भारत में मौसम की भीषण घटनाएं बहुत अधिक बार और बहुत तीव्र रूप में देखने को मिल रही हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट व डाउन टू अर्थ की 4 नवंबर को जारी रिपोर्ट, 'क्लाइमेट इंडिया 2026: एन असेसमेंट ऑफ एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स' के अनुसार, अब हर दिन एक आपदा आना एक आम बात हो गई है।
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2022 से 2026 के बीच, हर साल 86 से 99 प्रतिशत दिनों में मौसमी की अप्रत्याशित घटनाएं घट रही हैं। बल्कि साल दर साल इसमें बढ़ोतरी भी हो रही है।
साल 2022 और 2023 में मौसम की मार झेलने वाले दिनों का अनुपात 86 से 88 प्रतिशत के बीच था, जो 2024 में बढ़कर 93 प्रतिशत हो गया। साल 2024 वैश्विक स्तर के साथ-साथ भारत का भी अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा। 2025 में यह अनुपात और बढ़कर रिकॉर्ड 99 प्रतिशत पर पहुंच गया।
रिपोर्ट बताती है कि 2026 में 1 जनवरी से 30 सितंबर के बीच के 273 दिनों में से 251 दिन भारत में चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं। इसका मतलब यह है कि साल के पहले नौ महीनों में से लगभग 92 प्रतिशत समय तक, देश के किसी न किसी हिस्से में कोई न कोई चरम मौसमी घटना घटी। लगातार पांच वर्षों से, भारत के अधिकांश हिस्सों में हर साल कम से कम 100 दिन मौसम की चरम स्थितियों का सामना करना पड़ा।
डाउन टू अर्थ और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने 2022 में एक ओपन-एक्सेस इंटरैक्टिव डेटाबेस शुरू किया था। इसका मकसद चरम मौसमी घटनाओं पर रोजाना नजर रखना है। यह डेटाबेस 2022 से 2026 तक हर साल जनवरी से सितंबर के बीच हुई चरम मौसमी घटनाओं और उनसे हुए नुकसान का मौसमी, मासिक और क्षेत्रवार विश्लेषण उपलब्ध कराता है।
यह आकलन चरम मौसमी घटनाओं से जुड़ी जानकारी के लिए दो प्रमुख सरकारी स्रोतों पर निर्भर है। इनमें भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और केंद्रीय गृह मंत्रालय का आपदा प्रबंधन प्रभाग शामिल हैं। इसके अलावा, घटनाओं की जानकारी जुटाने के लिए मीडिया रिपोर्टों का भी विश्लेषण किया जाता है। खासकर मॉनसून-पूर्व सीजन में मीडिया रिपोर्टें महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि इस दौरान सरकारी आंकड़े पर्याप्त नहीं होते।
इस आकलन में दो प्रमुख बातों पर ध्यान दिया जाता है। पहली, भारत में कितने दिन चरम मौसमी घटनाएं हुईं और दूसरी, इन घटनाओं से कितना नुकसान हुआ। नुकसान का आकलन चार आधारों पर किया जाता है। इंसानी मौतें, प्रभावित फसल का क्षेत्र, क्षतिग्रस्त मकान और पशुधन की मौतें।
इसमें बिजली गिरने, आंधी-तूफान, भारी से अत्यधिक भारी बारिश, भूस्खलन, बाढ़, शीतलहर, लू, चक्रवात, बर्फबारी, धूल भरी आंधी, तेज हवाओं और ओलावृष्टि जैसी घटनाओं को शामिल किया जाता है।
पांच वर्षों में सबसे ज्यादा प्रभावित रहे शीर्ष पांच राज्य
जनवरी से सितंबर तक की पांच साल की अवधि (2022-2026) में मध्य प्रदेश में चरम मौसमी घटनाओं वाले सबसे अधिक 748 दिन दर्ज किए गए। इसके बाद हिमाचल प्रदेश में 740, उत्तर प्रदेश में 653, महाराष्ट्र में 648 और असम में 526 दिन ऐसे रहे। इस आकलन में कुल 1,366 दिनों के आंकड़ों को शामिल किया गया है।
इन पांच वर्षों के दौरान देशभर में चरम मौसमी घटनाओं के कारण कुल 16,303 लोगों की जान गई। इनमें से करीब 65 प्रतिशत मौतें अकेले 2024 से 2026 के बीच हुईं।
पांच वर्षों में मौतें और फसल का नुकसान बढ़ा
चरम मौसमी घटनाओं से होने वाली मौतों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। 2022 में इन घटनाओं के कारण 2,755 लोगों की जान गई थी। 2023 में यह संख्या बढ़कर 2,923 और 2024 में 3,238 हो गई। 2025 में सबसे अधिक 4,064 लोगों की मौत दर्ज की गई। 2026 में यह संख्या 3,320 रही, जो 2022 के मुकाबले 21 प्रतिशत अधिक है।
