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वसुधैव कुटुंबकम् का साक्षात प्रमाण है भारतीय रेल्वेः श्री सुरेश प्रभु

भारतीय रेल्वे में काम करने वाला हर कर्मचारी इस मायने में भाग्यशाली है कि एक एक कर्मचारी एक साथ मिलकर प्रतिदिन 3 करोड़ रेल यात्रियों की सेवा करता है। रेल्वे के 13.50 लाख कर्मचारी आपसी तालमेल बनाए रखकर प्रतिदिन इन करोड़ों यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुँचाते हैं। दिल्ली में बैठा रेल कर्मचारी हजारों किलोमीटर दूर चेन्नई में बैठे रेल कर्मचारी से तालमेल कर इस रूट पर चलने वाली रेलगाड़ी को गंतव्य तक पहुँचाने के लिए पूरे रास्ते के हर एक रेल कर्मचारी से सतत् संपर्क में रहता है। भारतीय रेल अपने आप में एक अद्भुत चमत्कार है और मेरा मानना है कि रेल्वे में नौकरी करना किसी पुण्य से कम नहीं। भारतीय रेल्वे हमारी वैदिक मान्यता वसुधैव कुटुंबकम् का साक्षात प्रमाण है, जिसमें हर यात्री रेल्वे कर्मचारी के परिवार का सदस्य होता है।
 
ये विचार रेल मेंत्री श्री सुरेश प्रभु ने मुंबई में वेस्टर्न रेल्वे मजदूर संघ के वरिष्ठ नेता दादा जयवंतराव माहुरकर द्वारा अपने 50 वर्षो की जीवन यात्रा में रेल्वे से जुड़े अनुभवों को लेकर लिखी गई पुस्तक गार्ड टू गार्जियन के विमोचन समारोह में संबोधित करते हुए व्यक्त किए।  श्री प्रभु ने कहा कि देश के लाखों रेल यात्रियों की तरह मैं भी भाग्यशाली हूँ कि मुझे प्रधान मंत्री ने रेल्वे जैसे मंत्रालय का काम सौंपा। उन्होंने कहा कि जैसे पूजा में बैठने वालों को पूजा करवाने वाले का पुण्य मिल जाता है ऐसा ही पुण्य मुझे रेल्वे कर्मचारियों की वजह से मिल रहा है। श्री प्रभु ने कहा कि श्री माहुरकर ने एक गार्ड के रुप में रेल्वे में नौकरी शुरु की और रिटायर होते होते वे सभी कर्मचारियों के गार्जियन हो गए। ये तभी हो सकता है जब कोई कर्मचारी रेल्वे में नौकर की तरह नहीं बल्कि रेल्वे के परिवार की तरह समझकर काम करे। दादा माहुरकर ने ये किताब लिखकर मेरा भी एक बड़ा काम कर दिया है। मैं चाहता हूँ कि रेल्वे का हर कर्मचारी ये किताब पढ़े ताकि वह समझ सके कि गार्ड से गार्जियन की यात्रा कितनी सुखद, रोमांचक और प्रेरक हो सकती है। ये पुस्तक हर कर्मचारी के लिए गीता, कुरान और बाईबिल बन जाए तो रेल्वे कर्मचारियों को एक नई दिशा और सोच मिल सकती है।
 
 
श्री प्रभु ने कहा कि रेल्वे एक पिरामिड की तरह है, इसमें शिखर पर तो एक ही व्यक्ति होता है मगर नींव में और इसके आधार में बहुत से हिस्से एक दूसरे से जुड़े होते हैं, रेल्वे के कर्मचारी इस पिरामिड के आधार हैं।
 
श्री प्रभु ने कहा कि मैं रेल्वे के 13.50 लाख कर्मचारियों का मुखिया हूँ, इनकी उपेक्षा करके रेल्वे को नहीं सुधारा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय रेल एक विषम स्थिति से गुजर रही है। हमारे पास संसाधन नहीं हैं, और लोगों की व कर्मचारियों की अपेक्षाएँ बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि हम निजी निवेश करके इस स्थिति को सुधार सकते हैं, और कर्मचारियों  की ताकत से ही आगे बढ़ सकते हैं। श्री प्रभु ने कहा कि हमें रेल्वे में पारदर्शिता लाने के लिए हर प्रोजेक्ट की ऑनलाईन मॉनीटरिंग शुरु करने जा रहे हैं।
 
श्री प्रभु ने कहा कि मैं जब रेल्वे के अधिकारियों के साथ बैठक करता हूँ तो उन्हें कहता हूँ कि आप रेल्वे के लिए ऐसा कुछ करें कि लोग तो आपको याद रखे ही जब आपके नाती –पोते आपकी गोद में खेलने आए तो उन्हें भी आप बता सकें कि आपने इतने बड़े पद पर रहते हुए ऐसा कौनसा काम किया है कि देश के लोगों को उसका लाभ मिला है। कहीं ऐसा न हो कि आपके नाती-पोते या बच्चे आपसे कभी ऐसा सवाल पूछ ले कि आपको शर्मिंदा होना पड़े।
 
