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मुं‘भाई किताब में अंडरवर्ल्ड का सारा सच

देश के विख्यात खोजी पत्रकार विवेक अग्रवाल की देश के सबसे विख्यात प्रकाशन समूह वाणी प्रकाशन से आ रही किताब मुं‘भाई में पहली बार मुंबई के गिरोहों पर ऐसे अछूते विषयों पर काम हुआ है, जिनके बारे में आज तक कोई सोच भी नहीं पाया है। यह किताब एक प्रकार से मंबई के गिरोहों पर सबसे सटीक और जीवंत दस्तावेज के रूप में सामने आती है।

इस किताब में न केवल माफिया शब्द की उत्पत्ति एवं उसकी आज तक की यात्रा पर पूरी तफसील है,बल्कि यह भी बताया है कि यह शब्द कहां कैसे जा पहुंचा है। इटली के क्रांतिकारी अभियान से शुरू होने वाले ‘माफिया’ शब्द की उत्पत्ति और उसके विस्तार से वर्तमान तक आठ सदियों की यात्रा का पूरा लेखा-जोखा दिया है।

मुंबई माफिया का इतिहास भी इस पुस्तक में पूरी तरह समेटा गया है। कल तक मुंबई में लोग गर्व से कहते थेकि यहां कभी अंधेरा नहीं होता, मुंबई कभी सोती नहीं, मुंबई से चमकीला कोई शहर नहीं, अब वे मुंह छुपाने पर मजबूर हैं। कारण बन हैं अंधियाले संसार के स्वामी। उनके साम्राज्य रक्त के दलदल में खड़े हैं। यह है मुंबई माफिया। कितने नाम हैं इस दुनिया के, भूमिगत संसार, अंधियाला संसार, काली दुनिया, अंडरवल्र्ड… इसे रचने वालों और उनके जीवन में कितने-कितने मोड़ हैं, कितने-कितने कोण हैं, कितने-कितने जोड़ हैं, कहना मुहाल है लेकिन उनके मिथक और सत्य अपनी जगह हैं। उसके इतिहास को खंगालने की कोशिश बेमानी कसरत साबित न हुई। हाजी मस्तान से अली बुदेश तक रक्तरंजित संसार कैसा है और कैसे करवट लेता रहा, माफिया के इतिहास को दर्ज किया है।

मुंबई के गिरोहों की संरचना आज तक किसी को पक्के तौर पर पता नहीं है। पहली बार इस पुस्तक के जरिए आपके सामने मुंबई के गिरोहों की संरचना की तमाम तफसील सामने होगी। मुंबई के गिरोहों में और सिसली के गिरोहों में क्या समानता है? क्या वे जापानी और चीनी गिरोहों की तर्ज पर ही काम करते हैं? जवाब है कि वे एक ही जैसी व्यवस्था और संरचना के तहत काम करते हैं। फर्क बस इतना ही है कि जिस स्तर तक सिसली, जापान और चीन के गिरोह जा पहुंचे हैं, जितनी अत्याधुनिक तकनीक और वैश्विक पैठ वे रखते हैं, उतना भले ही मुंबई माफिया के पास नहीं हो, फिर भी वे किसी से कम नहीं हैं। बिल्कुल पुसलिस और सेना जैसा सांगठनिक ढांचा है। हर स्तर पर जवाबदेही तय है। बस होता यही है कि जो गिरोह के सरदार ने कह दिया, वही कानून है, वही अंतिम आदेश है। सबसे बड़ी सजा भी वही है – मौत। यही तो है कंपनी सरकार।

नए और पुराने माफिया के अंतर क्या आपको पता हैं? नहीं होंगे। जो पुराने लोग हैं, उन्हें अपने वक्त की जानकारी है। जो नए हैं, उन्हें नया वक्त पता है। नए और पुराने माफिया के अंतर जानने की कोशिश की गई है, इस पुस्तक में।

मुंबई के गिरोहों का विश्व भर में फैलाव किस तरह हुआ है, यह सब भी इस किताब में आपके सामने आएगा। गिरोहों की माया अब देसी नहीं रही। गिरोह ग्लोबल हो गए हैं। डी-कंपनी दर्जन से अधिक देशों में पांव पसार चुकि है, कई सरगना या सिपहसालार विदेशों से गिरोह संचालन कर रहे हैं। राजन ने युरोप से ऑस्ट्रेलिया, बैंकाक, मलेशिया और स्विट्जरलैंड तक पनाह खोजी। सालेम की दुनिया दक्षिण अफ्रीकी देशों में है। अली बुदेश बहरीन में बैठा है। अश्विन कनाडा से अमरीका तक घूमता रहा। सरगना विदेशों में इस प्रकार विचरण करते हैं मानों ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को वे ही चरितार्थ कर रहे हैं।

