नीला भागवत अब हमारे बीच नहीं रहीं। 14 अप्रैल 2026 को उनका निधन हो गया। मुझे इस बात का गर्व है कि उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक “ख़याल गायन की अंतरगाथा” को हिंदी में प्रकाशित करने का सौभाग्य मुझे मिला। मूल रूप से मराठी में यह पुस्तक 'लोकवांगमय गृह' द्वारा प्रकाशित की गई थी। इस किताब पर काम करने के दौरान मुझे नीला जी के साथ कई बैठकें करने और उन्हें करीब से जानने-समझने का मौका मिला।
उनका गायन तो मैंने पहले भी सुना था, लेकिन परिचय के बाद उन्हें बार-बार सुनने का अवसर मिला—खासतौर पर उनके द्वारा गाए गए कबीर के पद। मेरा एक सपना था कि मीरा रोड में उनके कबीर गायन का एक विशेष कार्यक्रम आयोजित करूँ, मगर अफ़सोस कि यह सपना अधूरा ही रह गया।
इस पुस्तक के प्रकाशन के सफर में मुझे ग्वालियर घराने, ख्याल गायकी और टप्पा गायन की भव्यता को गहराई से समझने का सुख मिला। इसी दौरान मैं उनके गुरु पंडित शरच्चंद्र आरोलकर के व्यक्तित्व से भी परिचित हुआ। एक तरफ परंपरा को पूरी शिद्दत से निभाने वाले गुरु आरोलकर बुवा थे, तो दूसरी तरफ क्रांतिकारी और आधुनिक विचारों वाली शिष्या नीला जी। नीला जी ने अपने और गुरु के विचारों के इस द्वंद्व को न केवल जिया , बल्कि गुरु-शिष्य के रिश्ते की गरिमा को भी पूरी तरह बनाए रखा। यह संतुलन बनाना आसान नहीं था, लेकिन संगीत के प्रति उनके समर्पण ने इस रिश्ते को एक नई सांस्कृतिक ऊँचाई दी।
'खयाल गायन की अन्तरगाथा'-
उनकी यह पुस्तक संगीत जगत के लिए एक अनमोल धरोहर है।
यह पूरी तरह से पंडित आरोलकर की शिक्षाओं और उनके संगीत दर्शन पर आधारित है। इसमें ख्याल गायकी की बारीकियों, बंदिशों के स्वरूप और गुरु-शिष्य परंपरा के जीवंत अनुभवों को पिरोया गया है। नीला जी ग्वालियर घराने की परंपराओं की गहरी समझ रखती थीं, लेकिन उन्होंने एक बहुत साहसिक कदम यह उठाया कि उन्होंने ग्वालियर घराने की बंदिशों की "गोपनीयता" को सबके लिए सुलभ बना दिया।
शास्त्रीय गायन के साथ-साथ उन्होंने 'टप्पा' शैली और आधुनिक सामाजिक विषयों पर नई बंदिशों की रचना भी की। यह पुस्तक आज के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए ख्याल गायकी की अंदरूनी दुनिया को समझने का एक सबसे प्रभावशाली जरिया है।
जब मैं इस पुस्तक के प्रकाशन की तैयारी कर रहा था, तो मुझे अक्सर ऐसा लगता था जैसे मैं किसी बहुत विशाल और पुराने किले में कैद हो गया हूँ। लेकिन जिस दिन पुस्तक का विमोचन हुआ, उस समारोह में ख्याल गायन की कुछ ऐसी विलक्षण प्रस्तुतियाँ सुनने को मिलीं कि मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उस संगीत ने किले के सारे दरवाजे खोल दिए हों और मैं आजाद होकर बाहर निकल आया हूँ।
नीला भागवत जी केवल एक महान गायिका ही नहीं थीं, बल्कि उन्होंने मराठी और समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया था। वे वामपंथी विचारधारा और महिला आंदोलनों से भी सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। जहाँ एक ओर उन्होंने गुरु आरोलकर से ग्वालियर घराने के ऊँचे संस्कार सीखे, वहीं दूसरी ओर वे समाज को नई दिशा देने वाली आधुनिक बंदिशें भी रचती रहीं।
उन्होंने मध्यकालीन संतों की उन कविताओं को अपनी आवाज़ दी जो प्रेम और शांति का संदेश देती हैं। उनके गायन में कबीर, मीरा और सहजोबाई के पदों के साथ-साथ तुकाराम, चोखामेला और ज्योतिबा फुले की रचनाएँ भी शामिल थीं। नीला भागवत के इस बहुआयामी व्यक्तित्व में एक ऐसा जादुई आकर्षण था जो हर किसी को अपनी ओर खींच लेता था। संगीत और समाज के प्रति उनका यह योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
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रमन मिश्र, मुंबई





