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‘ स्वामी विवेकानंद’ को साक्षात देख अभिभूत हुए मुंबई के दर्शक

हरिद्वार के दिव्य प्रेम सेवा मिशन ने मुंबई के लोगों को एक ऐसी सौगात दी जो वो शायद ही कभी भूल पाएंगे।

हरिद्वार में कुष्ठ रोगियोँ और उनके बच्चों की सेवा में लगी दिव्य प्रेम सेवा मिशन के समर्पित संस्थापक आशीष भाई ने एक अद्भुत कल्पना को साकार करते हुए स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो की धर्म संसद में 11 सितंबर 1893 में दिए गए ऐतिहासिक भाषण के 125 वर्ष पूर्ण होने पर ये आयोजन रखा था। ये कार्यक्रम आशीष भाई की कल्पना और मुंबई की उनकी टीम के सहयोगी जाने माने पत्रकार श्री प्रेम शुक्ल, आरटीआई कार्यकर्ता श्री अनिल गलगली और विले पार्ले के भाजपा विधायक श्री पराग अलवनी के सक्रिय सहयोग से उपस्थित श्रोताओँ और दर्शकों के लिए एक आस्वादीय, रंजक और अभिभूत कर देने वाला कार्यक्रम बन गया।

दो सत्रों में विभाजित इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री श्री देवेंद्र फड़णवीस, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री श्री शिवप्रताप शुक्ला, उत्तर प्रदेश से विधायक एवं पूर्व मंत्री रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया, कार्यक्रम के संयोजक एवं विधायक पराग अलवनी, मॉरीशस से विशेष रुप से उपस्थित आरपीएन सिंह ने स्वामी विवेकानंद पर को लेकर रोचक वक्तव्य दिए और सभी ने अपने अपने वक्तव्यों मे स्वामी विवेकानंद के व्यक्तितत्व के विभिन्न आयामों पर सार्थक चर्चा की।

दूसरे सत्र में जाने माने कलाकार, संगीतकार एवँ राष्ट्रीय संगीत नाटक कला अकादेमी के अध्यक्ष व पद्मश्री से अलंकृत श्री शेखर सेन द्वारा प्रस्तुत एकल नाटक स्वामी विवेकानंद की प्रस्तुति की गई।

जाहिर है विले पार्ले के खचाखच भरे दीनानाथ मंगेशकर हाल में उपस्थित लोगों को रोमांच और रंजकता का जो परितोष मिला उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

शेखर सेन अपने एकल अभिनय द्वारा प्रस्तुत “तुलसी”, “कबीर”, “विवेकानन्द” और “साहेब” से दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुके हैं।

मुंबई के विले पार्ले स्थित दीनानाथ मंगेशकर हाल में स्वामी विवेकानंद को जीवंत करने वाले शेखर सेन ने ‘स्वामी विवेकानंद’ की शुरुआत उनके बचपन की यात्रा से करते हुए इसका समापन शिकागो की धर्म सभा में दिए गए वक्तव्य के पहले दो शब्दों भाईयो और बहनों से किया। भाईयों और बहनों इन दो शब्दों की गूँज और शेखरजी की प्रस्तुति का समाहार ऐसा था कि दो घंटे तक इस रंग प्रयोग का मंत्र मुग्ध हो आनंद ले रहे दर्शकों को ऐसा लगा मानो वे शिकागो की धर्म सभा में बैठे हैं और स्वामी विवेकानंद का संबोधन सुन रहे हैं।

शेखरजी ने स्वामी विवेकानंद की जीवन यात्रा को जिस रोचक संवाद, कुशल अभिनय, ध्वनि और प्रकाश के साथ ही संगीत की स्वरलहरियों और भजनों की गूँज से प्रस्तुत किया उससे ऐसा लगा मानों हाल में बैठे सभी दर्शक स्वामी विवेकानंद से ही संवाद कर रहे हों। दर्शकों और कलाकार के बीच ऐसा नाट्य आस्वाद दुर्लभ ही होता है। शेखरजी की एक और खूबी यह है कि वे अपने किरदार का मेक-अप खुद ही करते हैं, किसी मैकअप कलाकार की सेवा नहीं लेते। लेखक, निर्देशक, गायक,संगीतकार और अभिनेता शेखर सेन हर बार एक नए रूप में दर्शकों के सामने आते हैं। शेखर सेन दुनिया भर में अपने एकल नाटकों की प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं।

