नंदकिशोर गोयनका का परिचय यह नहीं था कि उनके पुत्र डॉ. सुभाष चंद्रा ने देश को सबसे पहला एस्सेल वर्ल्ड जैसा मनोरंजन पार्क दिया और ज़ी टीवी के माध्यम से कैबल टीवी नेटवर्क की नींव रखी। नंदकिशोर गोयनका देश के एक विराट कॉर्पोरेट घराने के मुखिया के पिता होते हुए भी अपनी शुध्द देसज जीवन जीते थे। उनको न तो इस बात का अभिमान था कि उनके बेटों ने एक विशाल कॉर्पोरेट साम्राज्य खड़ा कर लिया है न इस बात का मोह था कि उनके इस कॉर्पोरेट जगत की चमक-दमक उनके जीवन का हिस्सा बने। उन्होंने अपना पूरा जीवन गौशाला और हिसार में अग्रोहा धाम के निर्माण और विकास के लिए समर्पित कर दिया था। उनका पहनावा भी शुध्द देसी था, वे हमेशा कुरता और धोती ही पहनते थे, सूट बूट उनको कतई पसंद नहीं थे।
कई बार उनका बहुत आत्मीय सान्निध्य मिला तो ऐसा लगा कि वे अपनी एक अलग दुनिया में जीते हैं। अग्रोहा धाम का विकास और गौमाता उनके जीवन में रचे बसे थे। इसके इतर उनको किसी विषय में कोई रुचि नहीं थी। अग्रवाल समाज कैसे एक सूत्र में बंधे, समाज के लोग कुरुतियों से कैसे मुक्त हों, समाज में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति कैसे संपन्न बने, समाज के युवाओं का सुसंस्कृत परिवारों में रिश्ता कैसे हो। उन्होंने अपने बेटों द्वारा खड़े किए गए साम्राज्य को ईश्वर और गौमाता की देन ही माना। श्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं बने थे तब वे गोयनका जी से मिलने हिसार गए थे और उनके गौ सेवा के कार्य को देखकर आश्चर्यचकित थे।
एक बार स्वर्गीय स्वरूपचंद जी गोयल जी मुंबई से पूरी ट्रैन लेकर हिसार पहुँचे थे। हिसार के अग्रोहा धाम में शरद पूर्णिमा के अवसर पर अग्रवाल समाज का मेला लगा था और उसमें देश भर के अग्रवाल समाज के लोग एकत्र हुए थे। जिसमें कई राज्यों के मंत्री, विधायक और सांसद भी थे।
अग्रोहा धाम का निर्माण उनके लिए मात्र मंदिर और भवन निर्माण का कार्य नहीं था, इसके माध्यम से वे पूरे समाज को जोड़ना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने यह तय किया कि इसकी एक-एक ईंट और इसके शिखर पर स्वर्ण कलश मात्र कुछ लोगों के या समाज के संपन्न लोगों के सहयोग से नहीं बल्कि समाज के हर व्यक्ति के छोटे से छोटे दान व सहयोग से किया जाएगा।
वहाँ पहुँचते ही गोयनका जी ने जिस अहोभाव और श्रध्दा से सब मेहमानों की खातिरदारी की वो आज भी मन में रची-बसी है। दो दिन उनके साथ रहकर देखा कि सुबह जल्दी ही वो तैयार होकर अपनी बैठक पर बैठ जाते थे और पूरे दिन अग्रोहा धाम में आने वाले हर व्यक्ति के ठहरने, भोजन आदि की व्यवस्था करते थे। दिन भर में सैकड़ों लोग उनके पास पहुँचते थे और वे पूरी सहजता से बाहर से आए अतिथि को आश्वस्त करते थे कि उनको यहाँ कोई परेशानी नहीं होगी।
हमारे आश्चर्य का ठिकाना तब न रहा जब वो रात के समय सबके कमरे चैक करने आए और कहने लगे, मुंबई में ठंड कम पड़ती है और यहाँ ठंड जोर की होती है रात को ठंड बढ़ जाएगी तो सबके लिए एक एक अतिरिक्त रजाई लेकर आए। इसके बाद स्टील के जग में गरम-गरम दूध लेकर हर एक के कमरे में जाकर सबको दूध पिलाया। सुबह सब लोग उठे उसके पहले ही 6 बजे से सबके लिए गरम चाय लेकर तैयार थे।
हिसार में वे अनाज का कारोबार करते थे और बाहर गाँव से व्यापारी आते थे तो प्रायः उनके घर पर ही ठहरते थे और भोजन भी करते थे, ऐसे में घर के सदस्यों की जिम्मेदारी होती थी कि वे अतिथि के हाथ पैर धुलवाएँ और टॉवेल लेकर उनके पास खड़े रहें। फिर उन्हें सम्मानपूर्वक भोजन करवाएं। सुभाष जी, जवाहर जी, अशोक जी लक्ष्मी जी जब छोटे थे तो ये जिम्मेदारी बखूभी निभाते थे। उनका गुस्सा भी अजीब होता था अगर कोई गलती करके चला गया या भाग गया तो जो सामने आ जाए उसको डॉंट पड़ जाती थी, डॉंट खाने वाले को समझ में ही नहीं आता था कि उसे किस बात पर डॉट पड़ रही थी, लेकिन परिवार में अनुशासन और संस्कार ऐसे थे कि कोई इस बात का बुरा ही नहीं मानता था।
