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संघ जैसा संगठन ही व्यवस्था परिवर्तन में अहम भूमिका निभा सकता हैः श्री सुरेश प्रभु

श्री सुरेश प्रभु @sureshpprabhu से मिलना हर बार एक नया, रोमांचक और यादगार अनुभव होता है। कोरोना की वजह से उनसे साल भर बाद पहली मुलाकात हुई और मुलाकात भले ही कितनी भी छोटी हो अगर आप श्री सुरेश प्रभु से मिलते हैं तो ऐसा ही है जैसे समुद्र से एक बूंद लेकर लौटते हैं, बूंद जैसे समुद्र का एहसास कराती रहती है, कुछ ऐसा ही एहसास प्रभु साहब से मिलने के बाद होता है, आप एक नए चिंतन और एक नई दृष्टि से समृध्द हो जाते हैं। प्रभु साहब कितने ही व्यस्त हों ये मेरा सौभाग्य है कि जब भी दिल्ली से मुंबई आएँगे उनके आने की सूचना भी मिल जाएगी और अगर उनको मिलना है तो बकायदा पहले से ही समय निर्धारित भी कर देंगे। जबकि उनसे मिलने के लिए कितने ही लोग प्रतीक्षा करते हैं, जिनमें मुंबई के राजनीतिक क्षेत्र के कार्यकर्ता हों, नेता हों या बुध्दिजीवी या कॉर्पोरेट जगत के लोग। और ऐसा भी नहीं कि प्रभु साहब किसी से मिलने को उत्सुक नहीं होते, लेकिन उनकी व्यस्तता इतनी होती है कि वे चाहकर भी सबको नहीं मिल पाते, लेकिन कोई यदि मिलने आ जाएगा तो फिर प्रभु साहब उसको निराश भी नहीं करेंगे। उनसे मिलने के बाद उनकी सहजता का हर कोई कायल हो जाता है। प्रभु साहब अपने आप में एक ऐसे राजनीतिज्ञ हैं जो जिससे भी मिलते हैं उससे राजनीति की बात नहीं करते, समाज की क्या समस्या है, और एक व्यक्ति के रूप में कोई उऩ समस्याओं को कैसे हल कर सकता है, यही उनकी चर्चा का मूल होता है।

इस बार प्रभु साहब से मुलाकात हुई मुंबई के टाईम्स टावर में मेरे लिए अशोक जी गोयल (मुंबई में विगत 22 वर्षों से मैं इस परिवार से जुड़ा हूँ, और आज मैं जहाँ भी हूँ इसका श्रेय इसी परिवार को जाता है) के ट्रस्ट के ऑफिस में। श्री प्रभु हाल ही में ऋषिवुड विश्वविद्यालय https://rishihood.edu.in/ के संस्थापक कुलाधिपति नियुक्त किए गए हैं और इसी विश्वविद्यालय के संचालक मंडल की बैठक में भाग लेने मुंबई आए थे। मेरे साथ भाजपा की महिला मोर्चा की की सोशल मीडिया की प्रभारी श्रीमती प्रीति गाँधी @MrsGandhi और श्री भागवत परिवार के मार्गदर्शक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक भी थे।

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इस अनौपचारिक चर्चा में प्रभु साहब ने जैसे खुशनुमा विचारों से लाद दिया। उन्होंने कहा कि चाहें राजनीतिज्ञ हों या बुध्दिजीवी या समाजसेवी सभी व्यवस्था परिवर्तन की बात जरुर करते हैं मगर व्यवस्था परिवर्तन करने की बजाय हम उसी व्यवस्था का अंग हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि जो भी विधायक, सांसद चुनाव जीतता है वो व्यवस्था परिवर्तन की बात तो करता है मगर चुनाव जीतते ही उसी व्यवस्था का अंग हो जाता है। इसलिए व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आता और आम आदमी हमेशा ही व्यवस्था से पीड़ित ही रहता है।

उन्होंने खुद का उदाहरण देते हुए कहा कि जब मैं पहला लोकसभा चुनाव लड़ा तो एक पत्रकार ने मुझसे पूछा कि आप चुनाव क्यों लड़ रहे हैं, मैं पहली बार चुनाव लड़ रहा था और उत्साह व जोश से भरा था तो मैने कहा, मैं दुनिया को बदलने के चुनाव लड़ रहा हूँ। मेरे चुनाव जीतने के बाद उसी पत्रकार ने आकर पूछा कि मैने दुनिया को बदलने के लिए क्या किया, तो मैने उसे जवाब दिया कि दुनिया तो नहीं बदल पाया, मगर मैं खुद बदल गया हूँ और मैं व्यवस्था का हिस्सा हो गया हूँ।

श्री प्रभु ने कहा कि हम सब चाहते हैं कि राजनीतिज्ञ लोग व्यवस्था परिवर्तन कर देंगे, लेकिन ये काम राजनीतिज्ञ नहीं कर सकते। व्यवस्था परिवर्तन का काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसा संगठन ही कर सकता है, क्योंकि संघ की राजनीतिक महत्वाकाँक्षा भी नहीं है और संघ के पास समर्पित कार्यकर्ता हैं। संघ अपने आप में एक अद्भुत संगठन है जिसके पास एक दृष्टि भी है और समर्पण भी।

6 बार सांसद और केंद्र में कई प्रमुख मंत्रालयों में केंद्रीय मंत्री के रूप में सेवाएँ दे चुके और जी20 व जी7 देशों के लिए प्रधान मंत्री के शेरपा के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे सुरेश प्रभु जैसा व्यक्तित्व ही ऐसी बात कर सकता है।

श्री प्रभु से मिलने के बाद मुंबई के अध्यात्मिक जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले श्री वीरेन्द्र याज्ञिक जी की सहज प्रतिक्रिया थी- ”ऐसा लगा जैसे किसी संत से मिलकर आ रहे हैं।”

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https://twitter.com/sureshpprabhu/status/1340501311477825538?s=08

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