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ये उप्र के मतदाताओँको तय करना है कि वो कैसा शासन वापस चाहते हैं

“सपा शासन का अर्थ अपराधियों का उदय है। याद कीजिए कि कैसे 2006 में सपा (समाजवादी पार्टी) के लोहिया वाहिनी के पांच भाई- पृथ्वीराज, नारायण, उदयराज, हर्षवर्धन और राजवर्धन ने एक पुलिस निरीक्षक राजेश साहनी को अपनी कार की बोनट पर लटकाकर प्रदेश की राजधानी का चक्कर लगाया था। ऐसा इसलिए किया गया था, क्योंकि साहनी ने उनसे ड्राइविंग लाइसेंस दिखाने को कह दिया था। हमें ऐसे और दृश्य देखकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।”

उपरोक्त वक्तव्य जुलाई 2012 का है और इसे स्वर देने वाले राजनीतिज्ञ कोई और नहीं, स्वामी प्रसाद मोर्या है, जो तत्कालीन नेता विपक्ष और बहुजन समाज पार्टी के नेता थे। हाल ही भाजपा की योगी सरकार में पांच साल मंत्री रहने के बाद चुनाव के समय स्वामी प्रसाद मौर्य उसी सपा में चले गए है, जिनके शासनकाल की काली सच्चाई को उन्होंने लगभग 10 वर्ष पहले सबके सामने उजागर किया था। यह घटनाक्रम सपा और स्वामी प्रसाद मौर्य के वास्तविक चरित्र का अच्छा परिचय देता है।

यदि उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा दोबारा सत्ता में आती है, तो राज्य में कानून व्यवस्था की हालत क्या होगी, इसका उत्तर हमें उनकी पिछली सरकार की प्रारंभिक नीतियों और निर्णयों में सहज मिल जाता है। 15 मार्च 2012 को तत्कालीन सपा मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव को पहली बार उत्तरप्रदेश का नेतृत्व संभालने का अवसर मिला था। युवा और नई पीढ़ी के नेता होने के नाते मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश से प्रदेश को पुराने कलंक, धब्बे मिटने की उम्मीद थी, किंतु उन्होंने सत्ता में आते ही आपराधिक पृष्ठभूमि वाले एक दर्जन से अधिक अपने विधायकों को मंत्री बना दिया, तो कुछ दिन बाद समाजवादी पार्टी के प्रति निष्ठा रखने वाले अपराधियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की घोषणा कर दी।

यही नहीं, उसी कालखंड में प्रयागराज स्थित करछना थाने के तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक राधेश्याम राय को सपा सरकार ने इसलिए अलीगढ़ स्थानांतरित कर दिया था, क्योंकि उन्होंने तब नैनी जेल बंद सपा विधायक विजय मिश्रा को सुख-सुविधाओं से लैस वाहन देने से इनकार कर दिया था। अपने इस ‘महा-अपराध’ और ट्रांसफर की ‘राजकीय सजा’ मिलने से पहले उस पुलिस अधिकारी के साथ जेल बंद में रहा सपा विधायक मारपीट भी कर चुका था।

वर्ष 2012-17 से पहले अगस्त 2003 से लेकर मई 2007 तक अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार रही थी। वे तब तीसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। इससे पहले उनके दो कार्यकाल- 1989-91 और 1993-95 में अल्पकालीन रहे। 30 अक्टूबर 1990 को निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश, मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में ही दिया गया था, जिसमें कई रामभक्तों की मौत हो गई थी।

