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लेखन से आजीविका: लिखते तो हो पर करते क्या हो?

लिखते तो हो पर करते क्या हो?- पिछले दिनों यह वाक्य बहुत सुना। इसे एक चुटकुला बताया गया। इस परिपाटी को बदल देने की बात कही गई। किंतु मैं समझ नहीं पा रहा हूँ इस प्रश्न में बुरा या अस्वाभाविक क्या है?

करते क्या हो? यहाँ करने से आशय है कि आजीविका के लिए क्या करते हो? तिस पर मैं कहूँ कि यह तो बड़ी स्वाभाविक बात है, आजीविका के लिए कुछ ना कुछ तो करना ही होता है। पूरी दुनिया रोज़ी-रोटी के लिए कोई ना कोई उपक्रम करती है, लेखक को इससे छूट क्यों चाहिए, उसमें कौन-से सुरख़ाब के पर लगे हैं? लेखक चाहता है कि उसे लेखन से ही आजीविका मिल जाए और वैसा चाहने में कुछ बुराई नहीं है, किंतु है यह दिवास्वप्न। माँग और पूर्ति का सिद्धांत इस आकांक्षा का बहुत दूर तक साथ नहीं देता।

मैं बाज़ार में जाता हूँ तो मुझको जूतों की दुकान दिखलाई देती है। मुझको कपड़ों और गहनों की दुकान दिखती है। खाने-पीने की चीज़ों से बाज़ार सजे रहते हैं। गैजेट्स की दुकानों पर तांता लगा रहता है। मुझको किताब की दुकान कहीं दिखलाई नहीं देती। वास्तव में, एक साधारण मनुष्य के जीवन में किताबों का लगभग कोई स्थान नहीं है, और अगर है तो प्राथमिकताओं की सूची में बहुत नीचे है। जब कोई किताब ख़रीदना ही नहीं चाहता तो क्या लेखक जबरन उसके गले ठेलेगा? या उसके दरवाज़े पर दस्तक देकर सेल्समैन की तरह अपना प्रॉडक्ट ज़िद करके बेचेगा? आज देश में लाखों लेखक हैं। ये सभी लेखन से अपनी आजीविका कमाएँ और अच्छा जीवन बिताएँ, इसके लिए पुस्तकों की दुकान को बाज़ार में जूतों-कपड़ों की दुकानों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करना होगी। वैसा मुझको तो निकट-भविष्य में होता दिखलाई नहीं दे रहा है।

वास्तव में, लिखते तो हो पर करते क्या हो?- इस प्रश्न से आहत होना तो दूर, उलटे मेरा यह मत है कि लेखक को आजीविका के लिए कोई ना कोई कार्य अवश्य करना चाहिए, तभी उसका लेखन सच्चा और निष्ठावान हो सकेगा। एक बार घर-ख़र्च की चिंता से मुक्त होने के बाद जब वह लिखने बैठेगा तो इस बात की धेला चिंता नहीं करेगा कि यह बिकेगा या नहीं, वह अच्छे से अच्छा लिखने पर ध्यान लगाएगा। दूसरी तरफ़, लेखन से आजीविका कमाने वाला लेखक चौबीसों घंटे इसी चिंतन में रमा रहेगा कि वैसा कैसे लिखूं कि बिकूं? पाठक जो पढ़ना चाहता है, उसको वही परोसूं? इन दिनों जो चलन में है, वही लिख डालूं? वैसा कैसे लिखूं कि तालियां पड़ जाएँ, सीटियाँ बज जाएँ, वाहवाही गूँज उठे? फिर आगे वह सोचेगा कि कहीं यह लिखने से फलां नाराज़ तो नहीं जाएगा, ढिकाँ को बुरा तो नहीं लग जाएगा? कालान्तर में वह सोचेगा कि ख़ुद को एक लोकप्रिय ब्रांड कैसे बनाऊं कि ज़्यादा से ज़्यादा आयोजक मुझको अपने कार्यक्रम में बुलाएँ और पैसा दें, स्वयं को एक प्रबंधन-गुरु की तरह कैसे प्रचारित करूँ कि अच्छा कैसे लिखें, अच्छा कैसे बोलें, क्या पढ़ें, सफल पुस्तक कैसे लिखें- इन विषयों पर भाषण दूँ?‌ किताब से भी कमाऊँ, यूट्यूब से भी कमाऊँ, इंस्टाग्राम से भी कमाऊँ, लिट-फ़ेस्ट से भी कमाऊँ- वैसे लेखक का चरित्र फिर क्या बचा, वह तो सेल्समैन बन गया!

