मालवा की माटी में लोकजीवन की अपनी एक विशिष्ट सुगंध है। यहां पर्व केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, वे पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों, गीतों और परंपराओं के उत्सव होते हैं। ऐसा ही एक अनूठा लोकपर्व है—‘संजा’।
पितृपक्ष के दिनों में मालवा के गांवों और कस्बों में जब शाम ढलती है, तब घरों की दीवारों पर गोबर से बनाई गई कलात्मक आकृतियां सजने लगती हैं। फूल-पत्तियों, रंगों और प्राकृतिक वस्तुओं से सजी ये आकृतियां केवल सजावट नहीं होतीं; इनके पीछे लोकविश्वास, सौंदर्यबोध और बेटियों की कल्पनाशीलता की पूरी दुनिया बसी होती है।
संजा मुख्यतः किशोरियों और युवतियों का लोकपर्व माना जाता है। वे प्रतिदिन संजा की नई आकृति बनाती हैं और उसके सामने बैठकर सामूहिक रूप से लोकगीत गाती हैं। गीतों में कभी भाई के प्रति स्नेह होता है, कभी मायके की याद, कभी अच्छे वर और सुखी गृहस्थ जीवन की कामना तो कभी प्रकृति और ऋतुओं का सुंदर चित्रण।
संजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लोककला और लोकसंगीत एक साथ दिखाई देते हैं। मिट्टी, गोबर, फूल, पत्तियां और आसपास उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री ही इसके रंग और साधन बन जाते हैं। किसी बड़े कलाकार की आवश्यकता नहीं—घर की बेटियां ही कलाकार होती हैं और घर की दीवार ही उनकी चित्रशाला।
संजा के गीतों में मालवी जीवन की सहजता और मिठास सुनाई देती है। गीतों की पंक्तियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही हैं। यही कारण है कि संजा का साहित्य किसी एक पुस्तक में सीमित नहीं है। वह दादी-नानी की स्मृतियों, मां के गीतों और बेटियों की आवाज में जीवित है।
इस लोकपर्व का एक भावनात्मक पक्ष भी है। भारतीय समाज में बेटी के जीवन का एक बड़ा हिस्सा मायके और ससुराल के बीच की स्मृतियों से जुड़ा रहा है। संजा के गीतों में इस भावभूमि की झलक मिलती है। गीतों में भाई के लिए स्नेह है तो सखियों के साथ बिताए समय की खुशी भी है। इसीलिए संजा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि नारी मन की सहज अभिव्यक्ति भी है।
बदलते समय के साथ संजा की परंपरा भी प्रभावित हुई है। शहरों में संयुक्त परिवारों का स्थान छोटे परिवारों ने लिया है, आंगन छोटे हुए हैं और लोकगीतों की जगह मोबाइल ने ले ली है। परिणामस्वरूप अनेक स्थानों पर संजा बनाने और उसके पारंपरिक गीत गाने की परंपरा कमजोर हुई है। फिर भी मालवा के अनेक गांवों और परिवारों में यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह से निभाई जाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संजा को केवल अतीत की स्मृति बनाकर न रखा जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को संजा के लोकगीत, लोकचित्र और पारंपरिक विधियों का दस्तावेजीकरण करना चाहिए। नई पीढ़ी को इससे जोड़ना चाहिए, ताकि यह परंपरा संग्रहालय की वस्तु न बने, बल्कि जीवित लोकसंस्कृति बनी रहे।
मालवा की पहचान केवल उसके ऐतिहासिक नगरों, मंदिरों और खान-पान से नहीं है। उसकी असली पहचान उन छोटी-छोटी लोकपरंपराओं में भी है, जिनमें सदियों का जीवन बोलता है।
संजा ऐसी ही एक दीवार है, जिस पर मालवा अपनी स्मृतियां लिखता है।
गोबर और मिट्टी से बनी वह आकृति भले ही कुछ दिनों बाद मिट जाए, लेकिन उसके साथ गाए गए गीत, बेटियों की हंसी और मालवा की लोकस्मृति लंबे समय तक जीवित रहती है।
संजा इसलिए केवल दीवार पर बनी आकृति नहीं —मालवा के लोकमन पर अंकित एक जीवित चित्र है।

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और मध्य प्रदेश प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं)