देवव्रत रेखे ने ने 2 अक्टूबर 2025 से 30 नवंबर 2025 तक — लगभग 50 लगातार दिन — काशी (वाराणसी) के वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय में दंडक्रम पारायण किया। देवव्रत महेश रेखे महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के ब्राह्मण परिवार से हैं। उन्होंने लगभग 2000 मंत्रों वाला शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिनी पाठ — बिल्कुल स्मृति से, बिना किसी ग्रंथ देखे — शुद्ध स्वर, लय, उच्चारण, क्रमिकता एवं रिवर्स क्रम सहित पूर्ण किया।

काशी के इतिहास में पहली बार शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिनी शाखा के दंडक्रम (विकृति ) के कंठस्थ पारायण की शुरूआत हुई। दक्षिणामूर्ति मठ के अधिपति 1008 पुण्यानंद गिरि महाराज के शिष्य स्वामी 1008 स्वयंप्रकाश गिरि महाराज तथा 108 महेश चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज ने आशीर्वाद दिया। विद्यालय, गीर्वार्णवागवर्धिनी सभा एवं महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के श्रुति स्मृति ज्ञान मंदिर वेद पाठशाला ने स्वयंप्रकाश गिरि महाराज को अभिनंदन पत्र,माला महावस्त्र एवं श्रीफल अर्पित किया। एक महीने 28 दिनों तक शुक्लयजुर्वेद माध्यंदिन शाखा का एकाकी संपूर्ण कंठस्थ दंडक्रम वेदपारायण अनवरत रोजाना साढ़े तीन घंटे तक चलता रहा।