उनका जीवन सच्चे अर्थों में अपरिग्रह का रहा, दुनिया का तमाम सुख उनके कदमों में था मगर उनकी जीवन शैली में ठेठ देसीपना था और वो उसके हिसाब से ही जीते थे। अग्रोहा विकास ट्रस्ट के मुंबई ऑफिस में जब उनके साथ बैठना होता था तो बात बात में वे बहुत कुछ कह देते थे। संस्कारों के प्रति उनका कितना दुराग्रह था कि ज़ी टीवी के ऑफिस में कार्यरत लोग जब चाय पीकर झूठा कप पेड़ की मेड़ पर रख देते थे तो वे असहज हो जाते थे, वो कहते थे ये समझते नहीं कि पेड़ के पास जूठन नहीं रखना चाहिए। कोई कप में आधी चाय जूठी छोड़ दे तो भी वे आगबबूला हो जाते थे। बाद में उन्होंने पेड़ के आसपास लोहे की रेलिंग लगवा दी।
डॉ. सुभाष चंद्रा और अशोक जी वहीं ज़ी टीवी के ऑफिस में बैठते थे और दोपहर को भोजन का समय होता और ज़ी टीवी के कर्मचारी कैंटीन में भोजन करके बाहर आते तो वे इस बात की चिंता करने लगते थे कि सुभाष जी ने और अशोक जी ने भोजन किया कि नहीं। जब उनको पता लगता था कि दोनों ने बैठकों की व्यस्तता की वजह से भोजन नहीं किया है तो वो कहते थे देखो उनके यहाँ काम करने वाले सब लोगों ने तो भोजन कर लिया मगर मालिक लोगों के पास भोजन करने का भी समय नहीं है। उनके लिए सुभाष जी और अशोक जी बड़े व्यक्ति नहीं थे बल्कि उनके बच्चे जैसे थे जिनको समय पर भोजन करना वे जरुरी मानते थे।
अशोक जी एक बार अपने स्कूल के मित्रों के साथ गौशाला चले गए और वहाँ अपनी ही गौशाला समझकर सबने एक एक गिलास दूध पी लिया तो उन्होंने उसके पैसे जमा किए, क्योंकि उनका मानना था कि गौशाला में ऐसे जाकर दूध पी लेना ठीक बात नहीं थी।
ज़ी टीवी और एस्सेल वर्ल्ड के पहले सुभाष जी चमड़े का कारोबार करना चाहते थे, यह बात नंदकिशोरजी गोयनका को बताई तो उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया कि जानवरों की हाय लगे ऐसा काम हमको नहीं करना है, और सुभाष जी ने तत्क्षण इस विचार को टाल दिया। जब ज़ी टीवी लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गया और देश सहित दुनिया भर के भारतीयों में लोकप्रिय हो गया तो गोयनका जी ने सुभाष जी से कहा, तुम्हारा इतना नाम हो गया है, इतना पैसा हो गया है, अब तुम्हारी भी जिम्मेदारी बनती है कि तुम समाज के लिए कुछ करो और ऐसा करो कि समाज के हर आदमी को उसका लाभ मिले। ये उनकी ही सोच का कमाल था कि सुभाष जी ने डॉ. सुभाष चंद्रा शो के माध्यम से देश भर ये युवाओं से संवाद स्थापित किया और उनको मार्गदर्शन देने का कार्य शुरु किया।
उनकी सबसे बड़ी पूँजी ये नहीं थी कि वे एक विशाल कॉर्पोरेट साम्राज्य चलाने वाले परिवार के मुखिया थे, उनकी पूँजी ये थी कि पूरा परिवार कैसे एक होकर रहे और ये उनकी ही प्रेरणा, आशीर्वाद और संस्कारों का प्रतिफल था कि एस्सेल समूह का पूरा कारोबार सुभाषजी, जवाहरजी, लक्ष्मीजी और अशोक जी के बीच अनवरत चलता रहा, और आज भी सभी भाई अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के साथ अपना कारोबार चला रहे हैं। न कोई विवाद है न कोई टकराव। दीवाली के आसपास साल में एक बार पूरा परिवार हिसार में एकत्र होता था और सभी साथ में दीवाली मनाते थे।
नंदकिशोर गोयनका अपने भरे-पूरे परिवार के साथ ही हिसार में अग्रोहा धाम रूपी एक ऐसा तीर्थ विकसित करके गए हैं जो आने वाली कई सदियों तक दुनिया भर के अग्रवाल समाज को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करता रहेगा।





