अमीर खुसरो का उपलब्ध ‘हिंदवी' साहित्य आलोचकों द्वारा उनको हिंदी के आदि कवि, ब्रजभाषा के पहले कवि, खड़ी बोली के पहले कवि इत्यादि कहने का आधार प्रदान करता है। ‘हिंदी भाषा का विकास’ पुस्तक में गोपाल राय लिखते है - “वस्तुतः काव्य भाषा के रूप में शुद्ध ब्रज भाषा के प्रथम प्रयोग का श्रेय अमीर खुसरो को दिया जाता है। यद्यपि लम्बी अवधि तक मौखिक परम्परा में जीवित रहने के कारण उपलब्ध उदाहरणों की भाषा की प्रामाणिकता किंचित संदेहास्पद है पर इससे अमीर खुसरो के प्रथम ब्रजभाषा कवि होने के तथ्य में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।”

1 राय साहब पहले वाक्य में कहते हैं कि अमीर खुसरो ‘शुद्ध ब्रजभाषा’ के प्रथम प्रयोक्ता हैं। तुरंत दूसरी में ही कह डालते हैं की उनकी उपलब्ध कृति की भाषा की प्रमाणिकता संदेहास्पद है। संदेहास्पद भाषा नमूने के आधार पर ‘शुद्ध भाषा प्रयोग’ का श्रेय किस तर्क के आधार पर दिया गया है? जब उनके पास अमीर खुसरो द्वारा प्रयुक्त भाषा का यथारूप उपलब्ध ही नहीं है तो उन्होंने यह कैसे कह दिया कि वे ‘शुद्ध ब्रजभाषा के प्रथम प्रयोक्ता’ हैं? जबकि उसी पृष्ठ में आगे लिखते हुए गोपाल नायक, नामदेव, त्रिलोचन, और अग्रवाल कवि का उदाहरण देते हैं जो तत्कालीन ब्रजभाषा में काव्य रचना कर रहे थे; जबकि इनकी भाषा अमीर खुसरो से अधिक प्रामाणिक रूप में उपलब्ध है। ये कवि पचास साल आगे पीछे रचना कर रहे थे। इन्हें गोपाल राय ने उदाहरण के लिए रखा तो है परंतु इनके दाय को वो अमीर खुसरो के नाम कर देते हैं। विनयमोहन शर्मा ने सप्रमाण सिद्ध किया है कि नामदेव जी हिंदी के पहले गीतकार हैं।

डॉ रामकुमार वर्मा लिखते हैं “शब्द चाहे ब्रजभाषा के हों पर क्रिया और कारक चिह्न आदि खड़ी बोली के हैं। ऐसी स्थिति में खुसरो की भाषा को ब्रजभाषा ना मानकर खड़ी बोली मानना अधिक समीचीन होगा।”

2 इस मत को आगे बढ़ाते हुए डॉ रामगोपाल शर्मा दिनेश लिखते हैं-“आदिकाल में खड़ी बोली को काव्य की भाषा बनाने वाले वे(अमीर खुसरो) पहले कवि हैं।”

3 यहाँ दो बातें द्रष्टव्य हैं- एक तो यह कि लगातार मौखिक परम्परा में चली आयी कविता का भाषा रूप और उस भाषा के क्रिया रूप को आधार बनाकर भाषा का स्वरूप निश्चित नहीं किया जा सकता क्योंकि उनमें समय के साथ व्यापक परिवर्तन आ जाता है। दूसरी बात यह कि पिछले पृष्ठ में ही भाषा विश्लेषण के लिए जिस विद्वान को रामकुमार वर्मा जी ने उद्धृत किया है उनका मानना है कि “उनकी(खुसरो की) ज़बान ब्रजभाषा से मिलती जुलती है। यह यक़ीन के साथ नहीं कहा जा सकता कि जिस ज़बान में वह शअरगोई करता था वह वही थी जो आमतौर पर हिंदू-मुसलमान बोलते थे।”

4 जिस भाषा का नमूना ही उपलब्ध न हो उस पर निश्चयात्मक निर्णय देना हास्यास्पद लगता है। फिर भी बड़े निश्चयात्मक ढंग से डॉ रामगोपाल शर्मा स्थापना देते हुए से प्रतीत होते हैं कि “भाषा की दृष्टि से सदा उनकी पहेलियाँ साहित्य के इतिहास का सदा एक अंग रहेंगी।”

