Monday, July 22, 2024
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रहस्य, चमत्कार और आकर्षण का केंद्र है ओड़िशा का विश्व विख्यात सूर्यमंदिर

ओड़िशा का विश्व विख्यात सूर्यमंदिर,कोणार्क आज भी विशेष आकर्षण का केन्द्र है। इस मंदिर के भग्नावशेष में भी प्रकृति के प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्यदेव को अपने 24 पहियोंवाले रथ पर आरुढ देखा जा सकता है। सूर्यमंदिर के 24 पहिये प्रत्यक्ष रुप में कालचक्र के प्रतीक हैं।

यह विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्यमंदिर बंगोपसागर(बंगाल की खाड़ी) के तट पर चन्द्रभागा नदी के समीप भग्नावशेष के रुप में अवस्थित है। इस मंदिर की अनुपम छटा सूर्योदय और सूर्यास्त के समय अनुपम नजर आती है। ऐसा लगता है जैसे सूर्य की समस्त किरणें सबसे पहले धरती पर यहीं पर आलोकित कर रही हों।

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से लगभग 53 किलोमीटर की दूरी पर तथा श्री जगन्नाथपुरी धाम से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पूर्व दिशा में अवस्थित है यह विश्व विख्यात कोणार्क सूर्यमंदिर। इसका निर्माण 13वीं शताब्दी में गंगवंश के प्रतापी राजा नरसिंह देव ने किया था जिसे 1984 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रुप में मान्यता प्रदान की गई। इस अनूठे मंदिर के निर्माण में कुल लगभग 2वर्ष लगे।जबकि निर्माण में कुल 1200 शिल्पकारों तथा कारीगरों ने योगदान किया।यह मंदिर ओडिशा की प्राचीन स्थापत्य और मूर्तिकल का बोजोड उदारण है।यह मंदिर सभी प्रकार से पूरे विश्व में कालचक्र के प्रतीक के रुप में विख्यात है।

मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त लाल पत्थर भी अपनी मोहकता से जैसे मानव की भाषा से कहीं अधिक मुखर नजर आते हैं।कोणार्क सूर्यमंदिर का निर्माण मंदिर का सबसे बडा आकर्षण है मुख्य मंदिर भगवान सूर्यदेव का अलौकिक मंदिर तथा उनकी पत्नी छाया देवी का अति दिव्य मंदिर।मंदिर को ऐसे निर्मित किया गया है कि जैसे प्रत्यक्ष प्रकृतिदेव भगवान सूर्य की समस्त किरणें सीधे सबसे पहले कोणार्क सूर्यदेव तथा उनकी पत्नी देवी छाया देवी के प्रथम दर्शन कर रहीं हों।

यह पूरा सूर्य मंदिर कुल 24 पहियों पर टिका हुआ है जिसके एक तरफ 12 पहिये तथा दूसरी तरफ 12 पहिये हैं। खण्डहर बने आज के सूर्यमंदिर के चार पहिये आज भी धूपघडी के रुप में इस्तेमाल किये जाते हैं।सूर्यमंदिर के मुख्य द्वार को गजसिंह द्वार कहा जाता है।यहां पर पत्थर के दो विशाल सिंह की मूर्तियां हैं जिसमें अपने पैरों से हाथी को कुचलते दिखाया गया है।

मंदिर में प्रवेश करते ही सबसे पहले नाट्य मंदिर आता है।मंदिर की सीढियां चौडी-चौडी हैं जो आनेवाले पर्यटकों को सूर्यमंदिर के जगमोहन मंदिर तक ले जाती हैं। सीढ़ियों के दोनों तरफ विशालकाय घोडे बने हैं जो देखने में ऐसे जीवंत लगते हैं जैसे वे तत्काल युद्ध के लिए दौड जाएंगे।मंदिर में तीन अति सुंदर मूर्तियां हैं जिनके स्थान को काफी सोच-समझकर रखा गया है।तीन मूर्तियों में एक है उगते सूरज की मूर्ति ,दूसरी दोपहर के सूरज की मूर्ति तथा तीसरी ढलते हुए सूरज की मूर्ति है।

