भारतीय उद्योग जगत के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं, जिनके जीवन में सफलता, बुद्धिमत्ता, साहस, विवाद और पतन—सभी एक साथ दिखाई देते हैं। जयंती धर्म तेजा (Jayanti Dharma Teja) ऐसा ही एक नाम है। एक समय उन्हें भारत के सबसे प्रतिभाशाली और दूरदर्शी उद्योगपतियों में गिना जाता था। वे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विश्वासपात्र उद्योगपतियों में शामिल थे। उनकी योजनाओं की चर्चा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि यूरोप और अमेरिका के वित्तीय जगत में भी होती थी। लेकिन कुछ ही वर्षों में वही व्यक्ति भारत के सबसे बड़े आर्थिक घोटालों के आरोपों में घिर गया, देश छोड़कर विदेश भाग गया और कई वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी तलाश चलती रही।

जयंती धर्म तेजा का जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी थे। उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने विज्ञान, अर्थशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का गहन अध्ययन किया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जटिल आर्थिक योजनाओं को इतनी प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत करते थे कि सामने वाला आसानी से प्रभावित हो जाता था। उनकी असाधारण स्मरण शक्ति, आत्मविश्वास और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण ने उन्हें शीघ्र ही उद्योग जगत में पहचान दिला दी।

सन् 1961 में उन्होंने भारत सरकार के सामने एक महत्वाकांक्षी योजना रखी। उस समय भारत का अधिकांश समुद्री व्यापार विदेशी जहाजों पर निर्भर था, जिससे विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा बाहर चला जाता था। धर्म तेजा ने सुझाव दिया कि यदि भारत अपना विशाल व्यापारी जहाज बेड़ा विकसित करे तो देश आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर बन सकता है। यह विचार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अत्यंत पसंद आया। सरकार ने उनकी कंपनी को प्रोत्साहन दिया, विदेशी ऋणों के लिए सरकारी गारंटी उपलब्ध कराई और भारतीय वित्तीय संस्थानों ने भी उन्हें उदारतापूर्वक ऋण दिए। कुछ ही वर्षों में उनकी जयंती शिपिंग कॉर्पोरेशन भारत की सबसे तेजी से विकसित होने वाली निजी शिपिंग कंपनी बन गई।

सफलता के साथ-साथ धर्म तेजा की प्रतिष्ठा भी तेजी से बढ़ी। वे दुनिया के अनेक देशों की यात्रा करते थे, बड़े-बड़े बैंकों के अधिकारियों से मिलते थे और अंतरराष्ट्रीय उद्योग जगत में भारत का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते थे। उस समय भारतीय मीडिया उन्हें आधुनिक भारत के नए औद्योगिक नायक के रूप में प्रस्तुत करने लगा था। उनकी जीवनशैली भी किसी वैश्विक उद्योगपति से कम नहीं थी। वे निजी विमानों से यात्रा करते, विश्व के प्रतिष्ठित व्यापारिक सम्मेलनों में भाग लेते और विदेशी निवेशकों के बीच भारत की नई आर्थिक संभावनाओं का चित्र प्रस्तुत करते थे।

लेकिन इसी दौरान उनकी कंपनियों के वित्तीय लेन-देन पर संदेह के बादल भी मंडराने लगे। बाद में जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि उन्होंने कई जहाज अपनी ही विदेशी कंपनियों के माध्यम से वास्तविक कीमत से कहीं अधिक मूल्य पर खरीदे। आरोप यह भी था कि जहाजों की कीमत बढ़ाकर दिखाई गई, विदेशी ऋणों का अनुचित उपयोग किया गया और विभिन्न देशों में स्थापित कंपनियों के माध्यम से धन का जटिल हस्तांतरण किया गया। यद्यपि धर्म तेजा ने इन सभी आरोपों का लगातार खंडन किया, फिर भी सरकारी जांच में वित्तीय अनियमितताओं के पर्याप्त संकेत मिलने का दावा किया गया।

सन् 1966 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इन मामलों की जांच और तेज हुई। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, धर्म तेजा भारत छोड़कर पहले यूरोप, फिर अमेरिका और बाद में कोस्टा रिका चले गए। भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन यह आसान नहीं था। उस समय कोस्टा रिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जोसे फिगुएरेस के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों की भी चर्चा हुई, जिससे मामला और अधिक जटिल हो गया। कई वर्षों तक भारतीय एजेंसियाँ विभिन्न देशों में उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करती रहीं।

आखिरकार जुलाई 1970 में लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद उनका भारत प्रत्यर्पण हुआ और उन पर मुकदमा चलाया गया। अदालत ने 1972 में उन्हें धोखाधड़ी, जालसाजी और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों में दोषी ठहराते हुए कारावास की सजा सुनाई। यह मामला उस समय स्वतंत्र भारत के सबसे चर्चित कॉर्पोरेट घोटालों में गिना गया।

धर्म तेजा ने अपने जीवन के अंतिम समय तक यह दावा किया कि वे किसी आर्थिक अपराध के दोषी नहीं थे। उनका कहना था कि उनके विरुद्ध राजनीतिक कारणों से कार्रवाई की गई और उनके उद्योग को जानबूझकर निशाना बनाया गया। उन्होंने कई साक्षात्कारों में स्वयं को एक दूरदर्शी उद्योगपति बताया, जिसकी योजनाओं को राजनीतिक परिस्थितियों ने विफल कर दिया। हालांकि अदालतों के निर्णय और उपलब्ध सरकारी अभिलेख उनके इन दावों की पुष्टि नहीं करते।

धर्म तेजा के जीवन से जुड़ा एक लोकप्रिय दावा यह भी है कि वे बाद में स्विट्ज़रलैंड सरकार के सलाहकार बन गए थे। किंतु उपलब्ध विश्वसनीय ऐतिहासिक अभिलेखों, न्यायिक दस्तावेजों और प्रतिष्ठित समाचार स्रोतों में इस दावे का कोई प्रमाण नहीं मिलता। संभवतः विदेशों में उनके व्यापक संपर्कों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय जगत में उनकी सक्रियता के कारण यह कथा प्रचलित हो गई, परंतु इसे ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।

जयंती धर्म तेजा का निधन 25 दिसंबर 1985 को अमेरिका के न्यू जर्सी में हुआ। उनके साथ एक ऐसे व्यक्ति का जीवन समाप्त हुआ जिसने भारत के औद्योगिक इतिहास में असाधारण सफलता और अभूतपूर्व विवाद—दोनों का अनुभव किया। आज भी इतिहासकार उनके बारे में एकमत नहीं हैं। कुछ उन्हें अत्यंत प्रतिभाशाली लेकिन अत्यधिक जोखिम लेने वाला उद्योगपति मानते हैं, जबकि कुछ उन्हें स्वतंत्र भारत के शुरुआती दौर के कॉर्पोरेट घोटालों का प्रमुख चेहरा मानते हैं। संभवतः सत्य इन दोनों धारणाओं के बीच कहीं स्थित है। इतना निश्चित है कि धर्म तेजा की कहानी हमें यह सिखाती है कि केवल प्रतिभा और महत्वाकांक्षा पर्याप्त नहीं होती; दीर्घकालीन सफलता के लिए पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिक आचरण भी उतने ही आवश्यक हैं।