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कोरोना संकट में संघ की भूमिका सराहनीय रहीः भैयाजी जोशी

कोरोना संकट के दौरान देश के विभिन्‍न वर्गों ने पीडि़तों की मदद के लिए अपने अपने स्‍तर पर जो भी संभव हो सकता था किया। इस अभियान में राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ ने भी महत्‍वूर्ण भूमिका निभाई। कोरोना संकट के दौरान संघ की भूमिका का उल्‍लेख करते हुए सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने ‘आर्गनाइजर’ को एक इंटरव्‍यू में बताया कि लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में उन लोगों के सामने भोजन का बहुत बड़ा संकट था जो रोज कमाकर अपने परिवार का पेट पालते थे। ऐसे लोगों की मदद के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया और मोटे अनुमान के मुताबिक करीब दो लाख कार्यकर्ताओं ने लगभग एक करोड़ लोगों तक भोजन और अन्‍य जरूरी सामान के पैकेट पहुंचाए।

जिस समय लोगों ने अपने घरों की ओर पैदल चलना प्रारंभ किया तो एक बहुत दुखद परिस्थिति सबके सामने आई। इसलिए सोचा गया कि जिन-जिन रास्तों से वे जा रहे थे, वहां उनके लिए भोजन और आवश्‍यक वस्‍तुओं की आपूर्ति का प्रबंध किया जाए। जैसे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र से निकले मजदूरों की मध्य प्रदेश आते-आते चप्पलें भी टूट गई थीं। ऐसे में बहुत बड़ी मात्रा में चप्पल वितरण का काम हुआ। कई यात्री बीमार भी हो जाते थे, उनके लिए चिकित्‍सकों एवं दवा का प्रबंध किया गया। प्रवासी मजदूरों का पंजीकरण भी बहुत बड़ी समस्या थी। कई स्थानों पर संघ के स्वयंसेवकों ने शासन के अधिकारियों से बात करके प्रवासी मजदूरों के पंजीकरण में शासन का सहयोग किया।

यह हमारे कार्यकर्ताओ का साहस है कि उन्‍होंने सब प्रकार का खतरा मोल लेते हुए, कोरोनाग्रस्त क्षेत्रों में जाकर स्वास्थ्य कर्मियों को पूरा सहयोग किया। थोड़ा प्रशिक्षण लेकर वे सब पीपीई किट पहनकर विशेषत: दिल्ली, मुंबई, पुणे जैसे शहरों की उन घनी बस्तियों में गए जहां जाने से लोग कतरा रहे थे। हमने सेवा भारती के नाम से एक हेल्‍पलाइन सेवा शुरू की। इसका बड़ी संख्‍या में लोगों ने लाभ लिया। वह एक बहुत पीड़ादायक कालखंड था लेकिन स्वयंसेवकों ने बहुत ही संवेदना के साथ सारे कामों को अंजाम दिया। हमें इस कार्य में समाज के भिन्न-भिन्न संगठनों खासतौर से धार्मिक संस्थाओं का बहुत बड़ा सहयोग प्राप्‍त हुआ।

आपदा प्रबंधन: हम आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञ नहीं हैं। हम ऐसा कोई विशेष प्रशिक्षण भी नहीं देते। परंतु संघ में एक संस्कार मिलता है। किसी भी आपादा को खुद पर आई आपदा समझकर अपनी सारी शक्ति लगाने का संस्कार। इसीका परिणाम है कि स्वयंसेवक परिस्थिति को समझकर उसके अनुसार अपने आपको तैयार करता जाता है। हम कोई प्रशिक्षण नहीं देते। हम साधन भी कभी-कभी नहीं दे पाते, साधन जुटाने का काम भी वह करता है, उसके लिए समाज के पास जाता है। हमारी कोई केंद्रीय व्यवस्था नहीं है कि कोई आदेश निकालेगा, कोई व्यवस्थाएं बनाएगा। लेकिन दृष्टिकोण यह है कि हम संकट के मूक साक्षी नहीं बनेंगे। जब हम कहते हैं कि सारा समाज अपना है तो स्वाभाविक रूप से यह क्रिया बिना किसी सूचना के, बिना किसी आदेश के होगी। मैं इतने वर्षों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि बिना प्रशिक्षण के हमारे स्वयंसेवक प्रशिक्षित लोगों के समान काम करते हैं।

