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राष्ट्रसंत आचार्य चंद्रानन सागर ने कहा संथारा जीवन के अंतिम काल की विशेष तपस्या

सोमवार के शांति मार्च में बड़ी संख्या में भाग लेने की अपील की
मुंबई। राष्ट्रसंत आचार्य चंद्रानन सागर सूरीश्वर महाराज ने कहा है कि संथारा जैन धर्म की परंपरा में जीवन के अंतिम काल की विशेष तपस्या है। जिसे किसी भी कानूनी प्रक्रिया से गलत कहना उचित नहीं है। राष्ट्रसंत आचार्य चंद्रानन सागर ने जैन समाज के सभी संघों व संस्थाओं से जुड़े सक्रिय लोगों से अपील की है कि वे संथारा पर हाईकोर्ट के फैसले के विरोध में मुंबई में सोमवार को विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा के नेतृत्व में आयोजित हो रहे शांति मार्च में बड़ी संख्या में भाग लें। चंद्रानन सागर महाराज मुंबई में मालाड़ पश्चिम स्थित मामलेदारवाड़ी में राजस्थान जैन संघ में चातुर्मास पर बिराज रहे हैं।
जैन धर्म के विख्यात आचार्य राष्ट्रसंत चंद्रानन सागर महाराज ने संथारा की व्याख्या करते हुए बताया है कि जैन धर्म शास्त्रों के अनुसार संथारा निष्प्रतिकार-आत्मोत्सर्ग विधि है। इसके अनुसार जब तक चिकित्सकीय इलाज संभव हो, किया जाए। पर, जब कोई चिकित्सा संभव नहीं रहे, तब आत्मा और परमात्मा का चिंतन करते हुए जीवन की अंतिम सांस तक अच्छे संस्कारों के प्रति समर्पित रहने की विधि का नाम संथारा है। इसे किसी भी कानून द्वारा गलत साबित करने की कोशिश धर्म एवं उसकी परंपरा को नकारना है। उल्लेखनीय है कि संथारा पर हाईकोर्ट के फैसले के विरोध में मुंबई की करीब एक सौ से भी ज्यादा संस्थाओं की तरफ से सोमवार को विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा के नेतृत्व में एक विशाल शांति मार्च का आयोजन किया गया है। जिसमें हजारों लोग भाग लेंगे। राष्ट्रसंत आचार्य चंद्रानन सागर सूरीश्वर महाराज ने इस शांति मार्च में ज्यादा से ज्यादा लोगों से भाग लेकर हजारों साल पुरानी धार्मिक परंपराओं में कानून के हस्तक्षेप का विरोध करने की अपील की है।
संथारा पर हाईकोर्ट के फैसले के विरोध में हो रहे सोमवार के शांति मार्च को आचार्य राष्ट्रसंत चंद्रानन सागर सूरीश्वर महाराज सहित जैन संत गच्छाधिपति प्रेम सूरीश्वरजी महाराज, गच्छाधिपति आचार्य श्री प्रद्युम् विमल सूरीश्वर महाराज, आचार्य श्री हेमचंद्र सूरीश्वर महाराज, आचार्य श्री खुशालचंद्र सूरीश्वर महाराज, मुनि श्री भाग्यचंद्र विजय महाराज, डॉ. चंदनाश्रीजी महाराज आदि जैन संतों का भी आशीर्वाद मिला है। मालाड़ में श्रावक – श्राविकाओं को संबोधित करते हुए अपने दैनिक व्याख्यान में राष्ट्रसंत चंद्रानन सागर सूरीश्वर महाराज ने कहा कि संथारा धैर्यपूर्वक अंतिम समय तक जीवन को ससम्मान जीने की एक विश्ष्ट कला है। जिसका जैन परंपरा में विषशेष महत्व है। उन्होंने संथारा को जीवन की अंतिम साधना बताते हुए कहा कि यह जैन धर्म की परंपरा का अभिन्न अंग है।

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