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भक्ति आंदोलन निरंतर चलते रहने वाली प्रक्रिया और विचार – प्रो माधव हाड़ा

नई दिल्ली। ‘हमें अपनी विरासत को समझने के लिए और अपने वर्तमान को समझने के लिए अपने अतीत को समझना चाहिए। भारतीय समाज में कहा जाता है कि हमारे भीतर अतीत का आग्रह बहुत अधिक है पर विडंबना यह है कि अतीत की सार-संभाल, अतीत का पुनरावलोकन और अतीत की पहचान को लेकर कोई आग्रह उसमें नहीं है।’ सुप्रसिद्ध आलोचक और भक्तिकाल के चर्चित अध्येता प्रो. माधव हाड़ा ने उक्त विचार हिंदी साहित्य सभा, हिंदू कॉलेज के वार्षिक साहित्य समारोह ‘अभिधा’ के दूसरे दिन ‘भक्तिकाल की पुनर्व्याख्या की ज़रूरत’ विषय पर व्यक्त किए।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के फैलो प्रो. हाड़ा ने कहा कि भक्ति आंदोलन की पुनर्व्याख्या होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि बहुत बड़े यूरोपीय मनीषियों ने और उनके अनुवर्ती भारतीय मनीषियों ने भक्ति आंदोलन का एक रूप व पहचान बनाई है। पर कोई भी एक पहचान जो विद्वान बनाते हैं, उसकी सीमाएं होती हैं और इसी कारण से भक्तिकाल की पहचान पर पुनर्विचार आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यहाँ दो तरह की सीमाएं हैं, एक संदर्भ सामग्री शोध सामग्री की उपलब्धता की सीमा और दूसरी सीमा समझ और संस्कार की है। प्रो हाड़ा ने जोर देकर कहा कि भारतीय समाज यूरोपीय समाज से बहुत पृथक है। बहुत सारे मायनों और तरीकों में यथा भाषा, सरोकार और चिंतन में जैसी विविधता हमारे यहाँ है वह यूरोप में नहीं। भारत और यूरोप में धर्म के मायने भी बिल्कुल भिन्न हैं। वहां का ‘धर्म’ भारत के ‘संस्कृति’ शब्द से मेल खाता है। उन्होंने कहा कि भक्ति आंदोलन का एक और पक्ष ये भी है कि ये कोई धार्मिक आंदोलन नहीं है। इसे एक ऐसे आंदोलन के रूप में समझा जाना चाहिए जिसमें जीवन के महत्त्वपूर्ण पक्ष ओर कई सरोकार शामिल हैं।

प्रो हाड़ा ने भक्ति आंदोलन की विविधताओं को रेखांकित करते हुए बताया कि भक्ति आंदोलन ने जगह और उसकी ज़रूरत के अनुरूप अलग-अलग रूप धारण किए जो कि राजस्थान, गुजरात, कश्मीर आदि स्थानों पर भिन्न रूपों में देखने को मिले। लेकिन भक्ति आंदोलन के सार्वदेशिक रूप के समक्ष उन क्षेत्रीय अनुरूपों की पहचान ही नहीं बची। भक्ति आंदोलन में तमाम तरह के भक्ति संत शामिल थे जिनको किसी एक मापदंड पर खड़ा नहीं किया जा सकता, वे सब अनूठे थे। भक्ति आंदोलन में भक्ति का एक सरल और सहज रूप विकसित हुआ जो किसी भी वर्गीकरण से ऊपर था। हम आदिकाल, रीतिकाल इत्यादि की समय सीमा भी तय करते हैं लेकिन भक्तिकाल के साथ ये नहीं है। यह एक निरंतर चलते रहने वाली प्रक्रिया और विचार है।

प्रो हाड़ा ने बताया कि भक्ति आंदोलन ने ही देशज भाषाओं को स्वीकृति दिलाई। इससे इस पूरे आंदोलन को एक सर्वव्यापी स्वीकृति मिलने में बहुत सहायता मिली। हालांकि यह पूरा आंदोलन अहिंसा और भक्ति पर आधारित था लेकिन पंजाब या अन्य इलाकों में जहां परिवर्तन की जरूरत पड़ी, यह पूरा आंदोलन उस परिपेक्ष्य के लिए परिवर्तित भी हुआ।

व्याख्यान का संयोजन विभाग के प्राध्यापक रमेश कुमार राज ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत में विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. विमलेंदु तीर्थंकर ने प्रो. हाड़ा का स्वागत किया। प्रथम वर्ष की छात्रा नंदिनी ने प्रो. हाड़ा का परिचय दिया। अंत में प्रथम वर्ष की छात्रा रिया गौतम ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

आज के व्याख्यान सत्र के बाद साहित्यिक प्रश्नोत्तरी का अंतिम चरण आयोजित किया गया। इसका संचालन-संयोजन हिंदी साहित्य सभा के पदाधिकारियों हर्ष उर्मलिया, प्रखर दीक्षित, दिशा ग्रोवर, श्रेयश श्रीवास्तव व राहुल कसौधन ने किया। शनिवार को अभिधा के अंतिम दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो आशीष त्रिपाठी ‘समकालीन हिंदी नाटक’ पर व्याख्यान देंगे तथा लोकगीत गायन प्रतियोगिता का आयोजन होगा।

सूरज सिंह

श्रेया राज

प्रथम वर्ष, हिंदी विभाग

हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

8235567242

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