मीरा रोड, मुंबई।  स्वर संगम फाउण्डेशन के तत्वावधान में रविवार, 9 अगस्त 2026 को स्थानीय विरंगुला केन्द्र, मीरा रोड में एक भव्य साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह शाम बेहद समृद्ध पद्य  और गद्य लेखक-कवि संजय भिसे के काव्यपाठ के नाम रही। इस दौरान शहर के लगभग सभी वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार, साहित्यकार और प्रबुद्ध श्रोता भारी संख्या में उपस्थित थे।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए संस्था की ओर से डॉ. हरि प्रसाद राय ने सभी अतिथियों और कवि संजय भिसे का आत्मीय स्वागत किया। अपने संक्षिप्त स्वागत वक्तव्य में डॉ. राय ने संजय के माता-पिता के प्रति विशेष आभार व्यक्त करते हुए कहा कि एक मराठी भाषी परिवार होने के बावजूद उन्होंने संजय को हिंदी माध्यम के विद्यालय में पढ़ने का अवसर दिया। यह एक विरल और अनुकरणीय घटना है, जिसके फलस्वरूप आज हिंदी भाषा को एक बेहद समृद्ध कवि मिला है। उन्होंने कहा कि संजय ने मराठी जहाँ अपने घर-परिवार और स्वाध्याय से सीखी, वहीं हिंदी को अपनी साधना से अर्जित किया। यही वजह है कि वे दोनों भाषाओं में समान अधिकार से अभिव्यक्ति पाते हैं।

गोष्ठी का कुशल संचालन करते हुए शैलेश सिंह ने संजय भिसे के साहित्यिक अवदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि संजय अपने युवाकाल से ही हिंदी और मराठी संस्कृति के बीच एक मजबूत पुल का काम कर रहे हैं। उन्होंने सफदर हाशमी और कृष्ण चंदर के नाटकों के मंचन से लेकर मराठी के महान कथाकार बाबूराव बागुल के कालजयी संग्रह 'जब मैंने जात छिपाई' का बेहतरीन हिंदी अनुवाद किया, जिसे महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी के 'बाबू विष्णु पराडकर सम्मान' से नवाजा जा चुका है और हाल ही में जिसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने डॉ. ए.एच. सालुंखे की पुस्तक 'सर्वोत्तम भूमिपुत्र गौतम बुद्ध', डॉ. बाबा साहब की सचित्र आत्मकथा व सूक्तियों, कॉमरेड आर.बी. मोरे की 'चवदार तालाब सत्याग्रह' और अविनाश सहस्रबुद्धे की 'बुद्ध का जनवादी धर्म' जैसी महत्वपूर्ण कृतियों का हिंदी अनुवाद कर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। शैलेश सिंह ने बताया कि संजय की वैचारिकी के आधार स्तंभ जहाँ बुद्ध, मार्क्स और डॉ. आंबेडकर हैं; वहीं सामाजिक न्याय के प्रेरणा स्रोत ज्योतिबा फुले व सावित्रीबाई फुले हैं। साथ ही महाराष्ट्र की संत परंपरा (ज्ञानेश्वर, तुकाराम, चोखा और बहिना बाई) उनकी काव्य-संवेदना के मूल प्रेरक हैं।अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कवि संजय भिसे ने अपने अतीत को याद करते हुए कहा कि उनका बचपन उल्हासनगर की मजदूरों की एक ऐसी बस्ती में बीता जहाँ हिंदी और मराठी भाषी परिवार साथ रहते थे। लावणी, बिरहा, पवाड़ा, कजरी और फाग के समवेत राग ने उनके लोक-मानस को गढ़ने का काम किया। स्कूली दिनों में वे कॉमरेड सूर्यदेव उपाध्याय द्वारा संचालित 'लेनिन लाइब्रेरी' से जुड़े, जहाँ उन्हें वाम प्रगतिशील चेतना के संस्कार मिले। यहीं पर प्रसिद्ध कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी और लेखक-अभिनेता विशाल वाटवानी के साथ उनकी मैत्री हुई और उनका झुकाव पूरी तरह साहित्य की तरफ हो गया। काव्यपाठ से पूर्व उन्होंने अपने व्यक्तित्व को आकार देने वाले अपने गुरु कॉमरेड सूर्यदेव उपाध्याय के स्मृतिशेष को सादर नमन किया।

इसके पश्चात संजय भिसे ने अपनी चुनिंदा कविताओं का बेहद प्रभावशाली पाठ किया। उन्होंने 'मेरा जन्म', 'पाटाचर्या के भींगे हुए दस पैसे', 'थेरी व्यथा', 'मधुबाला की क़ब्र पर', 'मेरे पिता का एकल काव्यपाठ', 'कान्हेरी की गुफाएं', 'पुरानी प्रेमिकाएं', 'ज्ञानाई', 'यशोधरा', 'दादी की सलाह', 'हिंसा न भवति', 'शिनाख्त', 'मैं लिखना नहीं चाहता', 'अप्रकाशित', 'मैं मरना चाहता हूं', 'चौथी सीट' और 'एकाउंट क्लोज्ड' जैसी मर्मस्पर्शी कविताएँ सुनाईं। मंद्र सप्तक से शुरू होकर स्वर के उच्चतम सोपान तक पहुँचे उनके इस काव्यपाठ ने श्रोताओं को इस कदर स्तब्ध कर दिया कि हॉल में काफी देर तक कविताओं का सुर और उसकी गूँज तैरती रही। प्रसिद्ध लेखिका ललिता अस्थाना के एक सवाल से श्रोताओं की तंद्रा टूटी।

काव्यपाठ पर चर्चा की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ कवि अनूप सेठी ने कहा कि संजय की कविताएँ जीवन की सजीव छवियों से भरी हैं, जैसे कोई कैमरे से दृश्यांकन कर रहा हो। उन्होंने रचनात्मक सुझाव देते हुए कहा कि इन कविताओं की स्फीति थोड़ी ज़्यादा है, यदि इन्हें थोड़ा संपादित किया जाए तो यह और बेहतर होंगी।
प्रसिद्ध कवि व अनुवादक श्री विनोद दास ने कहा कि संजय की कविताओं में इतिहास-बोध का बहुत ख़ूबसूरत इस्तेमाल हुआ है। पीड़ा, प्रेम और करुणा से भरी ये कविताएँ मन को भीतर तक छूती हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि संजय की कविताएँ दलित चेतना से युक्त तो हैं, पर उनमें पैंथर जैसा सीधा आक्रोश नहीं है; जबकि जहाँ आवश्यक हो, वहाँ आक्रोश भी दिखना चाहिए।

अंत में गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डॉ. विजय कुमार ने संजय भिसे की कविताओं की सराहना करते हुए कहा कि इनमें सूक्ष्म डीटेल्स और ऑब्जर्वेशन कमाल के हैं। ये कविताएँ समकालीन दबावों से मुक्त हैं और अपने समय की विसंगतियों को नए टूल्स से डील करती हैं। ललिता अस्थाना जी के सवाल का जवाब देते हुए डॉ. विजय कुमार ने अर्नेस्टो कार्डिनल की प्रसिद्ध कविता 'मर्लिन मुनरो' का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कवि उन चरित्रों के भी पार जाना चाहता है जो इस चकाचौंध भरी दुनिया के पीछे छिपे हैं; वह उस अकेलेपन, उदासी और शोषण के भीतर तक जाकर सच को सामने लाना चाहता है।