएस डॉलर का हो जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार भारत के भीतर एक वैश्विक विनिर्माण क्षेत्र बनने की क्षमता है। 2030 तक भारत विश्व की अर्थव्यवस्था में 500 बिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान करने में सक्षम है। साथ ही हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि चीन के विनिर्माण उद्योग के सामने भारत का विनिर्माण उद्योग अभी भी शैशव अवस्था में है। साथ ही ही अपनी देश की जरूरतों को भी पूर्ण करने के लिए भारत चीन सहित अन्य देशों पर निर्भर रहता है।

भारत किसान ने सबसे पहली चुनौती यह है कि वह देश की पहचान को एक बाजार से अधिक विनिर्माण कर्ता के रूप में स्थापित कर सकें। इसके लिए हमें यह जानना होगा कि चीन की तुलना में हम अभी भी कहां पर नीतिगत भूल कर रहे हैं और किन गलतियों के सुधार से हम वैश्विक निवेश को विनिर्माण क्षेत्र में आकर्षित कर सकते हैं।भारत के मुकाबले चीन दुनिया में 8 गुना अधिक मूल्य का सामान विश्व के अन्य देशों को निर्यात करता है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक मशीनरी उपकरण तथा इलेक्ट्रिकल कलपुर्जे भी शामिल है।2021 भारत का व्यापार चीन के साथ 125.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर पहुंच गया था। इसमें चीन से 97.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आयात किया गया एवं मात्र 28.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया गया। यह बात स्वयं सिद्ध करती है कि भारत अभी भी विनिर्माण के बारे में चीन पर कितना अधिक निर्भर है। यद्यपि पिछले 2 वर्ष के रिकॉर्ड में भारत का निर्यात भी 50% बढ़ा है परंतु इसमें केवल समुद्री भोजन तथा कच्चा माल ही निर्यात किया गया।

चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 2017 के 15.8 बिलियन अमेरिकी डालर से बढ़कर 2021 में 16.4 बिलियन अमेरिकी डालर हो गया है। हमारे देश की अवसंरचना चीन से काफी कमजोर है जैसे रेल तथा रोड की कनेक्टिविटी हो या स्टोरेज क्षमता या फिर संचार की आवश्यकता हर क्षेत्र में चीन के पास स्टेट ऑफ द आर्ट समाधान मौजूद है जबकि भारत मैं अवसंरचना के विकास की कहानी 2014 में केंद्र में मोदी की सरकार आने के बाद प्रारंभ होती है।

भारत का चीन पर बैटरी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों इलेक्ट्रिक व्हीकल तथा उसके उपकरणों हेतु चीन पर पूरी तरह से निर्भर होना औद्योगिक विकास के लिए अच्छा संकेत नहीं है। मार्च 2021 तक भारत इलेक्ट्रॉनिक चिप्स के लिए 100% अन्य देशों पर निर्भर था। संयुक्त राष्ट्र के औद्योगिक विकास समूह के वैश्विक नवाचार सूची 2021 में 132 देशों में भारत का 46 वा स्थान था।ॉ

केंद्र में नरेंद्र मोदी जी की सरकार आने के बाद भारत के विनिर्माण उद्योग कि विकास भागीरथ प्रयास किए गए हैं। विश्व के निर्माण को आकर्षित करने के लिए घरेलू औद्योगिक परिस्थितियों को मित्रवत किया जा रहा है।

मोदी सरकार के भागीरथ प्रयास:
औद्योगिक विकास के लिए मोदी सरकार बहुत गंभीरता से कार्य कर रही है एवं इसी क्रम में मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में मेक इन इंडिया को जारी किया था तथा पूरे औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए इसी क्रम में स्किल इंडिया तथा उत्पादन से जुड़े हुए इंसेंटिव कार्यक्रम भी लांच किया गया है।

मेक इन इंडिया कार्यक्रम का लक्ष्य है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण उद्योग का योगदान 14% से बढ़ाकर 25% किया जा रहा है। साथ ही इस कार्यक्रम के अंतर्गत निवेश कौशल विकास नवाचार तथा बौद्धिक संपदा के अधिकारों की रक्षा को भी सुनिश्चित किया जा रहा है। एक जनपद- एक उत्पाद के द्वारा हर एक जनपद की इस औद्योगिक क्रांति भागीदारी को सुनिश्चित करने की योजना बनाई गई है। इसका लाभ क्षेत्रीय समृद्धि के रूप में ग्रामीण एवं दूर दराज के क्षेत्रों को मिलेगा।

15 जुलाई 2015 को स्किल इंडिया को लोगों में औद्योगिक तथा स्वरोजगार कौशल का विकास करने के लिए लागू किया गया था। इसका लक्ष्य 2022 तक 300 मिलियन युवाओं को कौशल युक्त श्रम शक्ति के साथ तैयार करना है।