5 अमीर खुसरो ने जो भाषा लिखी ही नहीं उसके लिए वो प्रशंसित हो रहे हैं। इस संदर्भ में आचार्य शुक्ल का मत बड़ा संयत प्रतीत होता है। उनका कहना है कि देशी कवियों द्वारा प्रयुक्त भाषा से खुसरो की भाषा अवश्य बोलचाल की भाषा होगी ; बहुत कुछ प्राकृत रूढ़ियों से मुक्त।

6 आचार्य ने खुसरो की भाषा को कोई निश्चित नाम नहीं दिया है। अतः उन्हें किसी भाषा के आदि कवि होने को लेकर कोई हास्यास्पद उद्घोषणा भी आचार्य शुक्ल ने नहीं की है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर आचार्य शुक्ल ने ध्यान दिलाया है। वह यह कि खुसरो के नाम से उपलब्ध पहेलियों में भी बहुत कुछ परवर्ती पहेलियाँ बाहर से आ मिली हैं।

7 डॉ रामगोपाल शर्मा दिनेश भी लिखते हैं-“अमीर खुसरो नामक कई व्यक्ति हुए हैं, अतः अमीर खुसरो के नाम से प्रचलित सभी रचनाओं को अमीर खुसरो की रचनाएँ मानना भ्रम है।”

8 अतः खुसरो के नाम उपलब्ध हिंदवी का साहित्य भी किस हद तक खुसरो का है निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है।

अपनी पुस्तक ‘गुर्रतुलकमाल’ में खुसरो ने स्वयं लिखा है कि उसने अपनी हिंदवी रचनाओं को अपने मित्रों को बाँट दिया करता था।इसीलिए भोलानाथ तिवारी जी ने खुसरो की कविता पर विचार करते हुए स्पष्ट घोषणा की है कि “हम खुसरो की हिंदी पर विचार करने का प्रयास नहीं करेंगे।”

9 तथ्य यह है कि खुसरो ने अपने समय और समज की लोकभाषा में कविता अवश्य की परंतु जो आज खुसरो के नाम से प्रचलित है वही नहीं की।
अतः हिंदी के प्रथम गीतकार के निर्णय में विनयमोहन शर्मा जी के मत से सहमत हुआ जा सकता है कि ‘नामदेव ही हिंदी के प्रथम गीतकार हैं।’

10 खुसरो की पहेलियों की प्रेरणा से रीतिकाल में कुतूहल काव्य का प्रणयन मानते हुए लिखते हैं- “चमत्कार और कुतूहल की प्रवृत्तियाँ भी खुसरो की प्रेरणा से हिंदी काव्य में विशेष स्थान पाने लगी थी। फलतः रीतिकाल में कुतूहल काव्यों की एक लम्बी परम्परा चली।”11 स्थापना देने में जल्दबाज़ी करने वाले आलोचक यह भूल जाते हैं कि इसी भारतीय समाज में ‘प्रहेलिका’ एक मनोरंजक खेल के रूप में ख्यात रहा है। सिद्ध, नाथ और निर्गुण कवियों की ‘संधा’ भाषा भी पहेली का ही एक रूप है। इसी पहेली और कुतूहल काव्य का साहित्यिक रूप ‘दृष्टिकूट के पदों’ में लक्षित किया जा सकता है। अतः यह अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है कि अमीर खुसरो ने लोक से प्रेरित होकर पहेलियाँ और मुकरियाँ लिखी होंगी तथा उसी लोक से रीतिकाल में भी प्रेरणा ग्रहण की गयी होगी। लोक काव्यों ने सदा से शिष्ट साहित्य को प्रेरित किया है।

खालिकबारी
ख़ालिकबारी अरबी, फ़ारसी, और हिंदी का शब्दकोश है। इसके निर्माता का श्रेय अमीर खुसरो को दिया जाता है और आलोचक उन्हें भाषाओं को जोड़ने वाला मानकर ‘संस्कृतियों के संयोजक’ का श्रेय देते हैं। रामकुमार वर्मा लिखते हैं “इन तीनों(अरबी, फ़ारसी,और हिंदी) के पर्यायों से उन्होंने मुसलमानों और हिंदुओं की भाषा और संस्कृति को जोड़ने का प्रयत्न किया।”