ठहाकों के बीच श्री प्रभु ने कहा कि आजकल लोग रेल में यात्रा करने वालों को हैप्पी जर्नी बोलने में डरते हैं, ये मजाक की बात नहीं है, ये बहुत गंभीर बात है, इस स्थिति को हम और आप मिलकर बदल सकते हैं।
 
कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए दादा माहुरकर के बेटे एवँ इंडिया टुडे के अहमदाबाद ब्यूरो प्रमुख श्री उदय माहुरकर ने कहा कि इतने वर्षों की पत्रकारिता और श्री नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत से लंबी निकटता के अपने अनुभव के बाद मैं दावे से कह सकता हूँ कि सुरेश प्रभु का रेल मंत्री बनना भारतीय रेल के लिए एक सुनहरे अध्याय की शुरुआत है। उन्होंने एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि रेल्वे में अब तक बड़े पदों के लिए करोड़ों की बोलियाँ लगती रही है और ये खुला खेल खूब चलता रहता था, लेकिन जब सुरेश प्रभु रेल मंत्री बने तो उन्होंने रेल्वे बोर्ड में नियुक्ति के लिए अपनी पसंद का कोई व्यक्ति नहीं लिया, उन्होंने सीधे पीएमओ में कहा कि मुझे ईमानदार और काम करने वाले लोगों की सूची दे दें ताकि उन्हें रेल्वे बोर्ड में नियुक्त किया जा सके। श्री माहुरकर ने कहा ये कोई छोटी बात नहीं है, इस एक घटना से भारतीय रेल का एक नया और सुनहरा भविष्य तय हुआ है।  
 
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए दादा माहुरकर ने कहा कि आत्मकथा लिखना बहुत मुश्किल काम है। मैं जब भी अपने सचिव को अपने संस्मरण लिखाने बैठता मुझसे मिलने कोई भी कभी भी आ जाता था, लेकिन मेरा सिध्दांत है कि मेरे घर आने वाले साधारण से गैंगमैन से लेकर किसी भी व्यक्ति का तिरस्कार नहीं करता हूँ। मैने 56 साल की अपनी रेल्वे की यात्रा में स्टीम इंजिन से लेकर डीज़ल और अब इलेक्ट्रिक इंजिनों का दौर देखा है। उन्होंने कहा कि जब मैं गार्ड था और रेल पटरियों के किनारे गैंगमैन को बगैर जूते चप्पल पहने अपनी ड्यूटी करते देखता था तो मन को बड़ी टीस पहुँचती थी। गैंगमेन की हालत ये थी कि वे अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते थे, उनके लिए कपड़े और जूते चप्पल तक नहीं खरीद पाते थे। लेकिन अब वो हालत नहीं है, हमने इन गैंगमैन और छोटे कर्मचारियों की हालत सुधारने के लिए लंबी लडाई लड़ी।
 
 
कार्यक्रम में दिल्ली से आए मजदूर नेता डॉ. एम राघवैया ने दादा महुरकर के साथ अपने लंबे मजदूर आंदोलन के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि दादा माहुरकर ने देश भर के 2.5 लाख ट्रैक मैंटेनेंस कर्मचारियों की हालत सुधारने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और र्लेवे को उनका वेतन बढ़ाने के लिए मजबूर किया। इसी तरह उन्होंने 1.3 लाख रनिंग स्टाफ को भी उनके अधिकार दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
 
इस अवसर पर पश्चिम और सेंट्रल रेल्वे के महाप्रबंधक श्री एसके सूद ने भी संबोधित किया।  इस कार्यक्रम में मुंबई से लेकर बड़ौदा और अहमदाबाद तक के रेल कर्मचारी आए थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में वेस्टर्न रेल्वे मजदूर संघ के अध्यक्ष श्री शरीफ खान पठान ने सभी अतिथियों का स्वागत कर दादा माहुरकर का परिचय दिया।
 
इस समारोह में रेल्वे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष श्री के सी जेना, सेंट्रल रेल्वे के पूर्व महाप्रबंधक, बीबी मुद्गिल, सेंट्रल रेल्वे के पूर्व महाप्रबंधक श्री रवींद्र गुप्ता, पश्चिम रेल्वे के एजीएम श्री आर पी भटनागर, बड़ौदा के डीआरएम श्री आशुतोष गांगल भी विशेष रूप से उपस्थित थे।
 
कार्यक्रम के अंत में वेस्टर्न रेल्वे मजदूर संघ के डिविजनल महासचिव श्री अजय कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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