यहां से थोड़ा आगे बढ़ते है। वर्ष 2004 में देशभर में लोकसभा चुनाव हो रहे थे। उत्तरप्रदेश की कन्नौज सीट, जहां से अखिलेश यादव आज भी सपा सांसद है- वहां से वे 2004 में भी चुनाव लड़े थे और वे वर्ष 2000 के लोकसभा उप-चुनाव में जीतीं सीट को बचाने हेतु खड़े थे। तब चूंकि प्रदेश में सपा की सरकार आ चुकी थी, इसलिए मतदान के दौरान कन्नौज के छिबरामऊ में कसवा गांव स्थित बाबा हरिपुरी इंटर कॉलेज में सपा कार्यकर्ताओं ने गुंडागर्दी करके बूथ लूटने का प्रयास किया, जिसका स्थानीय निवासी, भाजपा के युवा नेता और पार्टी पोल एजेंट नीरज मिश्रा ने जमकर विरोध किया। यह घटना 5 मई 2004 की थी। उसी दिन देर शाम को नीरज मिश्रा के गायब होने की खबर, तो अगले दिन 6 मई को उसकी सिर कटी लाश ईशन नदी के किनारे मिली।

अब सवाल उठता है कि उस निरपराध ब्राह्मण नीरज मिश्रा का सिर आखिर कहां गया था? इस तरह की संभावनाएं प्रकट की जाती है कि तब नीरज की नृशंस हत्या करके उसका सिर काटकर कन्नौज से लखनऊ ले जाया गया था और उस नेता के सम्मुख प्रस्तुत करके यह सुनिश्चित किया गया था कि सपा की गुंडगर्दी रोकने वाला अब जिंदा नहीं है। मामले में छिबरामऊ कोतवाली में मृतक नीरज मिश्रा के बड़े भाई मुनीष मिश्रा ने कबीरगंज निवासी अशोक यादव, अवनीश यादव, सुनील यादव, मुन्नू यादव, पप्पू यादव, मदारीपुर निवासी हरिविलास यादव, कसावा निवासी ब्रजेंद्र स्वरूप उर्फ गांधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। मृतक नीरज के भाई के अनुसार, “उस समय चुनाव लड़ रहे तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव और उनके समर्थक लगातार पोलिंग बूथ को लूटते हुए आ रहे थे। जैसे वे सभी कसवा पहुंचे, वहां मौजूद मेरे भाई नीरज मिश्रा ने पोलिंग बूथ लूटने से उन्हें रोका। यहां झगड़ा शुरू हो गया, धक्का-मुक्की हुई। यह बात सपा के लोगों को नागवार गुजरी। इसी बात से नाराज़ होकर अखिलेश ने अपने पिताजी से बात की और कहा कि नीरज मिश्रा मुझे जिंदा या मुर्दा चाहिए। इसके बाद सपा के गुड़ों ने नीरज की हत्या कर दी। यह सब पुलिस की देखरेख में हुआ। फिर उसकी सिर कटी लाश को नदी में फेंक दिया गया।”

27 सितंबर 2014 को अदालत ने अभियुक्त अशोक, अवनीश, मुन्नू, पप्पू और हरविलास को धारा 302/149 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई और सभी पर पांच-पांच हजार रुपये का अर्थ दंड लगाया। धारा 201 में पांच-पांच वर्ष की कैद और तीन-तीन हजार रुपये के अर्थ दंड की सजा सुनाई गई। मार्च 2015 में सभी दोषियों को जमानत मिल गई। कई महीने बाद वे सभी हत्या के दोषी मृतक नीरज के घर गए और परिजनों से गालीगलौज, मारपीट की और जान से मारने की धमकी देकर चले गए। यह सभी आज भी स्वतंत्र घूम रहे हैं।

क्या ऐसे में नीरज मिश्रा को न्याय मिल पाएगा? आज उत्तरप्रदेश जब अपनी नई विधानसभा को चुनने जा रहा है, तो इस प्रकार की घटनाओं का संज्ञान लेना फिर से स्वाभाविक और प्रासंगिक हो जाता है।

(प्रख्यात विचारक और चिंतक बलबीर पुंज राज्यसभा के सदस्य रहे हैं और राजनीतिक व सामाजिीक विषयों पर निरंतर लेखन करते आरहे हैं)
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