12 प्रथम तो यह कि शब्दकोश निर्माण से ही कोई संस्कृति को नहीं जोड़ देता है।

उसके लिए सामाजिक सांस्कृतिक मेल की सुदीर्घ परम्परा की आवश्यकत होती है। शब्दकोश कोई भी विदेशी अपनी भाषाई सुविधा के लिए बनाता है। अंग्रेज भी शब्दकोश बनाए थे तो क्या इस आधार पर हम उन्हें संस्कृतियों का संयोजक कह दें ; बिना अन्य पक्ष पर विचार किए! हास्यास्पद बात तो यह है कि आलोचक जिस ‘खालिकबारी’ को संस्कृतियों का संयोजक कहते नहीं अघा रहे हैं उसी के सम्बंध में जिस विद्वान के मत को उन्होंने उद्धृत किया है उन्ही का मानना है कि- “आमतौर पर अमीर खुसरो को ख़ालिकबारी का जो हिंदुस्तानी और इस्लामी ज़बानों की एक मंज़ूम फरहंग है, मुसन्निफ समझा जाता है। मगर हाल ही में ख़ास तौर पर महमूद शेरानी की तहक़ीक़ और तफ़शीश से यह साबित हो चुका है कि यह बहुत बाद के जमाने की किताब है।”

13 उपलब्ध खलिकबारी के विषय में भोलेनाथ तिवारी का मानना है कि यदि खलिकबारी खुसरो की रचना है भी तो वो आज उपलब्ध नहीं है। जो उपलब्ध है वो खुसरो की नहीं है।

14 तबला और सितार
सितार का आविष्कार भी अमीर खुसरो ने नहीं किया था। सितार गुप्तकाल में प्रचलित था, उमेश जोशी ने एक अरबी इतिहासकार के हवाले से सिद्ध किया है। अरब के लोग समुद्रगुप्त को ही ‘सेहतार’ अर्थात् सितार का प्रदाता मानते हैं।

15 ललितकिशोर सिंह ने माना है कि तबले के आविष्कार का श्रेय अमीर खुसरो को देना उचित नहीं है। तबला और सितार दोनों भारतीय वाद्य हैं जो क्रमशः मृदंग और वीणा के संक्षिप्त रूप हैं कोई विदेशी बाजे नहीं।

16 यदि तबला अमीर खुसरो के द्वारा आविष्कृत होता तो अबुल फ़ज़ल से उसका वर्णन नहीं छूटता। आइन ए अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने वाद्य यंत्रों के वर्णन में तबला का कोई ज़िक्र नहीं किया है।स्वयं खुसरो ने जिन वाद्ययंत्रों का वर्णन अपनी पुस्तक ‘नुह-ए-सिपहर’ में किया है उनमें ना तो सितार है और ना ही तबला। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के अनुसार तबले का साक्ष्य 200BCE में भाजा चैत्य, महाराष्ट्र में मिला है।17

संगीत

अमीर खुसरो के समय भारतीय समाज व्यापक संक्रमण से गुजर रहा था। इस्लामी संस्कृतियों का प्रबल दबाव भारतीय संस्कृति में संदूषण लाने की निरंतर चेष्टा कर रहा था। मूर्ति भंजन और मंदिर ध्वंस तथा धर्मांतरण के अवांतर संगीत में अरबी और ईरानी तत्व का सम्मिश्रण हो रहा था। यह सम्मिश्रण भारतीय संगीत सप्तक में पाँच कोमल स्वरों का मिश्रण किया अतः अब सप्तक में बारह स्वर हो गए थे। यथा सा, रे, रे_, गा, गा_, मा, मा_, पा, धा,धा_, नी, नी_। कहा जाता है कि इसी समय अमीर खुसरो ने कई रागों का आविष्कार किया जो भारतीय रागों में थोड़े से परिवर्तन से बने थे या उनमें ईरानी रागों को मिलकर एक संकर राग बनाया गया था। परंतु इस तथ्य के प्रमाण के रूप में एम आर गौतम ने ओ सी गांगुली की पुस्तक ‘राग एंड रागिनी’ का संदर्भ दिया है। जहाँ गांगुली जी ने मौलाना शिब्ली की फ़ारसी पुस्तक ‘शिर-उल-अंजाम’ से तथ्य उठाया है।