- दंडक्रम पारायण — पारंपरिक वैदिक recitation (उच्चारण) का एक अत्यंत जटिल रूप है। इसे “वैदिक पाठों का मुकुट (crown of Vedic recitation)” माना जाता है।
- इसमें, शुक्ल यजुर्वेद (Shukla Yajurveda) की माध्यंदिनी शाखा के लगभग 2000 मंत्र (mantras) शामिल होते हैं, जिन्हें बेहद सख्त सरस्वरी (svara), लय, उच्चारण, क्रम (क्रम से तथा उल्टा — क्रमिक और “विकृति/वितक्रम” क्रम) में व्यवस्थित करके — सिर्फ स्मृति (कंठस्थ) से — पढ़ा जाता है।
- दंडक्रम पारायण में गिनती, स्वर, लय, उच्चारण, क्रमिकता, रिवर्स क्रम (वितक्रम / विकृति) सभी का सम्यक पालन करना पड़ता है — यह स्मरण-शक्ति, उच्चारण-कुशलता, लय-बोध, मन-एकाग्रता, शारीरिक व मानसिक संयम जैसे गुणों की परीक्षा है।
- इस वजह से यह पारायण बहुत दुर्लभ और कठिन माना जाता है — इतिहास में अब तक मात्र तीन–चार बार ही साफ-स्वरूप में इसकी रिकॉर्डेड पारायण हुई है।
- डक्रम पारायण — केवल मंत्रों का पाठ नहीं, बल्कि संरक्षण (preservation): क्योंकि वैदिक मंत्र-पाठ की पारंपरिक oral स्मृति + उच्चारण + क्रम + स्वर — यह सब “पुस्तक” में नहीं, सिर्फ मानव स्मृति व गुरुबद्ध अनुशिक्षण (oral tradition + guru parampara) में सुरक्षित रहती है। देवव्रत की यह पारायण इस परंपरा को जीवंत रखने का प्रयास है।
- इतिहास व संस्कृति के लिए: लगभग 200 वर्षों से इतनी शुद्धता के साथ दंडक्रम पारायण नहीं हुआ था — इसलिए इसे “वैदिक पुनरुत्थान (Veda revival)” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
- युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा: एक 19 वर्षीय युवा द्वारा यह कठिन तपस्या पूरी कर दी गई — इसे देख भारतभर के वेद-पाठ, संस्कृत, वैदिक अध्ययन में रुचि रखने वाले लोगों को प्रोत्साहन मिला है।
- गुरु-परंपरा व पारिवारिक साधना की महत्ता स्पष्ट हुई: इस सफलता में उनके पिता गुरु महेश रेखे की दीक्षा, मार्गदर्शन व प्रशिक्षण अहम रहा — जो दिखाता है कि गुरु-शिष्य परंपरा व अनुशासन कितनी महत्वपूर्ण है।
यह शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिनी शाखा (Madhyandina Shukla Yajurveda) के मंत्रों का एक विशिष्ट पाठ है, जिसकी रचना कई सौ वर्ष पूर्व हुई और यह अत्यंत दुर्लभ है।यह संरचना क्यों कठिन है?
- प्रत्येक पंक्ति सही स्वर (उदात्त/अनुदात्त/स्वरित) में पढ़नी होती है।
- हर आरोहण और अवरोहण में मात्रा, संधि, गति, लय समान रखनी होती है।
- 2000+ मंत्रों के लिए यह क्रम पढ़ना — अत्यंत कठिन स्मृति एवं अनुशासन माँगता है।
इस परम साधना व उपलब्धि का महत्व — इसकी विशेषताएँ:
- इसमें लगभग 2000 मंत्र (Shukla Yajurveda Mantras) शामिल होते हैं।
- इन्हें एक विशेष दंड-आकार (Staff-like structure) के क्रम में पढ़ा जाता है।
- इसमें सीधा (Anuloma), उल्टा (Viloma), तथा संयुक्त (Samhita + Variational) क्रम शामिल हैं।
- हर मंत्र को
- स्वर (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित)
- लय
- दीर्घ-ह्रस्व
- शुद्ध सन्धि
- विस्तारित क्रम
के साथ सटीक पढ़ना पड़ता है।
इतिहास ःप्राचीन काल
यह पद्धति 1500–2000 वर्ष पूर्व विकसित मानी जाती है, जब गुरुकुलों में वेद-संरक्षण के लिए कई “विकृति-पाठ” विधियाँ बनाई गई थीं।
मध्यकाल ः मुगल-काल से लेकर 1800 AD तक यह परंपरा बहुत दुर्लभ हो गई। कई शाखाओं में यह कला लगभग समाप्त हो गई।
- पिछले 200 वर्षों में इसका पूर्ण शास्त्रीय रूप से किया गया पाठ दर्ज नहीं मिलता।
- 2025 में वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे (19 वर्ष) ने Kashi में इसे पूरा कर इतिहास रचा।
- विशेषज्ञों ने कहा कि यह “दंडक्रम का पुनर्जन्म (Revival)” है।
नीचे “घन-पाठ (Ghanapātha) vs दंड-क्रम (Dandakrama)” का संयुक्त आरेख (Combined Diagram) अत्यंत सरल, साफ़ और शिक्षण-योग्य रूप में प्रस्तुत है — ताकि दोनों विधियों के अंतर एक नज़र में स्पष्ट हो जाएँ।
भाग 1 — घन-पाठ (Ghanapātha) — आरेख
घन-पाठ में क्रम इस प्रकार चलता है:A B = B A = A B
B C = C B = B C
C D = D C = C D
इसे पिरामिड या "त्रिक (Triplet)" पैटर्न कहा जाता है।
A B
B A
A B
---------
B C
C B
B C
---------
C D
D C
C D
प्रत्येक युग्म (A-B, B-C, C-D) का "तीन बार उलट-सीधा दोहराव"
यह एक “घंटी के उलटने जैसा” rhythmic structure है
भाग 2 — दंड-क्रम (Dandakrama) — आरेख
दंड-क्रम एक लंबा, आरोहण–अवरोहण (up–down) वाला क्रम है: A
A B
A B C
A B C D
B C D
C D
D
ऊपर चढ़ता है
फिर चरम पर पहुँचता है
फिर लौटता है
एक दंड (staff) की आकृति बनाता है
भाग 3 — संयुक्त तुलना आरेख (Side-by-Side Diagram)
नीचे दोनों को साथ रखा गया है — बाईं ओर घन-पाठ, दाईं ओर दंड-क्रम। GHANA-PATHA DANDAKRAMA
A B A
B A A B
A B A B C
A B C D
B C B C D
C B C D
B C D
C D
D C
C D
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे को बिना किसी रुकावट के 50 दिनों में दंडक्रम परायणम -जिसमें शुक्ल याजुर्वेद की मध्यंदिनी शाखा के 2000 मंत्र शामिल हैं-पूरा करने के लिए बधाई दी है। श्री मोदी ने कहा कि 19 वर्षीय वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे द्वारा किया गया कार्य आने वाली पीढ़ियों द्वारा याद किया जाएगा। काशी के सांसद के रूप में, मुझे प्रसन्नता है कि यह असाधारण उपलब्धि इस पवित्र शहर में हुई। श्री मोदी ने कहा, "उनके परिवार, पूरे भारत के कई संतों, ऋषियों, विद्वानों और संगठनों को मेरा प्रणाम, जिन्होंने उनकी सहायता की।"
प्रधानमंत्री ने एक्स पर पोस्ट किया:

भारतीय संस्कृति के प्रति जुनूनी हर व्यक्ति को उन पर गर्व है कि उन्होंने बिना किसी रुकावट के 50 दिनों में दंडक्रम परायणम-जिसमें शुक्ल आयुर्वेद की मध्यंदिनी शाखा के 2000 मंत्र शामिल हैं- को पूरा किया। इसमें कई वैदिक छंद और पवित्र शब्द शामिल हैं जिन्हें त्रुटिहीन रूप से उच्चारित किया गया है। वह हमारे गुरु परंपरा के बेहतरीन अवतार के प्रतीक हैं।
काशी के सांसद के रूप में, मुझे प्रसन्नता है कि यह असाधारण उपलब्धि इस पवित्र शहर में हुई। उनके परिवार, पूरे भारत के कई साधुओं, ऋषियों, विद्वानों और संगठनों को मेरा प्रणाम, जिन्होंने उनकी सहायता की है।