नेपाल में गिरोहों के अड्डे बने हुए हैं। कहने के लिए नेपाल हमारा मित्र राष्ट्र है लेकिन शत्रु राष्ट्र की आईएसआई, इस्लामी कट्टरपंथियों, आतंकियों और भारतीय माफिया का गढ़ है। माफिया ने सबसे पहले नेपाल में ही डेरा जमाया। नेपाल में वह सब हो रहा है जो मुंबई में होता रहा है। सरगनाओं के लिए सारी दुनिया में पहुंचने का केंद्र है नेपाल। नेपाल में कई

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होटल मालिक, राजनेता और व्यवसायी गिरोहबाजों से जुड़े हैं। नेपाल की खूबसूरत वादियों में गूंजते गोलियों के धमाकों और बहते रक्त के कारणों की तलाश करें। जेलों के सुरक्षित वातावरण से होने वाले अपराधों पर भी नजर डाली गई है। जेलों से सुरक्षित स्थान नहीं जहां से माफिया काम कर सके। यही कारण है कि हर जेल पर एक मुहर है कि ‘फलां जेल, फलां गिरोह’ की है। जेल प्रशासन भले यह अपनी सुविधा हेतु करता है कि सबको अलग रखने पर वे आपस में नहीं झगड़ेंगे। इसके कारण जेलें गिरोहों के मुख्यालयों में तब्दील हो गई हैं। अस्पतालों-अदालतों में भी अपराध और अपराधी पनपते हैं। अपराधियों ने जहां पनाह लीं, उनमें धर्मस्थल तो थे ही, अस्पतालों को भी नहीं बख्शा। कभी पैसों के लिए, तो कभी जान के भय ने चिकित्सकों को उनका साथ देने पर मजबूर किया। यह तफ्तीशपूर्ण हिस्सा अस्पतालों में पनपते माफिया और मिलती सुख- सुविधाओं की कलई खोलता है। इस क्षेत्र का पूरा ‘पोस्टमार्टम’ करता है।

गिरोहबाजों के अड्डों की तफसील से जानकारी इस अध्याय में है। गिरोहों के अपने तिलिस्म हैं, अपने इलाके और अड्डे हैं। यह जानना दिलचस्प है कि ये अड्डे उनसे कहीं खुशनुमा हैं, कई बार उन फिल्मी अड्डों से बेहद डरावने भी। सच यह है कि वे कैसे हैं, उनमें क्या सुविधाएं हैं, कोई निश्चित पैमाना नहीं। इतना है कि उनका अपना तिलिस्म और आकर्षण है। फिर चाहे वह दाऊद का कराची में नवाबों सरीखा मोईन पैलेस हो या गवली की भायखला स्थित दगड़ी चाल या हुसैन वस्त्रा का फिल्मी सेट सरीखा नागपाड़ा का अड्डा। हर स्थान पर कुछ नया मिलेगा।

क्या गिरोहबाज भी रिटायर होते हैं? अंडरवर्ल्ड में कहावत है कि यह एकांगी मार्ग है। आदमी आता मर्जी से है, जाता कभी नहीं। भूमिगत संसार में जिसने कदम रखा, वह भले रिटायर हो गया, उसे कभी चैन न मिला। धर्म ने गिरोह बांटे हैं। एक वक्त था जब हाजी के साथ शेट्टी काम करते थे, वरदा के पास सलीम। 80 दशक के मध्य तक अपराध जगत में कोई सुपारी हत्यारा, हफ्ताखोर, सिपहसालार, फौजदार जाति-धर्म के तराजू पर नहीं तौला गया। फिर गिरोहों में फूट पड़ी। ‘तुम्हारे पास दाऊद है तो हमारे पास गवली है’ जैसे जुमले हिंदू अतिवादी विचारों के पोषक बाल ठाकरे ने उछाले। 1992 में दृश्य बदल गया। दाऊद को हिंदुओं पर भरोसा न रहा, राजन को मुस्लिमों पर। गवली पहले से मुस्लिम विरोधी है। नाईक गिरोह में अभी भी हिंदू-मुस्लिम का भेद नहीं। रक्त के दलदल में भी धर्म ने वैसी ही आग लगाई है, जैसी हिंदुस्तान में। इसका असर यह हुआ कि माफिया कमजोर पड़ गया।

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