स्वामी विवेकानंद के विराट व्यक्तित्व के जीवन के अनगिनत जाने-अनजाने पहलुओं को एक दो घंटे के नाटक में रंजकता व निर्देशकीय कुशलता से प्रस्तुत करना कोई आसान काम नहीं, लेकिन शेखर जी ने इस प्रस्तुति के माध्यम से विवेकानंद के जीवन के उतार-चढ़ावों के साथ ही अपनी कला यात्रा को भी पूरी श्रेष्ठता से प्रस्तुत किया।

स्वामी विवेकानंद के प्रोफेसर, पिता विश्वनाथ दत्त, माँ भुवनेशवरी, माँ शारदादेवी, रामकृष्ण परमहंस को निभाते हुए इस शेखरजी ने अकेले ही दर्शकों को पूरे ढ़ाई घंटे तक बांधे रखा।

शेखर जी ने बहुत ही खूबसूरती से दर्शकों से संवाद करते हुए बताया कि स्वामी विवेकानंद उस दौर में पैदा हुए थे जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था और स्वामी जी भारत को इस गुलामी से मुक्ति देना चाहते थे। उनका मानना था कि भारतीय वेद-पुराण और प्राचीन ग्रंथों को जानने के साथ ही हमें पश्चिमी जगत के विद्वानों के बारे में भी जानना होगा और इसीलिए उन्होंने डेविड ह्यूम से लेकर स्पेंसर जैसे पश्चिमी विद्वानों को गहराई से पढ़ा और स्पेंसर की पुस्तक ‘एजुकेशन’ का का अनुवाद भी किया।

स्वामी विवेकानंद द्वारा ब्रह्मो समाज में शामिल होना, विवेकानंद जब कलकत्ता (अब कोलकोता) के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ रहे थे तो सके अंग्रेज प्रिंसिपल विलियम हैस्टी ने कैसे विवेकानंद की प्रतिभा को पहचान और उन्हें समाधि और ईश्वर के बारे में जानने व समझने से लिए रामकृष्ण परमहंस के पास जाने की सलाह दी। शेखर जी ने इस घटना को अद्भुत कौशल और रंजकता के साथ प्रस्तुत किया। पिता की मृत्यु के बाद घर में घोर गरीबी का सामना करते हुए रामकृष्ण परमहंस से ये कहना कि माँ काली से से मुझे गरीबी से मुक्ति दिलवाने में मदद दिलवाएँ, और फिर रामकृष्ण परमहंस द्वारा विवेकानंद को कहना कि तुम खुद ही माँ से जाकर गरीबी से मुक्ति माँग लो मगर विवेकानंद तीन बार माँ काली के पास जाकर बजाय गरीबी से मुक्ति के, ज्ञान, वैराग्य, ध्यान और समाधि माँग लेते हैं, इन दृश्यों को जिस जीवंतता और कल्पनाशीलता व भावुक कर देने वाले संवादों से शेखरजी ने प्रस्तुत किया उसकी गहरी अनूभूति श्रोताओं के दिल और दिमाग में उतर रही थी।

 

 

पूरी प्रस्तुति को धीर गंभीर रखते हुए भी शेखर जी ने बंदरों के प्रसंग से इसमें सहज हास्य भी पैदा किया कि किस तरह एक बार कुछ बंदर विवेकानंद के पीछे पड़ गए और वे भागने लगे तो तो एक साधु ने उन्हें समझाया कि भागो मत मुकाबला करो। जीवन में जब भी कोई समस्या या मुसीबत आए उससे भागो मत उसका मुकाबला करो। मोबाईल धारी मूर्खों से होने वाले बार बार व्यवधान पर भी उन्होंने सहज हास्य का सहारा लेते हुए कहा कि रावण का जब अंतिम समय निकट आया था तो सभी असुरों को चिंता हो गई थी कि अब हमारा भविष्य क्या होगा, तो रावण ने कहा था कि कलयुग में मोबाईल नामक एक ऐसा यंत्र आएगा जो किसी भी सिध्द कार्य में खलल डालने का कार्य करता रहेगा और इससे हमारी असुरी परंपरा जीवित रहेगी। जाहिर है इतना सुनते ही मोबाईल धारी मुँह छुपाते रहे और फिर किसी मोबाईल की घंटी नहीं बजी।

