महर्षि पिंगल के छंदःशास्त्र और आधुनिक कंप्यूटर के binary system तथा coding के बीच संबंध वास्तव में बहुत रोचक है। लेकिन इसे ऐतिहासिक रूप से सही ढंग से प्रस्तुत करना जरूरी है। पिंगल ने आधुनिक अर्थ में “कंप्यूटर” या “binary computer” नहीं बनाया था; उनका उद्देश्य संस्कृत छंदों में लघु और गुरु अक्षरों के विभिन्न संयोजनों को व्यवस्थित ढंग से गिनना और क्रमबद्ध करना था। बाद के गणितीय विश्लेषण में यह व्यवस्था binary-जैसी दिखाई देती है। आधुनिक कंप्यूटर में जहाँ सूचना को दो अवस्थाओं—0 और 1—में व्यक्त किया जाता है, वहीं पिंगल की छंद-पद्धति में दो अवस्थाएँ लघु (L) और गुरु (G) थीं। उदाहरण के लिए चार स्थानों पर दो-दो विकल्प हों तो कुल संयोजन बनते हैं। यही मूल गणित आज digital logic में दिखाई देता है। IIT Kharagpur के एक कंप्यूटर-विज्ञान पाठ्यक्रम में भी पिंगल के छंदशास्त्र को fixed-length short/long patterns की systematic enumeration और binary numeral system के प्रारंभिक विवरण से जोड़ा गया है।

पिंगल की विशेष उपलब्धि केवल दो प्रतीकों का प्रयोग नहीं थी, बल्कि Prastāra (प्रस्तार) की वह विधि थी जिसमें किसी निश्चित लंबाई के छंद में लघु-गुरु के सभी संभावित क्रम व्यवस्थित किए जाते थे। आधुनिक भाषा में इसे combinatorial enumeration कहा जा सकता है। इसके साथ Naṣṭa और Uddiṣṭa जैसी प्रक्रियाएँ किसी दिए हुए क्रमांक से pattern निकालने और किसी pattern का क्रमांक खोजने जैसी समस्याओं से संबंधित थीं—अर्थात इनमें आज के encoding, decoding, indexing और algorithmic thinking से समानता दिखाई देती है। 2007 के एक शोध-पत्र में पिंगल की विधियों को binary-to-decimal तथा decimal-to-binary रूपांतरण, और combinations की गणना जैसी recursive प्रक्रियाओं से जोड़ा गया है। उदाहरण के लिए यदि हम केवल समझाने के लिए लघु = 0 और गुरु = 1 मान लें, तो लघु-गुरु-लघु-गुरु को 0101 लिखा जा सकता है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी है: पिंगल ने स्वयं आधुनिक 0 और 1 के अंक इस्तेमाल नहीं किए थे; उन्होंने लघु और गुरु का प्रयोग किया था। इसलिए “पिंगल ने 0 और 1 वाली binary arithmetic खोज ली थी” कहना अतिशयोक्ति होगा।

इस परंपरा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष मेरु-प्रस्तार (Meru-prastāra) है। इससे विभिन्न संख्या के लघु और गुरु वाले छंदों की संभावनाएँ गिनने की combinatorial पद्धति सामने आती है और इसका संबंध आज के binomial coefficients तथा Pascal's triangle से जोड़ा जाता है। यहाँ भी इतिहास में सावधानी आवश्यक है—पिंगल के मूल ग्रंथ और लगभग दसवीं शताब्दी के हलायुध के भाष्य को एक ही चीज मानना ठीक नहीं है; उपलब्ध परंपरा में Meru की स्पष्ट व्याख्या हलायुध के भाष्य में मिलती है। इसी प्रकार छंदों की मात्रा-संरचना से जुड़ी भारतीय परंपरा में Fibonacci-जैसी recurrence भी दिखाई देती है, जिसे बाद में Virahāṅka और Hemacandra जैसे विद्वानों ने विकसित किया। इसलिए सबसे सटीक निष्कर्ष यह है कि पिंगल का छंदशास्त्र आधुनिक कंप्यूटर का प्रत्यक्ष पूर्वज या coding की सीधी ऐतिहासिक शुरुआत नहीं था, लेकिन उसमें binary-जैसी दो-अवस्था वाली representation, systematic enumeration, indexing और combinatorial algorithmic thinking के अत्यंत प्राचीन उदाहरण मिलते हैं। आधुनिक computer coding ने इन्हीं प्रकार की अवधारणाओं को बहुत आगे बढ़ाकर bits, bytes, logic gates, machine language और algorithms में विकसित किया। इस अर्थ में पिंगल का योगदान “कंप्यूटर बनाया” नहीं, बल्कि सूचना को दो अवस्थाओं में व्यवस्थित करने और संभावित patterns को algorithm की तरह गिनने की एक प्राचीन गणितीय मिसाल के रूप में अधिक महत्वपूर्ण है।