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देसी शिक्षा नीति के लिए सात समंदर पार से आई एक पाती

माननीय महोदय,
शिक्षा नीति के संदर्भ में अपने अपने विचार देश के हित में आपके सामने प्रस्तुत किए जा रहें है।आम जनता को अवसर दिया जाता तो बहुत ही अच्छा था। लेकिन फिर भी ये सभी विचार आम जनता को ध्यान में रख कर ही दिए जा रहे हैं।

जिस देश में अपनी भाषा का मान नहीं, उस देश का इससे बड़ा अपमान नहीं ।
अंग्रेज़ी भाषा से है प्यार, गुलामियत अंग्रेज़ों की आज भी क्यूँ बरक़रार ।
अपनी भाषा का यदि किया ना सत्कार, विश्वगुरू बनने का सपना होगा न साकार ।
सीना तान खड़े हैं आज सभी छोटे बड़े देश , अपनायें हैं अपनी भाषा अपना भेष ।

आख़िर क्यों हम बाध्य हैं अपनी ही पाठशालाओं में प्रारम्भ से ही अंग्रेज़ी को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाने के लिए। हमें इस गुलामियत के बंधन से ऊपर उठना होगा। कुछ ठोस क़दम उठाने होंगे और उनके लिए यही सुअवसर है ।

१. प्रारम्भ में अपनी प्रांत की शिक्षा के साथ हिंदी भी अनिवार्य विषय होना चाहिए।
२.कक्षा पाँच से अंग्रेज़ी और संस्कृत का विकल्प।
३. स्वास्थ्य लाभ के लिए योग के साथ साथ आयुर्वेद का ज्ञान भी आवश्यक हो तो और भी अच्छा है।
४.भारतीय सभ्यता संस्कृति की जड़ें सुदृढ़ करने के लिए अत्यंत आवश्यक है, अपने देश और प्रांत की भाषा में ही शिक्षा दी जाए। सम्पूर्ण देश में भाषा का एक ही रूप होना भी अत्यंत आवश्यक है। ऊँच नीच , अमीर ग़रीब , छोटे बड़े का भेदभाव मिटाने में भाषा की एकरूपता का मन्त्र अत्यंत सहायक होगा।
५. देवनागरी लिपि अपने में एक महत्वपूर्ण लिपि है।हिंदी के साथ साथ कई अन्य भाषाओं संस्कृत, मराठी , तमिल .तेलगु इत्यादि की लिपि भी देवनागरी ही हो।

संपर्क
सुश्री नीलू गुप्ता
पता:21250 Stevens Creek Blvd, Cupertino, CA 95014, United States
Email: [email protected], Phone: +1 408-864-5300

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