त्यौहार का मौका है, एक दोस्त दूसरे को बुलाता है और चाकू से गोंदकर मार डालता है। दोनों अलग-अलग समुदायों से हैं। दोस्ती के नाम पर कत्ल जाहिर है धोखा है, जघन्य अपराध है। उसे सजा मिल चुकी है। पुलिस ने उसे अगले दिन उस युवा को एनकाउंटर में मार गिराया।

कहानी खत्म हो जानी चाहिए पर सच तो यह है कि कहानी अब शुरू हो रही है। आखिर हम अपने नौजवानों को क्या सिखा रहे हैं? वे इतने हिंसक क्यों हो रहे हैं? कौन सी शिक्षा, कैसे परिवार और कैसी परवरिश हो रही है, जहां कत्ल आम बात है। इतना ही नहीं, नौजवान इंस्टा पर रील भी पोस्ट करता है कि मैंने कत्ल कर दिया है। क्या कत्ल इतनी आम बात है। इसके पहले जयपुर में भी दो लोग ऐसा ही काम करते हैं, एक दर्जी को उसकी दुकान पर कत्ल करते हैं, वीडियो बनाते हैं। बाद में मारे जाते हैं। इतने बड़े देश में ऐसे कुछ उदाहरण यह कहकर टाले जा सकते हैं, इसमें क्या बात है। ये अपराध हैं। मनोविकार हैं। रोके नहीं जा सकते। लेकिन मामला सिर्फ अपराध का नहीं उस प्रेरणा का है, जिसके कारण ऐसा हो रहा है। हिंदुस्तान का एक भी नौजवान हिंसा या प्रतिहिंसा में मारा जा रहा है, तो यह दुख का कारण है। क्या हम अपनी औलादों को इसीलिए दुनिया में लाए हैं कि वे किसी को मार दें और फिर खुद मार डाले जाएं।

इन दिनों देश भर के तमाम हिस्सों से सांप्रदायिक उफान, गुस्सा और हिंसक घटनाएं सुनने में आ रही हैं। दूसरी ओर तमाम अतिवादी संगठन इंटरनेट के माध्यम से हमारे देश की युवा शक्ति को फांसने और अपने साथ लेने की कवायद में जुटे हैं। हम देखें तो सांप्रदायिकता और राजनीति के रिश्ते आपस में इस तरह जुड़े हैं, जिसमें यह कहना कठिन है कि कौन किससे ताकत पा रहा है? सच तो यह है कि राजनीति उन्हें इस्तेमाल करने के कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहती। सवाल सिर्फ हिंदू-मुसलमान का है या राजनीति का भी है। दंगे जब होते हैं या कराए जाते हैं तब इसका भी विश्लेषण होना चाहिए कि इसके पीछे कारण क्या हैं। पता चलेगा कि पंथ के बजाए कोई और मामला है, तथा हिंदू-मुसलमान का इस्तेमाल कर लिया जाता है। यह मानना बहुत कठिन है कि कोई भी समाज, जाति, परिवार या वर्ग अपने परिवार के साथ सुख-शांति से नहीं रहना चाहता। हिंसा किसे प्यारी है?

आतंकवाद को कौन पालना चाहता है? लेकिन हिंसा होती है, और आतंकवाद बढ़ता है। यानि यह सामान्य मनुष्यों का काम नहीं है। कोई भी स्वस्थ मनुष्य न तो हिंसा करेगा, न ही वह किसी आतंकी कार्रवाई का समर्थन करेगा। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे साधारण लोग नहीं हैं। वे दिमागी तौर पर अस्वस्थ, मनोविकारी, कुंठित और अपराधी मानसिकता के लोग हैं । लेकिन आश्चर्य यह कि शेष समाज का समर्थन पाने में वे सफल हो जाते हैं। कोई समय से, कोई पैसे से, कोई हथियारों से उन्हें समर्थन देता है। आखिर ये समर्थन देने वाले लोग कौन हैं? आप वैश्विक स्तर से स्थानीय हिंसक समूहों को देखें तो उन्हें मदद करने वाले हाथ साधारण नहीं है। आईएस के मनुष्यता-विरोधी अभियान को तमाम देशों से मदद के प्रमाण मिले ही हैं। भारत में माओवादी आतंक को भी तमाम ताकतों का समर्थन मिलता रहा है।

इसी तरह सांप्रदायिकता के विषधरों को भी समाज के तमाम तबकों से अलग-अलग रूपों में समर्थन मिलता है। वरना क्या कारण है कि हिंसक घटनाओं के पीछे हमारी राजनीतिक पार्टियों के तार जुड़े नजर आते हैं? जो नेता अपने समाज की गरीबी, अशिक्षा, बदहाली और पिछड़ेपन पर खामोश रहते हैं, वे अराजक तत्वों को समर्थन देते नजर आते हैं। लगता है उन्हें भारत के लोकतांत्रिक- जनतांत्रिक चरित्र पर विश्वास नहीं है।

