किसी युवा आँख का स्क्रीन से उठकर वास्तविक दुनिया की ओर देखना अपने आप में आज एक असाधारण घटना है। त्वरित छवियों, एल्गोरिदम के शोर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित दृश्यों के इस समय में, सिएटल, अमेरिका की सत्रह वर्षीय ईशा गोयल ने देखने के लिए एक धीमा रास्ता चुना है—कैमरे के शटर की वह लय, जिसमें ठहराव है, प्रतीक्षा है और अनुभव को स्मृति में बदलने की इच्छा है। उसकी यात्रा बाहर की दुनिया की ओर जाती है, लेकिन हर फ्रेम के साथ वह भीतर की ओर भी लौटती दिखाई देती है।
ईशा की तस्वीरों का आकर्षण केवल इस तथ्य में नहीं है कि वे तीन महाद्वीपों के महत्वपूर्ण और पहचानने योग्य स्थलों को अपने भीतर समेटती हैं। उनकी वास्तविक शक्ति उस दृष्टि में है, जिसके माध्यम से ये स्थान हमारे सामने आते हैं। उसके फ्रेम में एक असामान्य पैमाना और स्थापत्यात्मक भव्यता दिखाई देती है—निम्न कोणों का प्रभावशाली इस्तेमाल, विस्तृत क्षितिज, नाटकीय आकाश और अग्रभूमि से दूरस्थ दृश्य तक जाती हुई गहराई। पहाड़ हो या स्मारक, महानगर हो या जंगल, ईशा की निगाह में आते ही वे महज़ दृश्य नहीं रह जाते; वे एक दृश्य-वाक्य का हिस्सा बन जाते हैं।
यहीं उसकी फोटोग्राफी महज़ दस्तावेज़ीकरण से आगे बढ़ती है। वह दुनिया को जैसा है वैसा दर्ज करने के बजाय, धीरे-धीरे उसके भीतर अपनी एक दृश्य दुनिया निर्मित करती प्रतीत होती है।
और इस दृष्टि की सबसे खूबसूरत विशेषताओं में से एक है—साधारण के प्रति उसका संयमित कौतूहल। बाँस का एक झुरमुट, चेरी के पेड़ों के गर्म रंग, टोक्यो की गलियों में रात की रोशनियाँ, पेड़ों के बीच से छनती सुनहरी धूप—ये ऐसे दृश्य हैं जो सामान्यतः हमारी दृष्टि के परिधि में रह जाते हैं। ईशा उन्हें केंद्र में ले आती है। वह दर्शक को याद दिलाती है कि सुंदरता हमेशा किसी असाधारण घटना में नहीं होती; कभी-कभी वह केवल इस बात में होती है कि हम किसी साधारण क्षण के सामने कितनी देर ठहरते हैं।
शायद यहीं से एक फोटोग्राफर का जन्म होता है—कैमरा हाथ में लेने से पहले, देखने की एक सहज और बेचैन प्रवृत्ति से।
इस प्रदर्शनी को देखते हुए मेरे लिए सबसे दिलचस्प प्रश्न यह नहीं रहा कि ईशा ने क्या-क्या देखा है, बल्कि यह कि इन दृश्यों ने उसे किस तरह बदला है। यात्रा केवल स्थानों को नहीं बदलती; वह देखने की हमारी भाषा को भी बदलती है। धूप की कोई विशेष किरण, किसी रंग का सूक्ष्म अंतर, दूर तक जाता क्षितिज, किसी शहर की रात का अकेलापन—हर अनुभव स्मृति में अपना एक छोटा-सा निशान छोड़ जाता है। फिर वही निशान किसी अगली तस्वीर के रंग, संरचना या भाव में अनजाने ही लौट आता है।
इस अर्थ में, ये तस्वीरें यात्राओं की सूची नहीं हैं। वे एक बनती हुई दृष्टि का अभिलेख है।
शायद इस प्रदर्शनी को देखते हुए मेरे साथ भी यही हुआ। मैंने ईशा की तस्वीरों को देखना शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगा कि मैं केवल तस्वीरों का अनुक्रम नहीं, बल्कि एक आँख के बनने की प्रक्रिया देख रही हूँ—एक ऐसी आँख जो दुनिया को देखने के साथ-साथ अपने लिए उसका अर्थ भी तलाश रही है।
दुनिया उसकी आँखों के सामने बदल रही है। और चुपचाप, उसी प्रक्रिया में, उसकी आँखें भी दुनिया के साथ बदल रही है।
‘दुनिया : जैसा मैं देखती हूँ’ का आरंभ आज मुंबई के व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र फोर्ट स्थित Mandapo Art Galleryमें हुआ है और प्रदर्शनी 24 सितंबर तक जारी रहेगी।





