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महर्षि दयानन्द ने हमें क्या दिया ? और क्या किया ?

इस विषय में जितना भी लिखा जाए थोड़ा है तथापि हम संक्षेप मेँ ठोस सामग्री देने का प्रयास करेगेँ। आधुनिक भारत के एक प्रसिद्ध इतिहासकार श्री ईश्वरीप्रसाद ने ‘सरस्वती’ मासिक के सन्‌ 1929 के एक अंक मेँ अपने एक पठनीय लेख मेँ लिखा था- “हिन्दूसमाज मेँ स्वामीजी ने हलचल मचा दी। अदम्य निर्भीकता के साथ उन्होँने स्वेच्छाचारी, निरंकुश “पोपोँ” का सामना किया और काशी के प्रसिद्ध शास्त्रार्थ मेँ अपनी विद्वता का सिक्का जमा दिया। आर्यसमाज के विस्तृत कार्यक्रम ने हिन्दू जाति की मृत हड्डियोँ मेँ फिर से जान डाल दी। राष्ट्रीय आदोँलन का अभी नामो-निशान नहीँ था। अंग्रेजी शासन के विरूद्ध किसी को ताब न थी कि जबान निकाले। आजकल के युवकोँ के लिए उस परिस्थिति को समझना दुष्कर है।”

यशस्वी इतिहासकार श्रीयुत काशीप्रसाद जायसवालजी ने लिखा है- The Sanyasi Dayanand gave freedom to the soul of the Hindus, as did Luther unto the Europeans” अर्थात्‌ संन्यासी दयानन्द ने हिन्दुओँ की आत्मा को ऐसे ही स्वतन्त्र करवाया जैसे योरूपियन लोगोँ को लूथर ने । ऋषि दयानन्द ने देखा कि भारतीय साधुओँ को केवल अपने मोक्ष की ही चिन्ता है। वे संसार से उदासीन रहने को ही वैराग्य, भक्ति की पराकाष्ठा व सन्तपना जानते व मानते थे । ‘कोई नृप होय हमेँ क्या हानि’ कबीरा तेरी झोपड़ी गल कटियन के पास। जो करगने सो भरन गे तू क्योँ भयो उदास।। जहाँ देश के विचारकोँ की, महात्माओँ की ऐसी सोच हो वहाँ देशोन्नति व विकास कैसे सम्भव है ? ऋषि का घोष था कि मुझे अपनी मुक्ति की चिन्ता नहीँ, मैँ करोड़ोँ देशवासियोँ के बन्धन काटने आया हूँ।

ऋषि की इस सोच ने युग बदल दिया । स्वामी अनुभवानन्द जी आर्य संन्यासी को जलियाँवाला हत्याकाण्ड मेँ फांसी का दण्ड सुनाया गया। स्वामी श्रद्धानंद ने संगीनोँ से सीना अड़ाकर शूरता का गान किया। स्वामी स्वतन्त्रानन्द ने सिर पर कुल्हाड़े के वार सहे। परहित जीने-मरने का पाठ आर्योँ ने ऋषि का अनुसरण करके सीखा– “पराई आग मेँ जलना मरीजोँ की दवा होना। कोई सीखे दयानन्द से धर्म पर जाँ फिदा करना।।”

महर्षि दयानन्द ने धर्म को कर्म का रूप दिया। ईश्वर आत्मबल का देनेवाला है यह कहने वाले तो बहुत हैँ, पर ऋषि ने इस आत्मबल का प्ररिचय पग पग पर दिया । उनके शिष्योँ प॰लेखराम, स्वामी श्रद्धानंद, महात्मा नारायण स्वामी ने अपने आचार्य से ये गुण ग्रहण कर नया इतिहास लिख दिया।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति प्रख्यात इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार ने ऋषि दयानन्द की देन या उपलब्धि पर बड़े सुन्दर शब्दोँ मेँ लिखा था- “Today Hinduism calls upon it as its bestally. Today Hinduism has paid the Arya samaj the highest tribute, that of imitation by stealing its programme.”
“अर्थात्‌ आज हिन्दू समाज अपने आपको आर्यसमाज का सर्वोत्तम सहयोगी कहता। आज हिन्दू समाज ने आर्यसमाज के कार्यक्रम व मान्यताओँ का अनुकरण करके इसके कार्यक्रम को चुराकर इसे सबसे उत्तम श्रद्धा पुष्प अर्पित किया है ।” क्या ये सत्य नही है ?