भारत का संविधान और कानून सबके लिए बराबर है। संविधान के दायरे में आकर अपने अधिकारों की मांग करना भी ठीक है। समूची दुनिया में मुस्लिम समाज के सामने ये सवाल खड़े हैं। अपनी प्रतिक्रिया में संयम न रखना आज मुस्लिम समाज के सामने एक चुनौती ही है। अपने पंथ की ऐसी आक्रामक छवि बनता देखकर भी उसके नेताओं में चिंता नहीं दिखती।

राजनीतिक दल अपने वोट बैंक के लिए उनका इस्तेमाल करते आए हैं, करते रहेंगें। किंतु यह भी सोचना होगा कि आप कब तक इस्तेमाल होते रहेंगे? नकली नोटों के कारोबारी, हथियारों के सप्लायर, अवैध कारोबारों में लिप्त लोग अगर समाज का इस्तेमाल कर अपनी ताकत को बचाना चाहते हैं तो समाज को भी होशियार होना चाहिए। राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों, समाज के अगुआ लोगों को इस तरह की प्रवृत्ति के खिलाफ समाज को जागृत करना होगा। लोगों की भावनाओं से खेलने का काम बहुत हो चुका।

अब लोगों में वैज्ञानिक सोच जगाने और मानवता को सबसे बड़ा दर्जा देने का विचार आगे बढ़ाना होगा। गलत करने वाले को सजा देने वाले हम कौन हैं? कानून को हाथ में लेकर, तोड़फोड़ और आगजनी कर क्या हम अपने पंथ, उसकी पवित्र शिक्षाओं का आदर कर रहे हैं?

हमारे युवा गुमराह होकर आतंकवाद की राह पकड़कर युवा अवस्था में ही मौत की भेंट चढ़ रहे हैं, इससे स्पष्ट है कि हमारे समाज के अगुआ, धर्मगुरू, शिक्षक, बुद्धिजीवी सब हार रहे हैं। भारत हार रहा है। एक लोकतंत्र में होते हुए भी अगर हमारी सांसें घुट रही हैं, हम विचारों को व्यक्त करने के बजाए दहशत पैदा कर अपनी कुठाएं निकाल रहे हैं, तो हमें सोचना होगा कि आखिर हमने कैसा भारत बनाया है। भारत जैसे देश में जहां सब पंथों, समाजों और वर्गों को सम्मान और आदर के साथ रहने के समान अवसर हैं, वहां हिंसा की राह पकड़ रहा कोई भी समूह या व्यक्ति भारत-प्रेमी नहीं कहा जा सकता। अपने रोष और गुस्से को निकालने के लिए तमाम संवैधानिक और सत्याग्रही तरीके हमारी परंपरा में हैं, हम उनका अनुसरण करें और न्याय प्राप्त करें। एक न्यायपूर्ण समाज बनाने के लिए जनता का जाग्रत होना भी जरूरी है।

समाज को बांटकर शक्ति नहीं पायी जा सकती। सब साथ मिलकर विकास करें। सपनों में रंग भरें तभी भारत बचेगा और तभी हमारी शान दुनिया में बनेगी।

लेकिन सवाल यह उठता है कि राजनीति में अगर पंथिक राजनीति हस्तक्षेप करेगी, सांप्रदायिक भावनाएं वोट-बैंक के निर्माण में मददगार होंगी। हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ हमारा दृष्टिकोण चयनित होगा, एक हिंसा पर खामोशी, दूसरी हिंसा पर बवेला होगा, तब सांप्रदायिकता से कैसे लड़ेगें? काश राजनीति वाणी संयम और भारत-प्रेम की भावनाओं से लबरेज होती तो हम ऐसे सामाजिक संकटों का आसानी से मुकाबला कर पाते। लेकिन अफसोस राजनीतिक दलों के पास तिरंगे से ज्यादा बड़े और ज्यादा गहरे रंगों वाले झंडे हैं। राष्ट्रप्रथम की भावना ही हमें इस तरह के हिंसक अभियानों से बचा सकती है। वरना यह खून यूं ही बहता रहेगा और हाथ आएगा सिर्फ दुख। बहुत बड़ा दुख! अपने नौजवानों को खोते जाने का दुख!

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। पूर्व में भारतीय जनसंचार संस्थान-आईआईएमसी के महानिदेशक रह चुके हैं। )