अमरीका जाने के पहले अपनी माँ और शारदा माँ से अनुमति लेना, अमरीका पहुँचकर पैसे नहीं होने पर अपने आपको वहाँ टिकाए रखने की जद्दोजहद, विश्व धर्म सभा में भाग लेने के पहले ये पता चलना कि यहाँ कोई व्यक्ति नहीं बल्कि किसी संस्था का प्रतिनिधि ही अपने विचार व्यक्त कर सकता है और फिर शेखर जी ने इस प्रस्तुति में स्वामी विवेकानंतद के बचपन, उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस से उनकी भेंट, ईश्वर को जानने की उनकी उत्कट आकांक्षा, रामकृष्ण परमहंस से तार्किक विवाद, भारत से शिकागो जाने और वहाँ पहुँचने पर पैदा होने वाली विपरीत परिस्थितियों में भी चमत्कारिक रूप से उनकी यात्रा का निरंतर जारी रहना, उनकी निष्ठा, , भाषण, यात्राओं, उनके योगदान तथा महत्व को नाटक के माध्यम से प्रस्तुत कर दर्शकों को स्वामी विवेकानंद के कई जाने अनजाने पहलुओं से श्रोताओँ को परिचित कराया।

जब स्वामी विवेकानंद शिकागो जाने की तैयारी कर रहे थे, तब उन्हें राजस्थान के एक रियासत खेतड़ी के राजा ने बुलाया था। उस मुलाकात के दौरान ही राजा खेतड़ी ने नरेंद्र नाथ का नाम बदलकर उनसे कहा था कि वो अमरीका धर्म सभा में अपना अपने इस नए नाम स्वामी विवेकानंद के नाम से ही जाएँ, इसके बाद वो नरेन्द्र नाथ दत्त से स्वामी विवेकानंद हो गए।

कार्यक्रम के पूर्वार्ध्द में दिव्य प्रेम सेवा मिशन, हरिद्वार द्वारा विलेपार्ले पूर्व के दीनानाथ मंगेशकर सभागार में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण का वैश्विक प्रभाव पर एक व्याख्यानमाला आयोजित की गई थी।

स्वामी विवेकानंद पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उद्गार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने भारत को नई पहचान दी। इस योद्धा, संन्यासी के सबसे बडे संदेश सेवा को गत 21 वर्षों से यथार्थ में उतारने वाले दिव्य प्रेम सेवा मिशन के कार्यों को मैं नमन करता हूँ। स्वामी जी का संबोधन भारत की वसुधैव कुटुंबकम विचार धारा का संवाहक हैं।

केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ला ने कहा कि स्वामी जी ने भारतीय संस्कृति के प्रचार का एक नया युग शुरु किया था।

झारखंड विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव की राय में यह कार्यक्रम वीर शिवाजी की भूमि पर संकल्प और सेवा का मिलन हैं।

उत्तर प्रदेश से विधायक एवं पूर्व मंत्री रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया ने कहा कि महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरणा देश की बदल देने वाली हैं। उन्होंने कहा कि हम जिस तेजी से अपनी परंपराओं, वार त्यौहारों और परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं, उससे हम अपनी संस्कृति की पूरी धारा को ही नष्ट कर रहे हैं।

डॉ. आशीष गौतम ने कहा कि मनुष्य की सेवा ही मेरे लिए नारायण सेवा हैं।

मॉरीशस से विशेष रुप से उपस्थित आरपीएन सिंह ने कहा कि मिशन के इस कार्यक्रम से मुंबई के युवक सेवा के लिए प्रेरित होंगे। कार्यक्रम के संयोजक एवं विधायक पराग अलवनी ने कहा कि स्वामी जी के विचार ही भारत को शिखर पर ले जा सकते हैं।

कार्यक्रम का सफल संचालन मिशन के संरक्षक एवं भाजपा प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने करते हुए पूरे संचालन में वक्ताओं और श्रोताओं के बीच सेतु बनाए रखते हुए रोचक संवादों और स्वामी विवेकानंद द्वारा समय समय पर दिए गए प्रेरक वक्तव्यों का उल्लेख कर उनके व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं से परिचित कराया।

इस मौके पर वीरमाता श्रीमती अनुराधा ताई गोरे, रविंद्र भुसारी, रमेश मेहता, डॉ राजेश सर्वग और नवीन काले का सम्मान दिव्य प्रेम सेवा मिशन पुरस्कार से किया गया । मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का स्वागत नगरसेविका ज्योति अलवनी ने किया। इस मौके पर फ़िल्म अभिनेता गजेंद्र चौहान, मयंक गांधी, पूर्व उपमहापौर विनोद घेडिया, अनिल गलगली, अनीस मकवानी, राजेश मेहता, विमल घेडिया, अभिजीत सामंत, सुनीता मेहता, आचार्य पवन त्रिपाठी, नीतेश सिंह, राकेश पांडेय, उदय प्रताप सिंह,गणेश पांडेय, जयप्रकाश जेपी सिंह, बिमल भूता, विनीत गोरे के साथ ही देश भर से आए दिव्य सेवा मिशन के पदाधिकारी उपस्थित थे।

अंत में कार्यक्रम के संयोजक श्री संजय चतुर्वेदी ने आभार माना।

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