चरम मौसम का असर खेती पर भी लगातार बढ़ा है। 2022 में 18.4 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ था, जो 2024 में बढ़कर 32 लाख हेक्टेयर हो गया। 2025 में यह आंकड़ा अचानक बढ़कर 94.7 लाख हेक्टेयर पहुंच गया। 2026 में भी 42.5 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ। पांच वर्षों में यह दूसरा सबसे बड़ा वार्षिक आंकड़ा है।
कुल मिलाकर, 2022 से 2026 के बीच कम से कम 2.06 करोड़ हेक्टेयर फसल क्षेत्र को नुकसान पहुंचा। इसमें से 82 प्रतिशत से अधिक नुकसान पिछले तीन वर्षों (2024-2026) में हुआ।
बदल रहा है मौसम का मिजाज
पिछले पांच वर्षों के दौरान देश में मौसमी बदलाव के कई संकेत मिले हैं। सर्दियां पहले के मुकाबले गर्म हुई हैं और शीतलहर की घटनाओं में कमी आई है।
2026 की सर्दियों में शीतलहर और शीत दिवस की घटनाएं पिछले पांच वर्षों में दूसरी सबसे कम रहीं। इस अवधि में पहली बार फरवरी 2026 में ऐसी एक भी घटना दर्ज नहीं की गई। यह पिछले 125 वर्षों में चौथा सबसे गर्म फरवरी महीना भी रहा।
गर्मी का मौसम भी अब पहले से अलग मिजाज दिखा रहा है। मार्च 2026 की शुरुआत में हिमाचल प्रदेश में भीषण लू चली। पांच साल की इस अवधि में यह सबसे जल्दी दर्ज की गई लू की घटना थी। 2024 में इसी तरह की घटना के मुकाबले यह 74 दिन पहले आ गई। इससे संकेत मिलता है कि भीषण गर्मी अब सामान्य समय से काफी पहले दस्तक देने लगी है।
तटीय आंध्र प्रदेश में भी पिछले पांच वर्षों की सबसे शुरुआती लू दर्ज की गई। यह इस बात का संकेत है कि साल के शुरुआती महीनों में हीटवेव की घटनाएं बढ़ रही हैं।
मॉनसून से पहले भी खेती पर मौसम की मार
खेती के लिए अब सिर्फ मानसून का मौसम ही जोखिम भरा नहीं रह गया है। मॉनसून से पहले यानी मार्च से मई का समय भी फसलों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
मार्च से मई 2026 के दौरान कम से कम 0.73 मिलियन हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ। 2023 के बाद पिछले पांच वर्षों में प्री-मानसून सीजन के दौरान फसलों को हुआ यह दूसरा सबसे बड़ा नुकसान है।
देश का कोई भी क्षेत्र मौसम की मार से अछूता नहीं
भारत के सभी प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों में चरम मौसमी घटनाओं वाले दिनों का अनुपात बढ़ा है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में इस बढ़ोतरी की दर अलग रही है।
मध्य भारत में चरम मौसम से प्रभावित दिनों का अनुपात 2022 के 73 प्रतिशत से बढ़कर 2026 में 78 प्रतिशत हो गया। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में यह 63 प्रतिशत से बढ़कर 80 प्रतिशत पहुंच गया।
उत्तर-पश्चिम भारत में 2022 के दौरान 71 प्रतिशत दिन चरम मौसमी घटनाओं से प्रभावित रहे। 2025 में यह अनुपात बढ़कर 94 प्रतिशत हो गया, हालांकि 2026 में घटकर 86 प्रतिशत रह गया।
दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में भी ऐसी घटनाओं का असर बढ़ा है। यहां प्रभावित दिनों का अनुपात 2022 के 46 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 75 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। हालांकि 2026 में यह घटकर 64 प्रतिशत रहा।
बढ़ते जोखिम की चेतावनी
चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता और उनका स्वरूप अलग-अलग मौसमों और क्षेत्रों में भले ही अलग हो, लेकिन देश का कोई भी हिस्सा इनके असर से अछूता नहीं है। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत के सभी क्षेत्रों में मौसम संबंधी जोखिम बढ़ रहे हैं। इसका सीधा असर लोगों की जिंदगी, आजीविका और कृषि पर पड़ रहा है।