मंदिर के प्रवेशद्वार के बगल में नवग्रहदेव की मूर्तियां हैं जिनके पूजन का व्यक्तिगत सुख-शांति के लिए विशेष महत्त्व बताया गया है। सूर्यमंदिर के दक्षिणी भाग में निर्मित दो विशालकाय घोडे ताकत और ऊर्जा के प्रतीक हैं। ये मूर्ति ओडिशा सरकार के राजकीय चिह्न हैं। मंदिर के निचले भाग में तथा मंदिर की दीवारों पर बनी कलाकृतियां अद्भुत हैं।यहां का प्रतिवर्ष आयोजित होनेवाला कोणार्क महोत्सव संगीत-नृत्य कला प्रेमियों के लिए अत्यंत आनंददायक होता है।

गौरतलब है कि मंदिर प्रांगण में कुल 22 अन्य मंदिर भी हैं। मंदिर की नक्काशियां मनमोहक हैं।सूर्यदेव की पत्नी छाया देवी के मंदिर में सबसे पहले एक सुंदर औरत की मूर्ति है जो अपने पति के आगमन की प्रतीक्षारत नजर आती है।और उसे ही देखने के लिए कोणार्क आनेवाले लोगों में अधिकतर नव दंपत्ति ही होते हैं जो वहां पर जीवन में प्रतीक्षा के महत्त्व को प्रत्यक्ष रुप में समझते हैं। प्रकृति के खुले वातावरण में निर्मित इस मंदिर की दीवारों की छटा दर्शनीय हैं जिन पर कामुक कलाकृतियों को भी बडी बारीकी से उकेरा गया है।यहां पर एक मगरमच्छ की भी मूर्ति है जिसने अपने मुंह में मछली दबाये हुए है।

गौरतलब है कि 1779 में कोणार्क के अरुण स्तंभ को लाकर पुरी के जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार के सामने स्थापित कर दिया गया है। एक समय था जब इस रथ के चौबीस पहिये थे जिसे कुल छः घोड़े खींच रहे हों लेकिन आज मात्र एक ही घोडा वहां पर दिखता है।कोणार्क सूर्यमंदिर को विरंचि-नारायण मंदिर भी कहा जाता है।पद्मपुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का पुत्र साम्ब जब शापग्रस्त होकर कोढ़ रोग से ग्रसित हो गया तब वह यही आकर बंगोपसागर के चन्द्रभागा सागर-संगम नदी तट पर पवित्र स्नानकर लगातार 12 वर्षों तक भगवान सूर्यदेव की घोर तपस्या की जिससे सूर्यदेव प्रसन्न होकर उसे कोढमुक्त का वरदान दिये।कहते हैं कि तभी से इस मंदिर में सर्योपासना आरंभ हुई।

सच तो यह है कि पिछले लगभग 700 वर्षों से देश-विदेश के हजारों कुष्ठरोगियों का निदान करता आ रहा है।कोणार्क सूर्यमंदिर आकर विश्व के चर्मरोगी सुबह-शाम सूर्यदेव की पहली किरणों का सेवन करते हैं और पूरी तरह से रोगमुक्त हो जाते हैं। कोणार्क सूर्यमंदिर की सबसे बडी अनोखी विशेषता यह भी है कि इसमें भगवान सूर्यदेव की तीन मूर्तियां हैं। एक बाल्यावस्था की,दूसरी युवावस्था की और तीसरी प्रौढावस्था की है। यही नहीं, यह ओड़िशा का विश्व विख्यात सूर्यमंदिर,कोणार्क शोधार्थियों के भी शोध का मुख्य केन्द्र बन चुका है।

(लेखक ओड़िशा की कला, संस्कृति व साहित्यिक गतिविधियों पर नियमित लेखन करते हैं और राष्ट्रपति से पुरस्कृत हो चुके हैं)

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