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नई शिक्षा नीति ऐसी हो जो देश को गुलाम बनने से बचाए

सेवा में
माननीय श्री प्रकाश जावड़ेकर जी
मानव संसाधन विकास मंत्री
भारत सरकार।

महोदय,
आप के मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित नई शिक्षा नीति के मसौदे को मैने ध्यान से पढ़ा. इस संबंध में मेरे कुछ जरूरी सुझाव हैं जिन्हे आप के विचारार्थ संलग्न कर रहा हूँ.

किसी भी देश के विकास की बुनियाद उसकी शिक्षा नीति होती है. यह प्रसन्नता का विषय है कि आप की सरकार देश की शिक्षा को लेकर चिन्तित है और कुछ बड़े कदम उठाने को सोच रही है. मेरी गुजारिश है कि आज शिक्षा में आमूल परिवर्तन की जरूरत है. मामूली संशोधनों से कुछ खास फर्क पड़ने वाला नहीं है. ऐसी दशा में मेरे कुछ सुक्षाव निम्नलिखित हैं-

1. शिक्षा पूरी तरह सबके लिए मुफ्त और समान होनी चाहिए, ऐसे विद्यालय और शिक्षण संस्थान होने चाहिए जहाँ अमीर और गरीब सबके बच्चे बिना भेद भाव के पढ़ लिख सकें और उनमें एक जैसे पाठ्यक्रम भी हों. प्रतिभाएं कहीं भी पैदा हो सकती है इसलिए सभी बच्चों को पढ़ने का अवसर उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए.

देश की दोहरी शिक्षा व्यवस्था पर अंकुश लगनी चाहिेए. गरीबों के लिेए घटिया और बदहाल शिक्षा तथा अमीरों के लिेए पांचसितारा शिक्षा बंद होनी चाहिेए. यह स्थिति शिक्षा के व्यवसायीकरण के कारण पैदा हुई है. विद्या के मंदिर बड़े पवित्र स्थल होते है. इनको मुनाफे के लिए मत खोलिए. इस देश के गरीब का बच्चा भी प्रतिभाशाली हो सकता है और उसे पढ़ने का अधिकार है क्योंकि वह भी इसी देश का नागरिक है. इसलिेए जितना जल्दी हो, शिक्षा की खरीद- फरोख्त बंद होनी चाहिए. इसके लिेए शिक्षा के लिेए बजट बढ़ाएं और उसे कोठारी आयोग के सुक्षाव के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम छ प्रतिशत करें. शिक्षा को जितना जल्दी हो, निजी क्षेत्र से निकालकर सार्वजनिक क्षेत्र में ले आइए. इस दृष्टि से पश्चिम के देश हमारे आदर्श नहीं बन सकते. वे विकसित हैं, उनके पास बहुत पैसा है. वे पैसा देकर बेहतर शिक्षा खरीद सकते हैं. फिर भी अमेरिका में अधिकाँश युवा छात्र अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए मजदूरी करते हैं, लाखों युवतियां तो पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए अपना शरीर बेचने तक के लिए विवश हैं. वहां अधिकाँश युवा पढ़ाई पूरी करने के साथ भारी कर्ज में डूबे रहते हैं. हमारे देश में ऐसी स्थिति न पैदा कीजिए. हमारा अतीत अत्यंत उज्वल है, हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें अच्छा मनुष्य बनाने पर जोर देने वाली रही है. हमें वही चाहिेए जिसपर हम गर्व करते रहे हैं.

2. मेरा दूसरा सुक्षाव है कि दसवीं तक मातृभाषाओं में शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए. इसके अलावा एक समय सीमा के भीतर उच्च शिक्षा, कानून की शिक्षा यहाँ तक कि तकनीकी और मेडिकल आदि की शिक्षा भी मातृभाषाओं में देने के विकल्प की व्यवस्था होनी चाहिेए ताकि जो विद्यार्थी मातृभाषाओं में उच्च शिक्षा लेना चाहें उन्हें किसी तरह की असुविधा न हो. वह समय सीमा भी पाँच वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए नहीं तो राजभाषा अधिनियम 1963 की तरह वह समय सीमा भी कभी खत्म ही नहीं होगी.

दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो दूसरे की भाषा में शिक्षा ग्रहण करके विकसित हो सका हो अमेरिका, इंग्लैण्ड, रूस फ्रांस, जर्मनी, जापान से लेकर चीन तक सभी अपनी भाषा में शिक्षित होकर महाशक्ति बन सके हैं. यदि दुनिया की सबसे कठिन लिपियों में से एक चीनी लिपि और चीनी भाषा में आधुनिक ज्ञान विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई हो सकती है तो किसी भी भाषा और लिपि में हो सकती है. आदमी चाहे जितनी भी भाषाएं सीख ले किन्तु वह सोचता है अपनी भाषा में. हमारे बच्चों को दूसरे की भाषा में पढ़ना पड़ता है, उसे अपनी भाषा में अनूदित करके समझना पड़ता है, लिखने के लिए फिर दूसरे की भाषा में अनुवाद करना पड़ता है. उसके जीवन का बड़ा हिस्सा तो दूसरे की भाषा सीखने में ही चला जाता है. हमारे बच्चे विदेशी भाषा के जुए से कब मुक्त होंगे ? अब बहुत हो चुका, उनके पीठ से बस्ते का बोक्ष उतारिए और उनका बचपन उन्हें वापस कीजिए.
3. आज भी अलगाववादी ताकतें हमारे देश के कोने कोने में सक्रिय हैं. कश्मीर और उत्तरपूर्व के कई राज्यों की दशा छिपी नहीं है. इस देश की एकता और अखंडता के लिेए एक मजबूत संपर्क भाषा अनिवार्य है और वह आतंक की भाषा अंग्रेजी नहीं, जन जन की भाषा हिन्दी ही हो सकती है. इसलिेए राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिक कक्षाओं के बाद हिन्दी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिेए. इस विषय में मेरा सुक्षाव है कि-

(क). दर्जा पाँच तक सिर्फ मातृभाषा की और मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए. (ख). छठीं कक्षा से दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी पढ़ाई जानी चाहिेए और (ग). तीसरी भाषा अंग्रेजी या संस्कृत होनी चाहिेए. मांग बढ़ने पर सारा तकनीक और पाठ्यक्रम अपनी भाषाओं में उपलब्ध होते देर नहीं लगेगी.

4. नई शिक्षानीति के ड्राफ्ट के पृष्ठ 30 पर शिक्षा में भाषा और संस्कृति का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि यद्यपि मातृभाषाओं में ही शिक्षा सबसे प्रभावी ढंग से दी जा सकती है किन्तु विद्यालयों में अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी माध्यम की माँग बढ़ गयी है. प्रश्न यह है कि यदि न्याय की भाषा, प्रशासन की भाषा, विज्ञान और तकनीक की भाषा, मेडिकल की भाषा अंग्रेजी होगी और नौकरियों के लिए परीक्षा में भी अंग्रेजी का बोलबाला रहेगा तो अंग्रेजी की मांग बढ़ेगी ही. हमारे देश में लगभग 600 वर्ष तक फारसी राजकाज की भाषा थी तो उसकी खूब माँग थी. फारसी पढ़ने वाले बड़े बड़े ओहदे पा जाते थे. लोग कहा करते थे – “पढें फारसी बेचें तेल, यह देखों किसमत का खेल.” किन्तु, आज फारसी की माँग नहीं होती क्योंकि उसे अब सत्ता से पदच्युत कर दिया गया है. तो आगे बढ़ाना या घटाना तो सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है. नीतियां भारतीय भाषाओं के अनुकूल बनाएंगे तो भारतीय भाषाओं की माँग होने लगेगी.

5. नई शिक्षा नीति में प्रस्तावित है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के शासी निकायों ( गवर्निंग बाडी ) में उद्योगपतियों को रखा जाना चाहिए. मैं इस प्रस्ताव का पूरी दृढ़ता से विरोध करता हूं. विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की हर कीमत पर रक्षा होनी चाहिए. उसके शासी निकायों में सिर्फ शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और प्रतिष्ठित विद्वानों को ही रखा जाना चाहिए. उद्योगपति रहेंगे तो शिक्षा का व्यापार नहीं रुकेगा.
6. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षको की नियुक्ति के लिए इंडियन एजूकेशन सर्विस ( आई. ई. एस.) के गठन का प्रस्ताव स्वागतयोग्य कदम है. इसे जितना जल्दी हो लागू करना चाहिए.

और अंत में नई शिक्षा नीति लागू करने के इस पहल का मैं स्वागत करता हूँ.
डॉ. अमरनाथ
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय
ई-मेल: [email protected] M : 09433009898

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