आज अस्पृश्यता का समर्थन करने का साहस किसे है ? आज बालविवाह, अनमेल विवाह का पोषक और विधवा विवाह का विरोधी कौन है ? मूर्ति मेँ भगवान्‌ है यह तो कहते हैँ, मूर्ति भगवान है, यह सिद्ध करने वाला कौन है ? सागर पार जाना पाप नहीँ रहा। यह उस ऋषि का प्रताप है। मायावादी हिन्दू कहते चले आ रहे थे कि सब कुछ ब्रह्मा ही ब्रह्मा है, जगत मिथ्या है, यह सब जो दिखता है स्वप्नवत है | स्वप्न तो सोने वालों को आते हैं | सोने वाले संसार का क्या भला कार सकते हैं ? जगत को मिथ्या मानने वालों से इसके विकास, उन्नत्ति व सुधार का प्रश्न ही नही उठता |

परन्तु महर्षि दयानन्द ने यथार्थ दर्शन दिया- “He has given us a bold philosophy of life. A philosophy of the reality of God, reality of man and the reality of the universe in which man has to live in. अर्थात्‌ ऋषि ने हमेँ वीरोचित दर्शन दिया। ईश्वर की वास्तविकता (सत्ता) का दर्शन दिया, उसने मनुष्य की सत्ता की सच्चाई तथा उस विश्व की वास्तविकता का दर्शन दिया जिसमेँ मनुष्य को रहना है।” “His is a philosophy of bold actions and not of idle musings.” उस ऋषि का दर्शन साहसिक कार्योँ का दर्शन है न कि निठल्ले चिन्तन का।

निर्भीक सत्यवाणी- अंग्रेजी राज आया। ‘अंग्रेजी राज की बरकतेँ'(Blessings) यह पाठ स्कूलोँ, कालेजोँ मेँ पढ़ाया जाता था। गांधी जैसे लोग प्रथम विश्वयुद्ध तक अंग्रेज जाति के न्याय, न्यायपालिका की भूरि-भूरि प्रशंसा किया करते थे। वहीँ ऋषि दयानन्द ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ के तेहरवेँ समुल्लास मेँ अंग्रेजी न्यायपालिका की निष्पक्षता व न्याय की धज्जियाँ उड़ाकर रख दीँ। महर्षि सन्‌ 1877 मेँ जालन्धर पधारे तब आपने एक दिन कहा- “आजकल के राजा न्याय नहीँ प्रत्युत अन्याय करते हैँ। अंग्रेज लोग अपने मनुष्योँ पर अत्यधिक कृपादृष्टि रखते हैँ। यदि कोई गोरा अथवा अंग्रेज किसी देशी की हत्या कर दे तथा वह(हत्यारा) न्यायालय मेँ कह दे कि मैँने मद्यपान कर रखा था तो उसको छोड़ देते हैँ।” राजा राममोहनराय से लेकर स्वामी विवेकानन्द तक कोई भी सुधारक, विचारक, महात्मा इस निर्भीकता का परिचय न दे सका, ऋषि की इसी निर्भीकता ने बिस्मिल, रोशन, अशफाक, भगत सिँह जैसे प्राणवीरोँ की छातियोँ को गर्मा दिया।

ऋषि दयानन्द की विश्व को देन समझने के लिए पाठक यह ध्यान देँ कि पूरे विश्व मेँ यह प्रचार होता रहा है कि अल्लाह या God ने हो जा कहा और सब कुछ हो गया। सात दिन मेँ सृष्टि बन गयी। सात दिन मेँ तो टमाटर, मेथी, प्याज, मिर्ची आदि नही उगते। माता के गर्भ से बालक को जन्मने मेँ भी नौ माह लगते हैँ। सृष्टि का सृजन सात दिन मेँ हो गया- कितना हास्यास्पद कथन है ! लेकिन आज पूरा विश्व ऋषि की वाणी के साथ मानता है- ‘Matter can neither be created nor it can be destroyed’ अर्तात्‌ प्रकृति न उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है। यह अनादि अनंत है। महर्षि दयानन्द ने जो किया व जो दिया वह सबके सामने हैँ और सबको मान्य हो रहा है। इतिहासकार श्री काशीप्रसाद जयसवाल की ये पंक्तियाँ इतिहास का निचोड़ हैँ- “In nineteenth century there was nowhere else such a powerfull teacher of monotheism, such a preacher of the unity of man, such a successful crusader against capitalism in spirituality” अर्थात्‌ उन्नीसवीँ शताब्दी मेँ धराधाम पर एकेश्वरवाद का ऐसा महाप्रतापी सन्देशवाहक गुरू कोई नहीँ हुआ, मानवीय एकता का ऐसा प्रचारक तथा आध्यात्मक जगत्‌ मेँ पूंजीवाद के विरूद्ध लड़ने वाला कोई ऐसा धर्मयोद्धा नहीँ हुआ (जैसा कि स्वामी दयानन्द था)

जुग बीत गया दीन की शमशीर जनी का। है वक्त दयानन्द शजाअत के धनी का

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