मजदूरों का पलायन: कोरोना काल के संकट अलग-अलग प्रकार के हैं, यह जो मजदूरों का स्थलांतरण हुआ है, यह एक विशेष परिस्थिति में हुआ है। आगे ऐसा न हो इसका दूरगामी समाधान आवश्यक है। मैं इस स्थलांतरण को अस्थाई मानता हूं। बड़ी संभावना है कि बहुत बड़ा प्रतिशत सामान्य परिस्थिति आते ही फिर अपने-अपने स्थान पर जाएगा। परंतु इसके साथ ही, कुछ प्रतिशत वर्ग जरूर ऐसा होगा कि जो अब अपने गांव की तरफ गया है, वह वहीं रहेगा। उनके बारे में राज्‍यों को सोचना होगा कि उनका पुनर्वसन कैसे हो। रोजगार यहीं पर उपलब्ध कैसे हो। कौशल विकास की योजनाएं जितनी अच्छी बनेंगी उसके आधार पर अपने क्षेत्र में ही इस प्रकार के कौशल हम उपलब्ध करा सकेंगे। ऐसे में बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इसलिए यह संकट में भी एक अवसर है। दूसरा सबसे बड़ा नुकसान हुआ है जो स्वयं रोजगार करते हैं उनका। इसलिए हम ‘अनलॉक’ पद्धति शुरू करने की शासन की पहल का स्‍वागत करते हैं। अब ताला खोलना है। भारत की सामाजिक रचना में स्वयंरोजगार और विकेंद्रीकरण जितना ज्यादा होगा, उतना लाभदायक होगा।

आत्‍मनिर्भर भारत: प्रधानमंत्री जी ने बहुत अच्छा शब्द प्रयोग किया है – ‘लोकल’ के लिए ‘वोकल’। यानी स्थानीय के लिए मुखर बनो। अगर इसको बढ़ावा मिलता है तो बहुत अच्छा होगा। यह ठीक है कि आज परस्परावलंबन का जीवन प्रारंभ हुआ है। परंतु यह अवसर है कि हम अपने देश की आवश्यकताएं अपने देश में पूरी करें। दूसरे, इस घटना के कारण एक स्वदेशी का भाव विकसित हुआ है कि यथासंभव देश आत्मनिर्भर बनेगा तो हमारी आवश्यकता यहां पूरी होगी। हमारी आवश्यकताएं थोड़ी कम-ज्यादा गुणवत्ता की होंगी, तो भी हम उसको स्वीकार करेंगे। इस प्रकार का मानस बन रहा है। इसको और अधिक प्रोत्साहित करने की आवश्यकता रहेगी।

दूसरों का गुणगान करने से हम कभी बड़े नहीं हुए। दूसरों की नकल करने से भी हम बड़े नहीं हुए। अपने यहां पर प्रतिभाएं हैं, पुरुषार्थ है। जो भी सहयोग चाहिए उसकी अगर व्यवस्था अच्छी बन जाती है तो मैं समझता हूं कि आत्मनिर्भर भारत केवल नारा नहीं रहेगा, इसे हम प्रत्यक्ष साकार होते देख सकेंगे। उसके लिए और अधिक नियोजन चाहिए, वह हो जाए, बस यही अपेक्षा करता हूं।

चीन का बहिष्‍कार: आज चीनी वस्‍तुओं के बहिष्‍कार की बात हो रही है। शुरू में नकारात्मक लग सकता है कि किसी देश की वस्तुओं का बहिष्कार करो, परंतु समाज जीवन की आवश्यकता है, वह जब पूरी नहीं होगी तो बहिष्कार करने से कैसे चलेगा? इसलिए इसकी पूरी व्यवस्था चाहिए। आज शुरुआत इससे हुई कि हम चीन की चीजें नहीं लेंगे। यह स्वाभाविक हुआ है, किसी ने जनांदोलन नहीं बनाया। आज सामान्य व्यक्ति भी कहता है- चीन का है तो हमको नहीं चाहिए। हमारे लिए यह अवसर है। यह केवल भारत के लिए नहीं, दुनिया के लिए भी अच्छा संदेश है कि हर देश अपनी-अपनी आवश्यकताएं अपने बल पर पूरी करे। वह न दूसरों का शोषण करे, न दूसरों पर निर्भर रहे।

