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आधी रात के बाद का सच

अन्ततः आज सुबह अनेक अटकलों को नकारते हुए आतंकी याकूब मेमन को नागपुर जेल में फांसी दे दी गयी ।अगर आतंकी याकूब की फांसी 1993 के भयानक बम विस्फोटो के बाद कुछ वर्षो में ही हो जाती तो उन विस्फोटो में मारे गए सैकड़ो मासूमो व निर्दोषो की आत्माओ को शान्ति मिलती और उनके असहाय परिवारो को भी थोड़ी राहत अवश्य  प्राप्त होती। आज जब 22 वर्ष पूर्व हुए उस रक्तरंजित अपराध के एक अपराधी को सजा दी गयी तो क्या उस समय के पीडितो के जो घाव सुख चुके है , पर इससे कुछ मलहम लग पायेगा या उन मृतको की आत्माओ को मोक्ष मिलेगा ?
यहाँ  यह भी कहा जाना अनुचित नहीं होगा कि इन जिहादियो को अगर समय से दंड मिल जाए  तो बाद में होने वाले और अधिक भयानक बम विस्फोटो पर कुछ सीमा तक अंकुश लग सकता है । किन्तु मुम्बई के अतिरिक्त देश के विभिन्न भागो में भी मजहबी आतंकवादी अपने जिहाद के लिए दहशत फैलाने से रुके नहीं और तो और इस लचीली कानूनी व्यवस्था का लाभ उठाते हुए व कठोर कानूनों के अभाव  में 2008 में मुम्बई के रेलवे स्टेशन व ताज आदि होटलो में दुर्दांत जिहादियो ने कहर बरपाया व सारा देश लगभग 60 घंटे  चला दिल दहलाने वाला मौत का तांडव देखता रहा और वह आक्रोशित व अपमानित होने को बेवश था । 

न्याय में जितनी देरी होती है उतना ही अपराधियों  व आतंकवादियों  को प्रोत्साहन मिलता रहता है ।फिर क़ानून के ऊपर विभिन्न दबाव डालते रहो केस को लंबा खीचते रहो व जिहादियो को बचाने के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष न जाने कितने प्रकार के हथकंडे अपनाये जाने से भी इनके हौसले बढ़ते रहते  है।आज कल लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इस पर राजनीति करना भी बहुत सरल हो गया । अनेक अवसरों में यह कहना साधारण होता जा रहा है कि मुसलमान है तो सजा हो गयी या दोषी बनाया गया । पूर्व क्रिकेट कप्तान रहे अज़रूदीन ने भी मैच फिक्सिंग में फंसने पर यही कहा था और उसके बाद वे राजनीति में भी सक्रिय हुए क्योकि वे मुसलमान  है। कानून कभी किसी अपराधी को मुसलमान या हिन्दू की दृष्टि से नही देखता फिर भी हमारे देश में मुस्लिम पोषित राजनीति करने वाले इस बहाने

अपराधियो को बचाने के लिए जाने अनजाने ऐसे हथकंडे अपनाने से नहीं चूकते।आतंकवाद विरोधी कठोर कानून टाडा व पोटा आदि को इसी  मुस्लिम राजनीति के अन्तर्गत हटाया गया था ।इसी मानसिकता के वशीभूत जेलो में बंद विवादित मुस्लिम आतंकवादियों व अपराधियों  को छोड़ने के लिए विभिन्न राजनीतिक दल प्रयासरत है । परिणामस्वरूप नागपुर जेल में देर रात याकूब मेमन ने भी एक गार्ड से कह ही दिया कि उसकी फांसी का राजनीतिकरण हुआ है , पर उसने यह कभी नहीं कहा कि उसने जो षड्यंत्र रचा था वह  "जिहाद " का एक भाग था जिसमें सैकड़ो लोगो को मारा व घायल किया गया था । 

आज यह बहुत ही विचारणीय विषय है कि क्या कोई सामान्य अपराधी जो जिहादी न हो के लिए कानून देर रात तक कभी  इतने कडे परिश्रम करेगा? हमारा कानून एक तो निर्णय लेने में बहुत देर करता है और फिर निर्णय होने के बाद जिहादियो के सन्दर्भ में  तथाकथित देश का संभ्रान्त वर्ग अपनी अपनी विशेषता व अपने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होने के कारण उस निर्णय पर प्रभाव डालने के लिए न जाने किसके इशारे पर जी जान से जुट जाता है, क्यों ?

ये लोग कभी जिहाद की मानसिक प्रवर्ति के विरुद्ध कुछ क्यों नहीं बोलते ? उसकी जड़ो में जाकर जिहाद (मुस्लिम आतंकवाद) का कारण क्यों नहीं ढूंढते? जिहादियो की शिक्षा जो उनको इस आतंकवाद के लिए प्रेरित करती है तो उस दोषपूर्ण व्यवस्था पर क्यों नहीं चिंतन किया जाता ..? आज यह संकट पूरी दुनिया में बढ़ रहा है इस पर कोई मीडिया क्यों नहीं बड़ी बड़ी डिबेट करवाता ?.क्यों आतंकवादियो के लिए सारा मीडिया सकारात्मक रूप रखते हुए दिखाई देता है  .क्यों नहीं उसके नकारात्मक पक्ष पर चर्चा होती..क्यों आतंक को नष्ट करने के स्थान पर आतंकी को बचाने की चिन्ता की जाती है …आदि अनेक ज्वलंत प्रश्न उठते है? क्या देश के नागरिको की सुरक्षा की गारंटी जो सरकार की जिम्मेदारी है पर कभी  कोई चिंतन होगा और उसकी सुरक्षा की सुनिश्चितता होगी ?

 

बड़ा खेद हुआ कि जब उच्चतम न्यायालय द्वारा  कल ( 29 जुलाई ) याकूब की फांसी के निर्णय को सही ठहराया गया व राष्ट्रपति द्वारा भी दया याचिका निरस्त हो जाने के उपरान्त भी देश के कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओ ने उच्चतम न्यायालय के 3 जजो की बेंच को देर रात पुनः सुनवाई करने को क्यों विवश किया ? क्या यह उन अधिवक्ताओ का बौद्धिक दिवालियेपन था या कोई अप्रत्यक्ष भारी दबाव जो उन्होंने  देर रात  (या उषा काल )  में लगभग 3.20 बजे से 4.56 बजे तक एक जज महोदय के निवास स्थान को ही कोर्ट रुम बनवा कर व सुप्रीम कोर्ट की लाइब्रेरी का भी उस समय उपयोग करके कानूनी प्रक्रिया को ही इतिहासिक बनवा दिया । यह प्रश्न भविष्य में अवश्य उठेगा कि देर रात में क्या इस प्रकार सरकारी या न्यायिक  कार्यो का निर्णय हो जाने के पश्चात भी उसे  पुनः विचार योग्य क्यों बनाया गया ? यह व्यवस्था के विरुद्ध एक अनुचित आग्रह है व भविष्य में इसके भयंकर परिणाम आये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ?

भवदीय
विनोद कुमार सर्वोदय
गाज़ियाबाद

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