18 कदाचित मौलाना शिब्ली ने ‘राग दर्पण’ से अपने तथ्य लिए हों। ‘राग दर्पण’ खुसरो के बहुत बाद की रचना है। अतः कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता है। अमीर खुसरो के विषय में व्यपक संदर्भ, गीत और संगीत दोनों दृष्टियों से उसके क़व्वाली और ग़ज़ल रचयिता के रूप में प्राप्त होता है।

नामदेव जी के एक अभंग में प्रकरण आता है कि ‘ख़याल गायन’ संगीत में ऐंद्रिकता प्रधान है। इसमें रागों का भी उचित पुट नहीं है अतः नामदेव ने ‘ख़याल’ गाने के बदले अभंग का आविष्कार किया। अर्थात् नामदेव के समय अर्थात् खुसरो के समय ख़याल का प्रचलन था। कहा जाता है कि खुसरो ने ख़याल का भी प्रवर्तन किया था लेकिन वो उतना कारगर नहीं था। उसके बाद हुसैन शाह शर्की ने ख़याल का रूप प्रवर्तन किया। परंतु ख़याल का आधुनिक रूप सदारंग के द्वारा मुहम्मद शाह रंगीले के समय में प्रवर्तित हुआ। अतः ख़याल के प्रवर्तन का श्रेय भी अमीर खुसरो को देना संदेह से परे नहीं है। क्योंकि खुसरो का ख़याल का जनक होना लौकिक आख्यान ही है प्रामाणिक तथ्य नहीं। हाँ, क़व्वाली और ग़ज़ल का आविष्कारक खुसरो को मान सकते हैं। यह बात खुसरो के जीवन से भी समर्थित होता है। खुसरो मुईनुद्दीन चिश्ती का शिष्य था। अतः खुसरो का एक सूफ़ी के साथ रहने से उसके क़व्वाली गायन की सम्भावना को बल मिलता है। मुसलमानों के यहाँ क़व्वाली गायन की पुरानी परम्परा थी जो उन्हें अरब की संस्कृति से मिला था। कव्वाली और ग़ज़ल बनाने की बात खुसरो स्वयं भी स्वीकारता है। परंतु ख़याल गायन के आविष्कार का श्रेय खुसरो को नहीं दिया जा सकता यह निश्चित तथ्य है।

19 हिंदू-मुस्लिम एकता : खुसरो
खुसरो की हिंदी में रचना करने मात्र से तथा ‘नूह-ए-सिफ़र’ के आधार पर खुसरो को हिंदू-मुस्लिम एकता तथा सामासिक संस्कृति का पुरोधा माना जाता रहा है। रामकुमार वर्मा खुसरो की हिंदी में रचना को हिंदी पर बड़ा भारी उपकार मानते हैं, जिसके कारण शासकों का ध्यान हिंदी को ओर गया।

20 चंद गीत जिसका कोई रूप ही स्थिर ना हो, छिछली तुकबंदियाँ हों, उसी को उपकार मानने वाली आलोचना को तार्किक कैसे कहा जा सकता है। अंग्रेजों ने भी हिंदी भाषा का व्यापक प्रयोग किया था तो क्या उससे वो श्रद्धा के पात्र हो गए? दूसरी बात है शासकों का ध्यान हिंदी की ओर लाने का तो उसका कोई प्रमाण ही नहीं है। ‘हिंदवी’ भाषी प्रांत की राजभाषा फ़ारसी ही बनी। पता नहीं हिंदी का कौन सा उपकार वर्मा जी सुल्तान द्वारा लक्षित कर लिए। “खुसरो ने हिंदी को किसी भी प्रकार अरबी, या फ़ारसी से हीन या तुच्छ नहीं माना।”

21 जबकि नूह ए सिफ़र में खुसरो तीन ही भाषाओं को दुनिया में रत्न(पर्ल) माना है - अरबी, फ़ारसी, और तुर्की। जिस संस्कृत को वह ‘पर्ल अव पर्ल्स’ कहता है उसे भी अरबी से हीन ही मानता है।

