मोदी भारतीय मन को बेहतर ढंग से जानते हैं लेकिन मोदी को समझना किसी पहेली को हल करने जैसा है. 11 वर्षों के उनके कार्यकाल की समीक्षा की जाए तो देश में अपवाद स्वरूप कोई मिल जाएगा जिसे मोदी के अगले कदम के बारे में कुछ पता हो या वह यह बता पाए कि मोदी क्या करने वाले हैं. थोड़ा पीछे चलें तो देखेंगे कि वे गुजरात राज्य के सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री थे जिन्हें भाजपा और संघ ने 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री का चेहरा बनाया था. तब की सरकार को कटघरे में खड़ा कर युवाओंं के बीच एक नायक की तरह उभरे थे. यह वह वर्ग था जिसे राजनीति की समझ बहुत नहीं थी लेकिन देश में बदलाव की चाहत थी. चाय पर चर्चा से लेकर वे तूफानी गति से देश के दिल में जगह बना रहे थे. और भारतीय राजनीति में ऐसा कायापलट हुआ कि भारतीय जनता पार्टी नरेन्द्र मोदी को कैश कर केन्द्र की सत्ता पर काबिज हो गई.
विपक्षी नेताओं को तो समझ ही नहीं आया तो उनके अपने ही विरोधी धड़ा भी शांत बैठ गया. परिणामत: पाँच वर्ष बाद केन्द्र में वापस मोदी सरकार की वापसी होती है.
वे भारतीय मानस की नब्ज को बेहतर ढंग से पकड़ते हंै और उसी के अनुरूप वे फैसला करते हैं. भारत एक विशाल देश है और इस बहुसंख्य आबादी जिसमें बहु भाषा-भाषायी लोगों तक पहुँचना सरल नहीं होता है. ऐसे में उन्होंने आकाशवाणी पर प्रत्येक माह ‘मन की बात’ कार्यक्रम की शुरूआत की. ‘मन की बात’ कार्यक्रम के जो तथ्य और आँकड़ें को समझने की कोशिश की गई तो इसके लिए बकायदा एक रणनीति के तहत देशभर के अनाम से गाँव और ग्रामीणों को ‘मन की बात’ कार्यक्रम के लिए जोड़ा गया. देश का प्रधानमंत्री जब अपने कार्यक्रम में सुदूर आदिवासी गाँव की किसी महिला अथवा कोई उपलब्धि का उल्लेख करते हैं तो वह क्या, एक बड़ी आबादी उनकी मुरीद हो जाती है. लोग इस प्रयास में लग जाते हैं कि अगली बार ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री उनकी या उनके गाँव की कामयाबी का उल्लेख करें. आँकड़ों को जाँचें तो पता चलेगा कि घाटे में जा रहे आकाशवाणी की आय में बेशुमार वृद्धि हुई है. मोदीजी की तर्ज पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह और शिवराजसिंह ने भी रेडियो को माध्यम बनाया था लेकिन उन्हें वह सफलता नहीं मिली, जो मोदीजी के कार्यक्रम को मिल रही है. यही नहीं, ‘मन की बात’ कार्यक्रम की निरंतरता भी अपने आप में मिसाल कायम करती है. मोदीजी के पहले महात्मा गाँधी और इंदिरा गाँधी ने रेडियो के महत्व को समझा था लेकिन ‘मन की बात’ कार्यक्रम की तरह वे ऐसा कोई कार्यक्रम शुरू नहीं कर पाए थे.
11 साल के मोदी सरकार के कार्यकाल की समीक्षा की जाए तो सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि समूचे भारतीय समाज की सोच और उनकी कार्यवाही को डिजीलाइटेशन कर दिया. अब हर सौदा-सुलह ऑनलाइन होगा. सरकारी दफ्तरों सेे कार्य के लिए भटकने की जरूरत नहीं है क्योंकि एक क्लिक पर आपका काम हो जाता है. इससे रिश्तवखोरी पर नियंत्रण पाया जा सका है. जन्म प्रमाण पत्र बनाने से लेकर पासपोर्ट बनाने तक के लिए अब दफ्तरों के चक्कर काटने की जरूरत नहीं है. मोदीजी बतौर प्रधानमंत्री सोशल मीडिया की ताकत भी जानते हैं सो वह अपनी बात एक्स से लेकर रील्स और इंटस्टा तक लेकर जाते हैं. यह पूरी कवायद करने के लिए उनकी टीम है लेकिन इसका मॉडल ऐसा बना हुआ है कि हर आम आदमी को महसूस होता है कि मोदीजी सीधे उनसे रूबरू हो रहे हैं. यही मोदीजी की ताकत बनती है और यही उनकी लोकप्रियता का कारण भी है.
