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अभूतपूर्व संगठनकर्ता महात्मा नारायण स्वामी

उत्तर प्रदेश में एक जिला आता है, जिसका नाम जौनपुर है| इस जिले में ही एक गाँव का नाम सिंगारपुर है| इस गाँव को धन्य गाँव इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस गाँव में एक सरकारी कर्मचारी श्री सूर्य प्रसाद जी निवास करते थे, जिनके यहाँ वसंत पंचमी १९२६ विक्रमी को एक अत्यंत तेजस्वी बालक ने जन्म लिया| इस बालक का नाम नारायन प्रसाद रखा गया| यह बालक आगे चलकर एक अद्भुत संगठन करने वाला विशेष व्यक्तित्व का धनि बना, जिसे महात्मा नारायण स्वामी जी के नाम से जाना गया|

इस बालक की शिक्षा का आरम्भ पहले हाथरस तथा फिर अलीगढ़ में हुआ| इन्हीं दिनों यहीं पर ही स्वामी दयानंद सरस्वती जी के दर्शनों का सुअवसर भी मिला किंतु तो भी इस बात का आजीवन दु:ख बना रहा कि आप अपने अध्यापक के बहकावे में आकर स्वामी जी के उपदेशों को न सुन सके| ज्यों ही आपका विवाह हुआ, इसके लागभग साथ ही पिताजी का देहांत हो गया| इस कारण नौकरी के लिए यत्न किया जो शीघ्र ही मुरादाबाद में मिल गई| इस नौकरी के मध्य मुरादाबाद को ही यह सौभाग्य भी मिला कि आप जैसा अनथक तथा अभूतपूर्व संगठनकर्ता सिद्धांतनिष्ठ व्यक्तित्व का धनी यह व्यक्ति आर्य समाज की शोभा बढाने के लिए आर्य समाज के साथ जुडा| यहाँ रहते हुए आपने खूब स्वाध्याय करके स्वयं को उत्तम आर्य समाजी के रूप में तैयार किया|

आपमें आर्य समाज के प्रति अद्भुत लगन पैदा हो चुकी थी| इस कारण आप आर्य समाज की खूब सेवा करने की अभिलाषा मन में संजोये हुए थे किन्तु इस मार्ग में परिवार आपके लिए बाधक बना हुआ था| अकस्मात् एक दिन आपकी पत्नी का देहांत हो गया और इसके कुछ ही समय पश्चात् आपकी दोनों संतानों(पुत्रों) का देहांत हो गया| इन तीनों के देहांत से आपको दु:ख तो हुआ किन्तु इससे आपको आर्य समाज का कार्य करने के लिए आपकी सब बाधायें दूर हो गईं और आगे आर्य समाज का कार्य करने का मार्ग खुल गया| अब आप एकाग्रचित्त होकर नियम पूर्वक आर्य समाज के लिए अत्यधिक समय देने लगे| आर्य प्रतिनिधि सभा का कार्यालय इन दिनों मुरादाबाद में ही आ गया था, इस कारण आप सभा के कार्यालय का कार्य भी करने लेगे| सभा का मुखपत्र महर्रिक, जो बाद में हिंदी में हो गया तथा इसका नाम भी बदल कर आर्य मित्र कर दिया गया, इस पत्र का सम्पादन का कार्य भी आपके कन्धों पर आ गया, जिसे आपने बड़ी सकुशलता से सम्भाला|

आपका आरम्भिक नाम नारायण प्रसाद था और अब तक आप इस नाम से ही जाने जाते थे| आपकी मेहनत तथा आपकी ईमानदारी के कारण सरकार आपको ऊँचे से उंचा पद देने को तैयार थी किन्तु आर्य समाज के साथ आपको इतना प्रेम और अनुराग हो गया कि आप इस अवसर का लाभ न उठा सके और पैन्शन की चिंता किये बिना, पेंशन के योग्य बनने से कुछ समय पूर्व ही अपने सरकारी पद का त्याग कर दिया और आर्य समाज की सेवा को ही एकमात्र ध्येय बनाकर इस ध्येय की पूर्ति के लिए कटिबद्ध हो गए| आपने गुरुकुल वृन्दावन में आचार्य के रूप में पदभार सम्भाला किन्तु अपनी योग्यता के कारण कुछ ही देर में इस गुरुकुल के मुख्याधिष्ठाता बना दिए गए| विकास के नाम पर यह गुरुकुल साधारण सी झोंपडी के समान था किन्तु आपकी मेहनत के कारण यह गुरुकुल उस समय की गुरुकुलीय शिक्षण संस्थाओं में अग्रणी संस्था बन गया| १९१९ में आप के जीवन के पचास वर्ष पूर्ण होते ही ऋषि की बताई व्यवस्था के अनुसार आपने वानप्रस्थ की दीक्षा ले ली| अब आप नैनीताल आ गए | यहाँ के रामगढ़ नामक स्थान पर नारायण आश्रम स्थापित किया और यहाँ निवास करते हुए आप तप करते हुए आर्य समाज की सेवा में भी लगे रहे| यहाँ पर रहते हुए अभी कुछ समय ही हुआ था कि आपने संन्यास की दीक्षा भी ले ली| संन्यास लेने पर आपका नाम नारायण स्वामी रखा गया|