पीएलआई स्कीम को सरकार द्वारा 2020 में जारी किया गया था जो एक निर्गम आधारित योजना है यानी उत्पादन करता के द्वारा उत्पादन किए जाने पर उन्हें इंसेंटिव के रूप में धन आपूर्ति की जाएगी। प्रारंभिक स्तर पर इसे ऑटोमोबाइल नेटवर्किंग प्रोजेक्ट खाद्य प्रसंस्करण उच्च रासायनिक उद्योग तथा सोलर ऊर्जा के फोटो वॉल्टाइक प्लेट के निर्माण जैसे 10 विनिर्माण क्षेत्रों के लिए जारी किया गया है।

मई 2021 में उच्च गुणवत्ता के बैटरी निर्माण हेतु 18000 करोड की पीएलआई स्कीम को जारी किया था। सितंबर 2021 में ऑटो उद्योग तथा ड्रोन उद्योग में विनिर्माण क्षमता को बढ़ाने के लिए 26058 करोड रुपए का पीएलआई स्कीम लाया गया। सेमीकंडक्टर में आत्मनिर्भर बनने तथा आयात को कम करने के लिए सरकार द्वारा 76000 करोड रुपए जारी किए गए हैं।

मोदी सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तथा सेमीकंडक्टर के विनिर्माण के प्रसार के लिए भी एक स्कीम लांच किया है। इसके लिए अगले 8 वर्षों में 3285 करोड़ रुपए इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट तथा सेमीकंडक्टर के निर्माण में खर्च किए जाएंगे। अवसंरचना की समस्या का समाधान करने की दिशा में भारत सरकार ने लगभग 1.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश अपने अवसंरचना के विकास में किया है।

पीएम गति शक्ति विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों की बुनियादी ढांचा योजनाओं जैसे भारतमाला, सागरमाला, अंतर्देशीय जलमार्ग, शुष्क/भूमि बंदरगाहों, वायुसेवाओं आदि को शामिल करेगी। आर्थिक क्षेत्र जैसे कपड़ा क्लस्टर, फार्मास्युटिकल क्लस्टर, रक्षा गलियारे, इलेक्ट्रॉनिक पार्क, औद्योगिक गलियारे, मछली पकड़ने के क्लस्टर के कनेक्टिविटी में सुधार और भारतीय व्यवसायों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए कृषि क्षेत्रों को कवर किया जा रहा है। यह परियोजना भास्कराचार्य नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस एप्लिकेशन एंड जियोइन्फॉर्मेटिक्स द्वारा विकसित इसरो इमेजरी के साथ स्थानिक योजना उपकरण सहित व्यापक रूप से प्रौद्योगिकी का लाभ उद्योगों को सुनिश्चित करेगा जिससे संचार एवं इंटरनेट आदि के उच्च गुणवत्ता के साथ सूचनाओं के समन्वय और विनिमय को सुनिश्चित किया जा सके।

भारत द्वारा बहुत तेजी से कई देशों के साथ मुक्त व्यापर अनुबंध हस्ताक्षर किये जा रहे हैं जिससे देश में निर्मित बस्तुओं को एक व्यापपक बाजार मिले। क्वाड समूह के द्वारा आपूर्ति श्रंखला को और तीव्र कर हिन्द प्रशांत क्षेत्र में व्यापार को सुनिश्चित करना, कई क्षेत्रों में सौ प्रतिशत विदेशी निवेश की स्वीकृति, सिंगल विंडो व्यवस्थाओं से निवेश को और अधिक सुरक्षित किया जा रहा है।

चीन के द्वारा सीमा पर किए जा रहे गतिरोध के कारण भारत में आर्थिक मोर्चे पर नुकसान पहुंचाने के लिए चीन के कई सामानों के आयात पर रोक लगा दिया है। परंतु आयात का नियंत्रण स्थाई समाधान नहीं है अभी तुम इसके लिए अपने देश के भीतर ही विनिर्माण को मजबूती प्रदान करके हम चीन से अपनी निर्भरता को हटाते हुए आत्मनिर्भर देश की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसी स्थिति प्राप्त करने के बाद भारत किसी भी सामरिक स्थिति में भी चीन को माकूल जवाब दे सकेगा। मोदी सरकार जिस प्रकार से ईमानदार प्रयास करते हुए देश के अवसंरचना के विकास तथा विनिर्माण में निवेश कर रही है विश्वास से कहा जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब भारत, चीन से विश्व की फैक्ट्री का ताज छीन कर स्वयं के मस्तक पर धारण कर लेगा।

 (लेखक IIM कलकत्ता Alumni, में तकनीकी प्रबंधन सलाहकार हैं व स्तंभकार हैं)
 संपर्क : 8750091725

image_pdfimage_print


सम्बंधित लेख
 

Get in Touch

Back to Top