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गणित की महान आचार्य विदुषी लीलावती

भारत प्राचीन काल सी वेद विदुषी नारियों की जननी रहा है| यहाँ की नारियों ने प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष के कंधे के साथ कंधा मिला कर कार्य किया है| यह ही भारत की अभूतपूर्व सफलता का कारण रहा है| यह ही कारण था कि भारत को विश्व भर में पूज्य माना जाता था और यहाँ पर विश्व के लगभग प्रत्येक देश के लोग भारत में पढ़ने के लिए, यहाँ से वेदादि शास्त्रों की शिक्षा लेने के लिए आते थे| इस कारण ही विश्व के देशों में भारत को विश्वगुरु का स्थान प्राप्त था| इस देश पर ज्यों ही विदेशी लोगों का अधिपत्य हुआ त्यों ही इस देश की सब व्यवस्थाओं का ह्रास हुआ| इनमें शिक्षा भी एक रही और इस प्रकार भारत विश्व गुरु क पद से पदच्युत कर दिया गया|

इस देश में मैत्रेयी, गारगी आदि अनेक एसी नारियां हुई हैं, जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किया| इस देश में अपाला घोषा जैसी अनेक वेद विदुषी नारियां भी हुई हैं, जिन्होंने उस वेद पर कार्य किया, जिसे आज नारियों के पढ़ने के अधिकार से वंचित कहा जाता है, इस प्रकार वेद पर अत्यधिक और अद्वितीय कार्य करने के कारण उनका नाम वेद के मन्त्रों अथवा ऋचाओं पर गहन कार्य करने के कारण उनका नाम वेद के उस भाग की विदुषी ऋषिका के रूप में लिख दिया गया| इस प्रकार की विदुषी नारियों में लीलावती भी एक थी|

आज हम ही नहीं समग्र विश्व के लोग जो गणित पढ़ रहे हैं, जो बीजगणित अथवा रेखा गणित पढ़ रहे हैं, उसके सम्बन्ध में विश्व चाहे कुछ भी कहे किन्तु सत्य तो यह है कि उस गणित, बीज गणित तथा रेखा गणित का यह रूप इस विदुषी नारी लीलावती की ही देन है| इस कारण वर्षों नहीं शताब्दियों पूर्व से ही भारत के प्रत्येक विद्यार्थी ही नहीं प्रत्येक अध्यापक की वाणी पर लीलावती का नाम रहा है और वह भी बड़े गर्व के साथ| इसका मुख्य कारण यही था कि यह विदुषी नारी लीलावती गणित की आचार्या के रूप में स्थान प्राप्त थीं| जिस समय विदेशों में गणित नाम का शब्द भी लोग नहीं जानते थे अथवा यूँ कहें कि विदेशों में गणित का क ख ग भी कोई नहीं जानता था, उस समय इस लीलावती ने गणित के इस प्रकार के अनेक सिद्धांतों की खोज कर डाली, जिन खोजों को देख तो क्या मात्र सुनकर ही उनकी बुद्धि चकरा जाती है और आश्चर्य चकित हो कर वह आज भी अपने मुंह में अंगुली दबा लेते हैं| आओ इस लीलावती के सम्बन्ध में थोड़ा जानने का प्रयास करें|

आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व ईसा की दशम शताब्दी की बात है, जब भारत के दक्षिण भाग में भास्कराचार्य नाम के एक विद्वानˎ निवास करते थे| यह अपने समय के गणित तथा ज्योतिष शास्त्र के अन्यतम विद्वान थे| इसी भास्कराचार्य के यहाँ एक कन्या ने जन्म लिया था, जिसका नाम लीलावती रखा गया था| यह भास्कराचार्य की एक मात्र संतान थी| कन्या बड़ी सुशील और बुद्धिमानˎ थी| कन्या के जवानी की दहलीज पर पाँव रखते ही उसका विवाह कर दिया गया| इस प्रकार की बुद्धिमती, सुशील और सुन्दर पत्नी को पाकर पति बहुत प्रसन्न था और अपने आप को धन्य मानता था किन्तु परमपिता परमात्मा की व्यवस्था कुछ और ही थी| इस व्यवस्था के अनुसार विवाह के कुछ समय पश्चातˎ ही लीलावाती के पति का देहांत हो गया| पति के देहांत से लीलावती के सर पर मानो कष्टों के पहाड़ ही टूट पडा| वह बड़ी चिंतित और परेशान रहने लगी| अपनी बेटी की यह अवस्था देख कर विद्वानˎ भास्कराचार्य भी एक बार तो विचलित हो गए किन्तु इस समय उन्होंने उसका धैर्य बंधवाना आवश्यक समझा|

भास्कराचार्य जी ने एक योजना बनाई| इस योजना के अनुसार पुत्री के वैधव्य के कष्ट को दूर करने के लिए उसे अपने पास बुलाकर उसे गणित पढ़ाना आरम्भ कर दिया| लीलावती ने भी अपने कष्ट को भुलाने का यह एक उत्तम साधन समझते हुए गणित को दत्ताचित्त होकर समझने का प्रयास करने लगी और इसके लिए उसने दिन रात एक कर दिया| इस प्रकार अपने शेष बचे जीवन को उसने अपने जीवन की उपयोगिता समझते हुए अपना पूरा समय गणित के गूढ़ रहस्यों को समझने का प्रयास करते हुआ इसे निरंतर बनाए रखा| उसके इस प्रयास का ही यह उत्तम परिणाम सामने आया कि वह कुछ ही समय में गणित की आधिकारिक पंडिता बन गई|

लीलावती के इस परिश्रम का ही परिणाम था कि उसने पाटी गणित, बिज गणित तथा गणित के ज्योतिष विषयों पर एक ग्रन्थ लिखा दिया| इस ग्रन्थ का नाम “ सिद्धांत शिरोमणि” रखा गया| इस ग्रन्थ का निर्माण तो भास्कराचार्य के नाम से किया गया किन्तु इस ग्रन्थ का बड़ा भाग लीलावती कि रचना का ही परिणाम था| इसमें जो भाग पाटी गणित के नाम से तैयार किया गया, इसका पूर्ण निर्माण लीलावती ने ही किया था, इस कारण भास्कराचार्य ने ग्रन्थ के इस भाग को लीलावती की रचना होने कि घोषणा भी कर दी| इस प्रकार इस ग्रन्थ के इस भाग का नाम लीलावती के नाम से करके भास्कराचार्य जी ने गणित के क्षेत्र में अपनी बेटी लीलावती का नाम अमर कर दिया|

देश के महानˎ लोग अपने महानˎ कार्य करके इस जगतˎ से विदा हो जाते हैं किन्तु उनका यश और उनकी कीर्ति सदा के लिए अमर हो जाती है| कुछ एसा ही लीलावती के लिए भी हुआ और आज भी गणित के क्षेत्र में उसके योगदान को स्मरण किया जाता है| आज लीलावती जी हमारे मध्य विद्यमान नहीं हैं किंतु उसका किया हुआ कार्य आज भी निरंतर उस के यशोगान गा रहा है| लीलावती ने गणित के क्षेत्र में आश्चर्य जनक कार्य किया और नई ही नहीं नवीनतर और नवीनतम सिद्धान्तों को स्थापित कर समग्र विश्व के लिए उपकार का कार्य किया| इस कारण जब तक यह संसार रहेगा लीलावती का स्मरण होता ही रहेगा|

डॅा. अशोक आर्य
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२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत
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