भारतीय राजनीतिक इतिहास में गैर-कांग्रेसी दल से तीसरी बार केन्द्र में सत्तासीन होने वाले मोदी हैं. मोदीजी का सबसे प्रबल पक्ष है कम्युनिकेशन का. कम्युनिकेशन की थ्योरी कहती है कि वही कामयाब कम्युनिकेटर है जो लोगों तक अपनी बात प्रभावी ढंग से पहुँचा सके. इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस दौर के सबसे बड़े संचारक के रूप में स्वयं को स्थापित किया है. वे जनसभा में लोगों को मोहित कर लेते हैं. आम आदमी से सीधे संवाद से मोदी सरकार के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ता है. मोदी जी कई बार जानते हुए भी ऐसे बयान देते हैं कि विरोधी उनकी आलोचना पर उतर आते हैं. मोदीजी आम आदमी के सायक्लोलॉजी को भी बेहतर ढंग से समझते हैं. अनेक बार स्थिति-परिस्थितियों के चलते आम आदमी निराशा में डूब जाता है तब यह देश के मुखिया की जवाबदारी होती है कि कैसे उसे उबारे और उसमें उत्साह का संचार करे. भारत ही नहीं, समूचे वैश्विक परिदृश्य में देखें तो महँगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दे मुंहबाये खड़े हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नौकरी करना नहीं, नौकरी देना सीखो के मंत्र के साथ नवउद्यमी बनाने के लिए स्र्टाटअप के लिए प्रोत्साहित किया.
निश्वित रूप से 11 वर्ष के कार्यकाल में सबकुछ भला-भला हुआ हो, यह तय नहीं है. एक मनुष्य के नाते अनेक अच्छी पहल हुई तो कुछ गलतियाँ भी हुई होंगी. वे क्या, पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री भी इसी श्रेणी में आते हैं. कई बार उनकी पार्टी के नेताओं के कदाचार पर उनसे प्रतिक्रिया माँगी जाती है तो यह बेमानी लगता है क्योंकि इस पर बोलने और कार्यवाही करने की जवाबदारी पार्टी की है ना कि प्रधानमंत्री की हैसियत से सरकार की. वे भारतीय और भारतीयता के लिए लोगों में जज्बा पैदा करते हैं और सनातन युग की ओर वापसी का संकेत देते हैं. डिग्री वाली शिक्षा से बाहर लाकर स्किलबेस्ड शिक्षा भारत को गुरुकुल की ओर ले जाता है. मानना चाहें तो मोदीजी का कार्यकाल आपको देशहित में लग सकता है और न मानना चाहें तो खामियाँ गिनाते रहिए.
अपनी लम्बी राजनीतिक पारी और केन्द्र में 11 वर्ष के अपने कार्यकाल में मोदीजी युवा नेता नहीं रहे लेकिन वे एक जिम्मेदार बुर्जुग की भूमिका में आ गए हैं. यकिन ना हो तो अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की पत्नी उषा वेंस के अनुभव और उनकी बातों से समझ लें. इसी साल बीते अप्रैल में भारत दौरे को उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का परिवार आया था. वेंस की पत्नी ने यह भी कहा कि उनके तीन छोटे बच्चों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में उनके दादाजी की झलक दिखी. उन्होंने पीएम मोदी से मिलते ही उन्हें दादा जी माना लिया और वे उनसे लडिय़ाते रहे. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ उषा वेंस और उनके तीन छोटे बच्चे इवान, विवेक और मीराबेल भी थे. दादा जी बन जाने की यह छवि भारतीय मन को जोड़ता है. यही भारत है, यही श्रेष्ठ है.