22 हिंदी में रचना करने को लेकर हिंदी के आधुनिक आलोचक लहालोट हुए जा रहे हैं, उसे हिंदू मुस्लिम एकता का पुरोधा घोषित किए जा रहे हैं ; जबकि स्वयं खुसरो ही उसे मनोरंजन मात्र मानता था तथा लिखकर मित्रों में बाँट दिया करता था।

23 खुसरो का हिंदुस्तान के प्रति लगाव उसकी पुस्तक ‘नूह-ए-सिफ़र’ में प्रगाढ़ रूप में दिखता है। इसे आधार बनाकर कहा जा सकता है कि खुसरो भारत भक्त था या हिंदू-मुसलमान के बीच का सेतु था। अपनी इस पुस्तक में इसने भारत का जमकर गुणगान किया है। उसने अपनी मातृभूमि के रूप में हिंदुस्तान पर गर्व किया है। इसे स्वर्ग बताया है। यहाँ की जलवायु पर गर्व किया है, यहाँ के पशु पक्षियों की तारीफ़ की है, यहाँ के ज्ञान विज्ञान
24, कला कौशल, भाषा
25, कवि, विद्वान
26, गुरु
27, ब्राह्मण, वीर सभी की जमकर तारीफ़ की है। कहता है हिंदू उन अच्छे लोगों में से हैं जो ईश्वर में विश्वास रखता है।

28 भारतीय संगीत जैसा दुनिया में कुछ नहीं है।

29 जो पशुओं पर भी अपना वशीकरण कर डालता है।

30 भारत को पृथ्वी पर स्वर्ग कहते हुए खुसरो लिखता है- ‘दमिश्क में सुहानी हवा हिंदुस्तान से ही पहुँची।’31 इस स्वर्ग के विषय में आगे लिखता है कि भारत ग़ैर-मुसलमानों के लिए आदम के आने से लेकर इस्लाम के आने तक स्वर्ग था।

32 (अर्थात् इस्लाम के आने के बाद स्थिति बदल चुकी है?) जो बुतपरश्त अभी इस स्वर्गीय आनंद का उपभोग कर रहे हैं और बुत की पूजा किए जा रहे हैं वो जहन्नुम में जाएँगे और ये मज़ा उनके ऊपर अज़ाब के रूप में बरपेगा।

33 ऐसे में उन्हें ‘राष्ट्रवादी मुसलमानों का अग्रणी महापुरुष’ कहने के रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के दाबे की हवा निकल जाती है।

34 वस्तुतः अमीर खुसरो को यहाँ की आबों-हवा अछी लगी उसने इसकी तारीफ़ की, यहाँ के लोग अछे लगे उनकी तारीफ़ की। लेकिन ये तारीफ़ें केवल मिलने वाली सुविधाओं की है ना कि भारतीयता की। ग़ैर-मुसलमानों के प्रति अमीर खुसरो की दृष्टि एक कट्टर मुस्लिम की ही है। यह बात और भी हास्यास्पद लगती है जब दिनकर कहते हैं -“यदि खुसरो को हिंदुस्तान ने अपने आदर्श मुसलमान के रूप में उछाला होता तो हिंदुस्तान की कठिनाइयाँ कुछ ना कुछ कम हो जाती। आज भी मौक़ा है कि हम खुसरो को आदर्श भारतीय मुसलमान के रूप में जनता के सामने पेश करें।”

35 हाँ, यह और बात है कि गजवा-ए-हिंद के लिए इन्हें अवश्य उछाला जा सकता है। क्योंकि ग़ैर-मुसलमानों को जहन्नुम भेजने वाले खुसरो का दृष्टिकोण उनकी एक अन्य पुस्तक ‘खज़ाइन-उल-फुतूह’ ज़्यादा स्पष्ट होकर सामने आती है जब वो इस्लाम के क्रूर रूप अलाउद्दीन ख़िलजी और मलिक काफ़ूर की यशोगाथा गाते हैं जो ‘नूह-ए-सिफ़र’ में गौण है। प्रश्न है ‘नूह-ए-सिफ़र’ में यह गौण क्यों है?
अमीर खुसरो ने ‘नूह-ए-सिफ़र’ मुबारक ख़िलजी के कहने पर लिखा था। जिसका ताकीद वह पुस्तक के प्रत्येक अध्याय के अंत में मुबारक ख़िलजी की तारीफ़ों के द्वारा करता गया है। हिंदुस्तान की इस तारीफ़ की विज्ञप्ति के रूप में यह कहता है कि ‘हिंदुस्तान को अन्य देशों के ऊपर तरजीह देने या इसकी बेपनाह तारीफ़ करने के पीछे एकमात्र कारण है कि इसका बादशाह मुबारक शाह ख़िलजी है।

