(विश्व रंगमंच दिवस-27 मार्च)
प्रतिरोध का स्वर नुक्कड़ नाटक का मूल स्वभाव है. नुक्कड़ नाटक समाज को जागृत करने की जवाबदारी स्वाधीनता के बाद से ही शुरू हो गया था. सफदर हाशमी और नुक्कड़ नाटक पर्याय माने जाते हैं. नुक्कड़ नाटक मतलब वह आवाज जो आम आदमी का होता है. हर किस्म की तकलीफ और बैचेनी को वह भीतर ही भीतर झेलता रहता है लेकिन व्यक्त करने का कोई मंच नहीं होता है और इसी बैचेनी को आवाज देने का काम नुक्कड़ नाटक करता रहा है. मौसम कैसा भी हो, जगह कोई भी हो लेकिन नुक्कड़ नाटक देखने के लिए हुजूम जुट जाता है. बोल जमूरे के साथ जब आवाज गूँजती है तो वह लोगों के दिलो-दिमाग में बैठ जाती है. कोई 15-20 मिनट का यह नुक्कड़ नाटक लोगों के मन को सालों-साल तक उद्वेलित करता है. नुक्कड़ नाटक का मकसद भी कुछ ऐसा ही है. नुक्कड़ नाटक समाज की अपरिहार्य आवाज है और इस बारे में चिंता करना जरूरी है. यह वैचारिक आंदोलन है और इसके साथ ही शिक्षित और अशिक्षित दोनों समाज को नुक्कड़ नाटक जीवित रखता है. विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर नुक्कड़ नाटक के अतीत और भविष्य पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है.
समाज में जो कुछ घट रहा है, उसे दिखाने और बताने की जवाबदारी रंगमंच और सिनेमा की है. समाज के भीतर होने वाली नकरात्मक घटनाओं और उससे पडऩे वाले परिणामों के बारे में हमें सचेत होने की जरूरत है. आम आदमी पहले भी और अब भी आम ही बना रहता है. लगभग गूँगा और डरा हुआ. फिर उसके साथ समाज, शासन, सरकार कितने भी जुल्म-ज्यादती करे, वह डरा सहमा हर आदेश को मानने के लिए मजबूर होता है. ऐसे में नुक्कड़ नाटक हमसे सीधा संवाद करता दिखता था. समाज से सीधे संवाद का यह प्रभावी माध्यम है और हमने लगभग नुक्कड़ नाटक को भुला दिया है, वैसे ही जैसे अब श्रमिक आंदोलन की गूँज हमें सुनाई नहीं देता है. गुम होती या अपनी उपस्थिति दर्ज ना कराती ऐसी बहुत सी आवाज गुम हो रही हैं या खामोश बैठी हैं.
प्रतिरोध का स्वर नुक्कड़ नाटक का मूल स्वभाव है. सरकारों के खिलाफ आम आदमी को जागृत करने के लिए नुक्कड़ नाटकों का प्रदर्शन सार्वजनिक स्थलों पर किया जाता था. रंगमंच और सिनेमा के लिए भारी-भरकम लागत की जरूरत होती थी और वहीं लगभग शून्य लागत में नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन संभव होता था. प्रदर्शन में कलाकार का अभिनय प्रभावी किंतु सबकुछ सांकेतिक. बहुतेरे लोगों की नजर में यह प्रतिगामी आवाज थी. शोषण, बेरोजगारी, महंगाई, रूढि़वादी परम्परा के साथ अराजकता के खिलाफ सडक़ों पर युवाओं की टोली आवाज बुलंद करती थी. कोई पाँच-दस युवाओं की टोली, कोई तामझाम नहीं, कोई बड़ी प्रापर्टी नहीं और प्रदर्शन शुरू. बुलंद आवाज के साथ लोगों को झकझोर कर रख देती थी. लोग सोचने को मजबूर होते थे और समाज में जड़ता के खिलाफ मन बनने लगता था. सत्ता और सरकार के लिए नुक्कड़ नाटक हमेशा से परेशानी का सबब रहा है क्योंकि समाज के साथ सीधे संवाद से क्रांति ना सही, बगावत ना सही लेकिन एक राय तो जरूर बनता था. और यही बदलाव सत्ता और सरकार की परेशानी का कारण था. बीते दो-तीन दशकों में नुक्कड़ नाटक हाशिये पर है. जमूरा अब लोगों से नहीं बतियाता है.
समाज से सीधे संवाद करते नुक्कड़ नाटक का प्रभाव इतना है कि उससे डरने वाली सत्ता और सरकार ने स्वयं के प्रचार के लिए साधन बना लिया. सरकार की योजनाओं को आम आदमी तक पहुँचाने के लिए नुक्कड़ नाटक के माध्यम से प्रयोग किया जाने लगा. सरकारी प्रचार तंत्र का एक किस्म का भोंपू बना दिया गया नुक्कड़ नाटक. भारी-भरकम बजट के साथ नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन का सिलसिला आरंभ हो गया. गाँव-कस्बों में सैकड़ों के हिसाब से नुक्कड़ नाटक का ठेका दिया जाने लगा लेकिन इसके प्रभाव के आंकलन का कोई ठोस आधार निर्मित नहीं किया गया. सबसे खास बात यह है कि नुक्कड़ नाटक में वे लोग लगे हुए हैं जिन्हें शायद रंगकर्म का अ,ब,स ना मालूम हो. बदलते समय में नुक्कड़ नाटक ना तो प्रतिरोध का स्वर रहा और ना जागरूकता का संदेश, अपितु यह पूर्ण रूप से रोजगार का माध्यम बन गया. हाँ, धन्यवाद कर सकते हैं देशभर के उन शैक्षिक संस्थानों को जहाँ जन-जागरूकता के लिए आज भी नुक्कड़ नाटकों का प्रदर्शन किया जा रहा है. कभी आंशिक प्रतिरोध का स्वर होता है तो सामाजिक कुरीतियों या अक्षर ज्ञान, बीमारियों के खिलाफ जगाने का काम कर रही हैं. इन लोगों ने नुक्कड़ नाटक को जिंदा रखे हुए हैं, यह राहत की बात है.
नुक्कड़ नाटक को सोशल मीडिया ने भी खत्म किया है, यह भी माना जाना चाहिए. तमाम तरह की स्वच्छंदता और अनगढ़ विचारों से लबरेज सोशल मीडिया एकतरफा चला जा रहा है. सोशल मीडिया विचारों का मंच होना चाहिए और नुक्कड़ नाटक का वैकल्पिक मंच बने इस दिशा में भी चिंता करना चाहिए. एक अर्थ में देखें तो सोशल मीडिया भी एक नुक्कड़ है तो यहाँ क्यों नहीं नुक्कड़ नाटक का मंच बनाना चाहिए. छोटे और विचारवान नाटक समाज की आवश्यकता है.  इससे इतर नुक्कड़ नाटक  के मूल स्वरूप की चिंता करना, चर्चा करना और उसे वापस उसी स्वरूप में लौटाने की जरूरत है. नुक्कड़ नाटक  इस बात की भी तस्दीक करता है कि युवा वर्ग बाजार का शिकार नहीं है बल्कि वह अपनी जिम्मेदारी भी समझता है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)