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सह्याजी राव गायकवाड़, महर्षि दयानंद सरस्वती और शिक्षा क्रांति

दुनिया मेरे आगे

डॉ.विवेकआर्य

महाराजा सह्याजी राव गायकवाड़ आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती के शिष्य थे। स्वामी दयानन्द द्वारा “सत्यार्थप्रकाश” में बालक बालिकाओं की शिक्षा के सम्बन्ध में दिए दिशा निर्देशों को महाराजा जी ने अनुसरण किया था। स्वामी जी लिखते हैं-

“आठ वर्ष के हों तभी लड़कों को लड़कों की और लड़कियों को लड़कियों की शाला में भेज दें।”

“इस में राज नियम और जाति नियम होना चाहिए कि पांचवें अथवा आठवें वर्ष से आगे अपने लड़कों और लड़कियों को घर में न रख सकें। पाठशाला अवश्य भेज देवे। जो न भेज वह दण्डनीय हो।”

स्वामी जी द्वारा प्रतिपादित नियमों को पढ़कर अपने राज्य में प्रथम वर्ष बड़ौदा नगर क्षेत्र, द्वितीय वर्ष कुछ अधिक क्षेत्र और तृतीय वर्ष सम्पूर्ण राज्य में यह नियम लागू किया। भारत में मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा पहली बार 1906 में बड़ौदा राज्य द्वारा शुरू की गई थी। इसके लगभग कई दशकों बाद स्वतंत्र भारत में यह कदम उठाया गया और सभी को मुफ्त शिक्षा का अधिकार मिला। उस समय, जब मोटर वाली गाड़ियां बहुत कम चलती थी। तब बड़ौदा के महाराजा जी ने 500 मोबाइल पुस्तकालय की शुरुआत की थी।

यह ध्यान देने योग्य है कि भारत के संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव अम्बेडकर बड़ौदा राज्य के पिछड़ो के उत्थान के लिए दी जाने वाली छात्रवृति के अंतर्गत ही शिक्षा प्राप्त कर सके थे। यहाँ तक कि सियाजी राव गायकवाड़ जी ने अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृति और शिक्षा समाप्ति पर अपने राज्य में में नौकरी भी दी थी।

भारतीय इतिहास में शिक्षा क्रांति में स्वामी दयानन्द और आर्य समाज का योगदान अप्रतिम है।

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