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हमारी सोच टेलीविज़न की खबरों और रिएलिटी शो तक ही सीमित हो गई हैः एन.के. सिंह

जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के संगोष्ठी भवन में बुधवार को आयोजित 19वें दीक्षांत समारोह के पूर्व सामाजिक विज्ञान की ‘‘गिरते मानवीय मूल्य: कारण एवं समाधान’’ विषयक व्याख्यानमाला में बतौर मुख्य अतिथि ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह ने कहा कि आज हमारे समाज के प्रतिमान गलत हो गये है। टेलीविजन पर रिएल्टी शो में स्थान पाने वाले और फिल्मी दुनिया के कलाकारों को युवाओं के समक्ष प्रतिमान (आईकाॅन) के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। समाज के रीयल शो में गांव, देहात में छिपी प्रतिभाएं विपरीत परिस्थितियों में सफल हो रही है। इन्हें युवाओं के समक्ष प्रतिमान के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए इसके लिए पुरानी पीढ़ी को आगे आना होगा।

श्री सिंह ने कहा कि कहा कि भारत की मीडिया सबसे अधिक शक्तिशाली है यह बिकती नहीं। देश में 272 चैनल, लगभग पौने दो लाख समाचार पत्र हैं। जो देश के आम आदमी की आवाज को मंच दे रहे है। इस पर मुट्ठी भर लोग वर्चस्व जमाने की कोशिश करते है मगर वो आज नाकामयाब हैं। मीडिया से जुड़े लोगों का न बिकने का कारण उनका मानवीय मूल्य है। यह मानवीय मूल्य मां की गोद से शुरू होता है। इसे किसी कानून से नहीं रोका जा सकता।

उन्होंने कहा आज देश की शिक्षा पद्धति में जबर्दस्त विरोधाभास है, इसके चलते शिक्षा के मूल्यों का ह्रास हो रहा है। आज पाठ्यक्रम से लेकर सेलेक्शन तक मानवीय मूल्यों की उपेक्षा हो रही है जो की देशहित में नहीं है। उन्होंने युवाओं से भ्रष्टाचार की मुखालफत करने की सलाह दी। उनका मानना हैं कि भारत में सबसे अधिक युवा वर्ग ही है किसी भी बदलाव में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने कहा कि दुनिया के उन नौ देशों में भारत भी एक है जिसकी जीडीपी बढ़ी है। मगर हमारा विकास का माॅडल ऐसा है जो भारतीय परिवेश के अनकूल नहीं है। देश में हमें पाश्चात्य माॅडल की नहीं, भारतीय परिवेश के मानवीय मूल्यों के माॅडल को अपनाना होगा।
उन्होंने कहा कि बाजार के दबाव में हमारे सोचने की ताकत को खत्म कर दिया है।

आज हमारे देश के युवा इण्टरनेट, सोशल मीडिया, व्हाट्सएप के माध्यम से अपना मनोरंजन कर रहे है। उनके सोने से लेकर सुबह जागने तक बाजार ने अपने मनोरंजन का जाल बिछा रखा है ताकि युवा न उस मुद्दे पर सोचे और न उसका विरोध करें। इससे हमारे देश के आर्थिक स्थिति वास्तविक धरातल पर कमजोर होती जा रही है। गरीब और धनी के बीच दूरी बढ़ी है। आज एक प्रतिशत आदमी के पास देश की 70 प्रतिशत सम्पत्ति है यह हाल पूरे विश्व में भी है। दुनिया के 62 लोगों के पास जितनी सम्पत्ति है उतना 350 करोड़ लोगों के पास भी नहीं है। यह कौन सा विकास का माॅडल है? हमें अपने देश के आर्थिक माॅडल को बदलना होगा। समानता के आधार पर अपने विकास दर का वितरण करना होगा।

उन्होंने महिला सशक्तिकरण का जिक्र करते हुए कहा कि आज संस्कार बदल रहे है। महानगरों में लीव इन रिलेशन आम बात हो गयी है। पाश्चात्य संस्कृति को जो हम अपना रहे है वह हमारी तासीर में नहीं है। उनका मानना है कि आज मानवीय मूल्य को पाने के लिए लोभ, माया, मोह, क्रोध से बाहर निकलना होगा।

इसके पूर्व सामाजिक विज्ञान संकाय के अध्यक्ष डा. अजय प्रताप सिंह ने मुख्य अतिथि का विस्तृत परिचय दिया। मुख्य अतिथि को पुष्पगुच्छ देकर डा. एचसी पुरोहित, डा. दिग्विजय सिंह राठौर ने स्वागत किया। साथ ही डा. सुनील कुमार, डा. अवध बिहारी सिंह, डा. रूश्दा आजमी समेत विभाग के शिक्षकों ने स्मृति चिन्ह भेंट किया। इस अवसर पर प्रो. आरएस सिंह, प्रो. बी.बी. तिवारी, डा. बीडी शर्मा, डा. अविनाश पाथर्डीकर, डा. सुशील कुमार, डा. सुभाष वर्मा, डा. दयानंद उपाध्याय, सुधाकर शुक्ला, डा. अमरनाथ यादव, डा. रंजना यादव, डा. आलोक गुप्ता, पंकज सिंह, आलोक आदि सहित सभी संकायों के विद्यार्थी उपस्थित रहे। धन्यवाद ज्ञापन डा. मनोज मिश्र ने किया। दीक्षांत पूर्व व्याख्यानमाला के संयोजक डा. अजय द्विवेदी ने संचालन किया।

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