’36 प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि यह बादशाह के खुशामद मात्र के लिए लिखी गयी काव्यात्मक पंक्ति है । परंतु वास्तव में यह ऐतिहासिक तथ्य है। इस पुस्तक के लेखन की प्रेरणा मुबारक ख़िलजी ने ही दी क्योंकि उसे अपने ‘विरुद-गान’ की आवश्यकता थी। मुबारक ख़िलजी अपने राज्यारोहण के बाद स्वयं को ख़िलाफ़त से मुक्त घोषित कर दिया था। इतना ही नहीं उसने स्वयं को ही ख़लीफ़ा घोषित कर दिया। मुबारक ने दिल्ली में ‘दारुल ख़िलाफ़त’ नामक क़िले का निर्माण भी करवाया था।

37 खुसरो इस नए ख़लीफ़ा की ख़िलाफ़त को खोतान, खुरासान, तिरमिज, तबरेज, बुख़ारा और खवारिज़्म तक बढ़ा हुआ लिखता है तथा इसे ही ‘दारुल ख़िलाफ़त’ मानने लगा था। इतना ही नहीं इसने ख़िलाफ़त का केंद्र ही दिल्ली को घोषित कर दिया था।

38 खुसरो ने मुबारक को ‘साहब-ए-ख़िलाफ़त’ भी कहा है।

39
परंतु केवल ख़लीफ़ा कह देने से कोई ख़लीफ़ा नहीं हो सकता था। इसके लिए कोई ठोस आधार होना चाहिए था। इस्लामिक संस्कृति की श्रेष्ठता का आधार प्राप्त वास्तविक ख़लीफ़ा के सामने मुबारक ख़िलजी क्या तर्क रखता! अतः उसने अपनी विरुदावली लिखवायी और दिल्ली अर्थात् हिंदुस्तान को अन्यान्य देशों के मुक़ाबले श्रेष्ठ ठहराया, इसकी अलौकिकता का बखान करवाया। अब चूँकि तत्समय तक भारत में इस्लामी संस्कृति का कोई विशेष सांस्कृतिक इतिहास नहीं था, कोई श्रेष्ठ परम्परा नहीं थी अतः भारतीय हिंदू परम्पराओं का ही गुणगान एकमात्र विकल्प के रूप में सामने आया। उस हिंदू प्रजा का बादशाह होकर मुबारक ख़िलजी अपने ख़िलाफ़त की तथा अपनी श्रेष्ठता का दावा ठोक सकता था। इसी बीच खुसरो द्वारा इस्लाम को भूला नहीं गया क्योंकि अंततः प्रतिष्ठा इस्लाम की यथा ख़िलाफ़त की ही की जा रही थी। अतः ग़ैर मुसलमानों, बुतपरस्तों को इस हिंदुस्तान में सुख भोगने के बदले जहन्नम की यातना का निर्देश कवि अमीर खुसरो करता गया है।
अमीर खुसरो की हिंदू-मुस्लिम एकता या भारत सम्बन्धी मत ‘नूह-ए-सिफ़र’ से पूर्व और भी अधिक स्पष्टता से ‘खज़ाइन-उल-फुतूह’ में वर्णित है। वस्तुतः यह काव्य से अधिक इतिहास की पुस्तक है जिसमें खुसरो का वास्तविक हृदय अपनी एकल गति में में तरंगायित है। ‘नूह-ए-सिफ़र’ की तरह असमंजस में नहीं है। खुसरो हिंदू-मुस्लिम भाईचारा के स्थान पर इस्लामिक रीति की इस्लामिक भाईचारा का ज़्यादा मुरीद है। जिन मुसलमानों ने हिंदुओं का साथ दिया उसके प्रति खुसरो बहुत ही घृणा से भरा है। उसका मानना है कि उसने इस्लाम के नियम को तोड़ा है -“मुसलमानों के विरुद्ध किसी विधर्मी को अपना मित्र मत बनाओ।” पुनः उन मुसलमानों के द्वारा हिंदू पक्ष छोड़कर मुसलमानों के दल में आ मिलने पर खुसरो उसके प्रति दयाद्र हो जाता है।