गायक राग-दरबारी गाता हुआ भी अच्छा लगता है, लेखक के लिए तो राग-दरबारी एक बुराई है!

मैं एक सज्जन को जानता हूँ। वो लेखक हैं। जब तक उनकी एक बंधी हुई नौकरी थी, उनके लेखन में धार थी, बौद्धिक ताप था। वो अनेक बहसों में मुब्तिला रहते थे, अपनी बात को दृढ़ता से रखते थे। फिर दुर्भाग्य से उनकी नौकरी चली गई और उन्होंने आजीविका के लिए कोई दूसरा काम नहीं किया, लेखन पर ही ध्यान केंद्रित किया। यह अपने में बुरी बात नहीं है, किंतु जब बाज़ार में माँग और आपूर्ति का सिद्धांत आपके पक्ष में ना हो, तब इससे आपके व्यक्तित्व और कृतित्व पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, इसका उदाहरण हैं वो। आज वो यूट्यूब पर वीडियो बनाते हैं। प्रेम दिवस, स्त्री दिवस, पितृ दिवस- हर प्रसंग पर वीडियो लेकर हाज़िर। वीडियो के आख़िर में आवाज़ में चाशनी लपेटकर चिरौरी करते हैं- प्लीज़, मेरे चैनल को सब्स्क्राइब कीजिये, प्लीज़ इस वीडियो को ज़्यादा से ज़्यादा शेयर कीजिये। यह क्या लेखक की भाषा है? तुलसी या कबीर कभी ऐसे बोलते? रबींद्र या निराला बोलते? अज्ञेय कभी ऐसा बोल सकते थे? वो सज्जन इंस्टाग्राम पर पोस्टर बनाते हैं। इन दिनों इंस्टाग्राम पर उद्धरणों का बाज़ार गर्म है तो वो अपने लेखन से कोट्स चुन-चुनकर परोसते हैं, या लिखते ही वैसा हैं जिनमें आप्तवाक्य भरे हों। वो अनेक आयोजनों में कविता पाठ हेतु प्रस्तुत रहते हैं- इतने सारे आयोजकों को साधना भी एक ही प्रतिभा है। वो कभी किसी समकालीन महत्व के प्रश्न पर अपनी बात नहीं रखते। लेखक अपनी मानसिक शांति बनाए रखने के लिए मौन रहे या वह स्वभाव से ही इन बातों से निर्लिप्त रहे- यह एक बात है- किंतु फलाँ बात कहने से मेरे मित्र तो नाराज़ नहीं हो जाएँगे जो मुझको कार्यक्रमों में बुलाते हैं और ढिकाँ बात कहने से मेरे पाठक तो नहीं रूठ जाएँगे जो मेरी किताब ख़रीदते हैं- वैसा डर दूसरी बात है। लेखक जब मुखापेक्षी हो जाता है तो लेखक नहीं रह जाता, उसके व्यक्तित्व के श्लाघनीय गुणों का ह्रास हो जाता है।

लिखते तो हो पर करते क्या हो?- ये एक बहुत स्वाभाविक प्रश्न है। हर लेखक से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए। और जो लेखक लिखने के सिवा कुछ और नहीं करता, उसके लेखन की गहरी पड़ताल की जाना चाहिए कि वो क्या लिख रहा है, कैसा लिख रहा है, किसके लिए लिख रहा है, कहीं किसी को ख़ुश करने के जतन तो नहीं कर रहा, कहीं राग-दरबारी तो नहीं गा रहा? लेखक की आमदनी के स्रोतों और उसके लेखन की सच्चाई के बीच एक सीधा सम्बंध होता है।

*एक लेखक को अपनी रोज़ी-रोटी इसलिए भी कमानी चाहिए ताकि उसके लेखन में नमक बना रहे!*

साभार- https://www.facebook.com/sushobhitsaktawatfanpage/ से

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