सन् १९०८ ईस्वी में सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा की स्थापना हुई| आपकी लगन तथा मेहनत की प्रवृत्ति को देखते हुए १९१० में ही आपको इस सभा का मंत्री बना दिया गया| आपने इस पद पर रहते हुए अपनी संगठन कुशलता, विद्वत्ता के साथ जो प्रचार का कार्य किया, उस सब की सफलता इस बात से स्पष्ट होती है कि १९२३ में आपको इस सभा का प्रधान बना दिया गया| प्रधान पद पर रहते हुए भी आपने आर्य समाज की खूब सेवा तथा प्रचार का कार्य किया तथा करवाया और दस वर्ष तक निरंतर इस पद पर रहते हुए सेवा करते रहे|

सार्वदेशिक आर्य (प्रतिनिधि सभा का प्रधान का पद ज्यों ही आपने त्यागा त्यों ही महर्षी दयानद सरस्वती जी की अर्ध शताब्दी मनाने का निर्णय सभा ने ले लिया| आप के संगठन कौशल को देखते हुए इस समारोह के आप कार्यकारी संयोजक बनाए गए| इस आयोजन में आपकी कुशाग्र बुद्धि के साथ ही साथ अद्वीतीय संगठन तथा प्रबंध पटुता के दर्शन भी मिलते हैं| निवास, भोजन. तथा कार्यक्रम स्थल की व्यवस्था (जो तीन लाख से भी अधिक लोगों के लिए था), आपकी कार्य कुशलता का ही स्वयं बोलकर परिचय दे रहा था| जब अजमेर में स्वामी जी के निर्वाण की अर्ध शताब्दी हुई तो यहाँ भी इन सब व्यवस्थाओं में भी आपकी कुशलता की झलक दिखाई दी|

हैदराबाद निजाम ने जो आर्यों तथा हिन्दुओं के प्रति अत्याचार पूर्ण रवैया अपना रखा था, बार बार की बात चीत के बाद भी जब इसमें कुछ भी परिवर्तन नहीं आया तो १९३९ में सार्वादेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने यहाँ से सत्याग्रह के रूप में एक जबरदस्त सत्याग्रह आन्दोलन चलाने की घोषणा कर दी| इस सत्याग्रह में जाना एक प्रकार से मौत के मुंह में जाना था| मौत के मुंह में सब से पहले जाने का निर्णय आपने लिया और इसके लिए आपके नेतृत्व में प्रथम सत्याग्रही जत्था हैदराबाद गया और आप सहित इस जत्थे के सब आर्य लोगों ने हैदराबाद में सत्याग्रह किया और अपनी गिरफतारी दी| इनके पीछे सत्यागृह के लिए जाने वाले हजारों आर्य वीरों की भीड़ उमड़ उठी| इस कारण निजाम को झुकना पडा| आर्यों की सब मांगें मान ली गई और आप लोग सफलाता के साथ विजयी होकर वापिस लौटे| हैदराबाद निजाम के अन्याय का रंग जब सिंध के मुस्लिम शासक पर भी चढ़ा और उसने भी अपने अधिकार क्षेत्र में सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिबांध लगा दिया तो आपके अनेक साथ आर्य वीर हाथों में सत्यार्थ प्रकाश लहराते हुए सिंध राज्य में प्रवेश कर गए| आपके साहस के सामने सिंध की मुस्लिम सरकार को किंचित मात्र भी साहस न हुआ कुछ भी कार्यवाही करने का, वह अपने आपको इस समय असहाय सा अनुभव कर रही थी| इस प्रकार सिंध में भी आपकी योग्य कुशलता के कारण आर्यों की विजय हुई|

जब आप इस प्रकार के आर्य समाज के विभिन्न आयोजनों में लगे हुए थे, समय बहुत कम मिलता था, तो भी बीच बीच में कुछ समय निकाल कर आपने अनेक उच्चकोटि की पुस्तकें भी लिख डालीं| इस प्रकार के उत्तम संगठन कर्ता, उत्तम प्रचारक, उत्तम लेखक होने के साथ ही साथ स्वामी जी एक अच्छे योगी भी थे| जब १९३१ में बरेली में दूसरा अंतराष्ट्रीय महासम्मलेन हुआ तो अपने अध्यक्षीय भाषण में आपने सांगठिक दृष्टि से अत्यंत मार्मिक और प्रेरक विचार दिए| (आज के पद लोलुप नेताओं को स्वामी जी के इस सम्मलेन के उदाबोधान में दिए गए इन विचारों से सीख लेनी चाहिए)| इस सम्मलेन के संपन्न होने के पश्चात् बरेली में ही १५ अक्टूबर १९४७ ईस्वी को अर्थात् देश की स्वाधीनता के मात्र दो महीने पश्चात् आपका देहांत हो गया| ऐसा लगता है कि मानो आप देश के स्वाधीन होने की ही प्रतीक्षा कर रहे थे|

डॉ.अशोक आर्य
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