सीमा पर अतिक्रमण की खबरें : कोई भी देश अपनी सीमाओं पर आक्रमण कैसे स्वीकार कर सकता है? कोई भी अपने सीमावर्ती देशों के साथ तनाव नहीं चाहता है। परंतु इसका विचार दोनों तरफ से होना चाहिये। आज की परिस्थिति में समाधान देश की सेनाओं, रक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री आदि को मिलकर निकालना है कि इस संकट से भारत की सुरक्षा कैसे होगी। यह सामान्यजन का नहीं, सरकार और सेना का विषय है। हम सेना पर पूरा विश्वास करते हैं। अपनी सेना का सामर्थ्य अच्छा है, इसको ध्यान में रखते हुए सरकार अपनी नीतियां और जो योजनाएं बनानी हैं, वे बनाए। मैं इतना विश्वास के साथ कह सकता हूं कि इस समय शासन जो पहल करेगा, सारा समाज सरकार के पीछे खड़ा रहेगा।

डिजिटल शिक्षा: वर्तमान में संकट भिन्न प्रकार का है। भारत में शासकीय के साथ ही, निजी शिक्षा संस्थान भी बहुत बड़ी संख्‍या में हैं जो समाज के सहयोग पर चलते हैं। जिन संस्थानों पर आर्थिक संकट है, उनमें कैसी शिक्षा उपलब्ध होगी इस पर विचार करने की आवश्यकता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के आधुनिक माध्यमों का सहयोग लेते हुए शिक्षा दी जाए, इसकी भी अपनी एक सीमा है। अगर हम मानें कि 8 प्रतिशत जनजाति क्षेत्र है, जहां दूरदराज में ऐसी व्यवस्था नहीं पहुंची है। उनका क्या होगा। एक बहुत बड़ा वर्ग गरीबी रेखा के नीचे है, उनके पास इतने साधन नहीं होंगे। उनके बच्चों की शिक्षा का क्या होगा? यानी आधुनिक साधनों का उपयोग करते हुए शिक्षा पहुंचाने की जो बात हो रही है इसकी भी अपनी सीमा है। इसमें से कुछ रास्ता निकालना पड़ेगा। स्वयंसेवी संस्थाएं इसका कुछ जिम्मा उठा सकती हैं। वे बच्चों की कोचिंग करें, बच्चों को सिखाएं। अपने घर में कोचिंग क्लास आदि चलाएं। एक वर्ष हम अपनी योजनाओं के आधार पर पार कर लें। फिर अगले वर्ष में कुछ चीजें सुलभ हो सकती हैं। ‘अफोर्डेबल एजुकेशन’ और ‘क्वालिटी एजुकेशन’ हमारा हमेशा का सिद्धांत रहा है। शैक्षिक वर्ष में किसी भी छात्र का नुकसान ना हो, इसको सामने रखकर विचार करना चाहिए, नहीं तो एक साल शिक्षा भी रुक जाएगी। भारत के पूरे समाज जीवन में एक साल का अंतर आ जाएगा। यह किसी देश के लिए भी वहनीय नहीं है।

विघटनकारी ताकतें: हमारा इतने वर्षों का अनुभव है कि कुछ असामाजिक, अराष्ट्रीय शक्तियां ऐसे अवसरों का लाभ उठाकर समाज व्यवस्था और देश को दुर्बल करने का षड्यंत्र करती आई हैं। इस कालखंड में भी यह होना कोई असंभव नहीं है, परंतु अब संघ भी बड़ा हुआ है उसकी शक्ति भी कुछ बढ़ी है। उसके आधार पर ऐसी ताकतों के संदर्भ में हम समाज जागरण का प्रयास कर सकते हैं और करेंगे। मैं समझता हूं कि इतनी आसानी से ऐसे तत्व सफल नहीं होंगे। इस संकट का लाभ उठाते हुए अगर देश को कोई दुर्बल करना चाहेगा, तो संघ जैसे संगठन समाज जागरण की भूमिका प्रभावी रूप से अदा करेंगे।

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