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जहाँ रहो हो वहाँ रौशनी लुटाओ तो …

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा ।
किसी चिराग़ का अपना मकाँ नहीं होता ।।
-वसीम बरेलवी

इस शेर पर प्रस्तुत है ब्रज भाषा के जाने माने कवि व शायर नवीन चतुर्वेदी का जवाब

जहाँ रहो हो वहाँ रौशनी लुटाओ तो ।
चिराग़ हो तो ज़रा जम के जगमगाओ तो ।।

जो ये जहान तुम्हारे लिये मुफ़ीद नहीं ।
सुकूँ कहाँ है ज़रा हमको भी बताओ तो ।।

जो क़र्ज़ सर पै उठाए भटक रहे हो तुम ।
भले ही किस्त में लेकिन उसे चुकाओ तो ।।

तुम्हें पसंद नहीं थे जो दूसरों के रंग ।
उन्हीं में डूबे पड़े हो स्वयं, बताओ तो ।।

चलो क़बूल किया सिर्फ़ तुम ही हो सच्चे ।
मगर ख़ुदा की डगर पै क़दम बढाओ तो ।।

सुधार अब तो फ़क़त बेटियों के बस में है ।
भरोसा करके कभी इनको आजमाओ तो ।।

मज़ा न आवै तो बेशक उतार लेना फिर ।
पर एक बार तुम अपनी पतंग उड़ाओ तो ।।

हुनर-नवाज़ नहीं छूते पोरुओं से थन ।
सहर भी होगी मगर रात को बिताओ तो ।।

मुकुट, मुँड़ासे, विजयमाल सब तुम्हारे हैं ।
हुज़ूरे-वाला मगर अपना सर झुकाओ तो ।।

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