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महाभारत के दृश्य और महाकवि बिंदु का काव्य सौंदर्य

महाभारत में श्री कृष्ण को चक्र लेकर भीष्मजी की ओर दौड़ते दिखाया था । बिंदु कवि ने महाभारत की इस घटना को कवित्तों के माध्यम से बहुत सुंदर ढंग से चित्रित किया है ,।
और श्री कृष्ण जी का उत्तर पढ़कर आप भी रोमांचित हो जाएंगे ।

पहला कवित्त भीष्म की प्रतिज्ञा है ।

जो पे वीर पारथ को रथ न मिलाऊं धूर,
तोपे कुरु वंशिन को अंश ही ना जानियो ।
जो पे मेरे बाण पांडवंन के न भेदें प्राण ,
तोपे कहीं कायर प्रमाण दे बखानियो ।
बिंदु कवि ए हो या महारथी के सारथी जू ,
तुम भी हो महारथी व्हे जंग रण ठानियो,
जो पे ब्रजराज तुम्हें शस्त्र ना गहाऊं आज ,
तो पे मोहे शांतनु को तनु ही ना जानियो ।।

श्री कृष्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं महाभारत के युद्ध में शस्त्र हाथ में नहीं उठाऊंगा। भीष्म जी ने उनको ही चुनौती दी कि मैं तुमको शस्त्र हाथ में लेने को मजबूर कर दूंगा,नहीं तो शांतनु का पुत्र नहीं।

श्रीकृष्ण का उत्तर व प्रतिज्ञा

भाखत कहा हो ऐसी धारणा ना रखो चित्त
प्रण के विरुद्ध पक्षपात ना बिचारिहों,
शपथ से बंध्यों हूं रथ हांकिबो है मेरो काम ,
न्यायबद्ध युद्ध को नियम ना बिगारिहों ।
बिंदु कवि होती ना प्रतीति जो तुम्हें तो सुनो ,
सांची सौंह दे के समस्त शंका ही टारिहों,
जो पे एक बाप को सबल सपूत व्हे हों ,
तो ,काहू भांती शस्त्र कर में ना धारिहौं।।

श्री कृष्ण ने भी प्रतिज्ञा कर ली कि मैं अगर एक पिता का पुत्र हूं तो मैं शस्त्र हाथ में नहीं लूंगा और युद्ध का नियम नहीं तोडूंगा । अब घमासान युद्ध प्रारंभ हुआ ।अर्जुन के प्राण संकट में पड़ गए। उन्होंने श्री कृष्ण की शरण लेकर बचाने को कहा। अर्जुन के प्राण संकट में देखकर श्री कृष्ण रथ से कूद पड़े और एक टूटे हुए रथ के पहिए को चक्र की तरह धारण कर भीष्म की और दौड़े।उनको देखकर भीष्मजी ने धनुष बाण रख दिए और हंस कर कहा कि हे गोविंद तुमने तो हाथ में शस्त्र उठा लिया । प्रतिज्ञा भंग कर दी और अपने पिता को भी आज कलंकित कर दिया।

तब श्री कृष्ण ने रथ का पहिया फेंक दिया और हंसकर भीष्म जी को जवाब दिया ।
बोले घनश्याम सुनो भीषम भगत राज ,
मोहि जन्म देने वाले जग में अपार है।
सिंधु ,खंभ ,पृथ्वी,पाषाण से प्रकट होत,
कहां लों बखानों जे अमित अवतार हैं,
कोउ कहे बिंदु वसुदेव देवकी को लाल ,
कोउ कहे नंद और यशोदा के कुमार हैं।
जा को एक बाप होय बचावे निज लाज सो ही
मेरी कौन लाज ,मेरे बाप तो हजार हैं ।।

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