महोत्सव की महफ़िल को हिन्दी और मराठी के जाने-माने गायक और लेखक दीपक खेर ने अपनी आवाज़ से सँवारा. उन्होंने कबीर के नौ पदों और कुछ दोहों की ऐसी दिलकश पेशकश की जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. उन्होंने 'रहना नहिँ देश बिराना', 'मन लागो मेरो यार फकीरी में', 'मोको कहां ढूंढे रे बन्दे' और 'साधो ये मुर्दों का गाँव' जैसे मशहूर पद गा कर श्रोताओं की भरपूर वाहवाही लूटी. तबले पर श्री पिसाट और हारमोनियम पर श्री म्हात्रे ने उनका बख़ूबी साथ दिया.
गायन शुरू होने से पहले लेखकों और विचारकों ने कबीर के महत्व पर अपनी बात रखी.
कवि रमन मिश्र ने कराची के मशहूर सूफ़ी-कव्वाल उस्ताद फरीद-एयाज खान और पंडित कुमार गंधर्व से जुड़े कुछ दिलचस्प संस्मरण सुनाए. उन्होंने उस्ताद फरीद के हवाले से कहा कि कबीर सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं हैं, बल्कि वे लोगों को जगाने और मुक्ति का रास्ता दिखाने वाले हैं; कबीर को सिर्फ गाया नहीं, बल्कि जिया जाता है. अबू और फ़रीद कहते हैं कि जब तक आप अपने भीतर के 'मैं' (अहंकार) के घर को आग नहीं लगा देते, तब तक आप कबीर को छू भी नहीं सकते। इसलिए कबीर को कंठ से गाने से पहले, उसे अपने आचरण में जीना पड़ता है।
कबीर की निर्वाण स्थली मगहर से आए युवा लेखक कमलेश शर्मा ने कहा कि हमारे यहाँ कबीर लोक-परंपरा से आते हैं. कबीर का दर्शन हमें सिखाता है कि जिस तरह अनाज से कचरा साफ किया जाता है, उसी तरह हमें अपने जीवन से ढोंग और आडंबर को दूर करना चाहिए. कबीर हमारे लिए सिर्फ संत नहीं, बल्कि जीवन के सच्चे मार्गदर्शक हैं.
इस सफल कार्यक्रम का मंच संचालन सुप्रसिद्ध कवि, लेखक और प्रेरक वक्ता शैलेश सिंह ने किया. कार्यक्रम में साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म और सामाजिक क्षेत्र की कई बड़ी हस्तियां मौजूद थीं, जिनमें हरिमृदुल, राकेश शर्मा, भूपेन्द्र मिश्र, डॉ. रीतादास राम, प्रो. संध्या यादव, रोशनी किरण, तबस्सुम नेहा, धर्मेंद्र चतुर्वेदी, मुस्तहसन अज़्म और पुलक चक्रवर्ती शामिल हैं. इनके अलावा गुजराती, मराठी और कन्नड़ भाषा के लेखक और कलाप्रेमी भी मौजूद थे, जिन्होंने हर पद पर दिल खोलकर दाद दी.
कार्यक्रम के अंत में स्वर संगम फाउंडेशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ लेखक हृदयेश मयंक ने सभी मेहमानों और श्रोताओं का दिल से आभार जताया. उन्होंने कहा - "आज के तनावभरे और जहरीले माहौल में भाईचारे, प्यार, समझदारी और तर्क की बात कबीर ही करते हैं. इंसानी बराबरी पर कबीर ने सबसे ज्यादा जोर दिया है. आज के समय में कबीर सबसे ज्यादा जरूरी हैं, इसीलिए हम उन्हें बार-बार सुनते हैं और अपने आचरण में उतारने की कोशिश करते हैं."
कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्था के सचिव डॉ. हरिप्रसाद राय ने कलाकारों का शाल और गुलदस्ता देकर स्वागत किया।