40 प्रत्येक स्थान पर हिंदुओं के लिए खुसरो ने ‘विधर्मी’(काफिर) शब्द का ही प्रयोग किया है। कहीं भी उसने हिंदुओं के प्रति सम्मान का भाव नहीं दिखाया है। माबर के अभियान का वर्णन करते हुए लिखता है कि “विधर्मिता की सड़ाँध को, जिसे समुद्र इस क्षेत्र से नहीं धो पाया उसे तलवार ने धो दिया।”

41 हारे हुए हिंदुओं के जहन्नुम की आग प्रज्ज्वलित करने की इच्छा रखने वाला खुसरो लिखता है “ हारे हुए हिंदुओं को तलवार से वहाँ भेज दिया गया जहां उनके भाई अग्नि में जा चुके थे, आग, उनकी पूजा की अनुपयुक्त प्रतीक उनके लिए उपयुक्त दंड हो जावे।”

42 खुसरो स्वयं माबर की ओर सैनिक अभियान में मूर्तियाँ और मंदिर तोड़ने के सुल्तान के आदेश के लिए हर्षित था।। प्रसन्न होकर लिखता है “जब तलवार का पानी समुद्री तट पर आती है तो विधर्म का समुद्र शरीयत में डूब जाता है।

43 हिंदू और भारतीय इतिहास के लिए खुसरो के शब्द ध्यातव्य हैं- “हिंदू देवों की बहुत सी राजधानियां, जहाँ शैतानी सत्ता पुराने समय से आबाद रही और जहाँ इस्लाम की सीमा से दूर आदिकाल से शैतान ने अपने अंडे सेकर बच्चे निकाल उनकी पूजा मूर्तिपूजकों के लिए अनिवार्य कर दी। … लेकिन सुल्तान ने इन अधर्मियों के चिह्न मिटा दिए हैं …सभी आसुरी ज़मीनों से ताकि शरीयत का प्रकाश उनके आसपास पहुँच सके जिससे उन स्थानों की अंधविश्वासों की सडाँध ‘मुआज्जिनों’ की अजान और इबादत की स्थापना से दूर हो सके। इसके लिए अल्लाह का शुक्रिया।44 जिस हिंदुस्तान का उल्लेख खुसरो स्वर्ग के रूप में किया उसी को शैतानी ज़मीन कह रहा है। हिंदुओं की तुलना खुसरो कुत्ते से करता है-“किसी भी हिंदू को घेरने वाली फ़ौज की रेखा को पार नहीं करने दिया गया जैसे खैबर से कुत्तों को बाहर नहीं आने दिया गया था।”

45 रणथम्भौर के लिए- ‘इस्लाम का स्थल’ सम्मान स्वर्ग से इस कृतघ्न स्थान के लिए प्राप्त हुआ।…इस्लाम की प्रातः समीर ने सभी मंदिरों को गिरा दिया। विधर्मी दुर्ग के पाषाण जो हिंदुओं कि शंख ध्वनियाँ सुनकर बहरे हो गए थे अब मुस्लिमों की अजान सुन गूंजने लगे। जहाँ पूर्व में ब्राह्मणों की घंटियों के घंटनाद ने हिंदुओं के कान फाड़ डाले थे वहाँ पैग़म्बर के खुतबे की मधुर ध्वनि ने ईमान धारकों के कानों को आनंद से भर दिया।46 खुसरो ने सोमनाथ मंदिर को तोड़ने के लिए निर्देशित सेना को देवदूत निर्देशित बादलों की संज्ञा दी है

47 …सोमनाथ के मंदिर को पवित्र मक्का की ओर झुकने को मजबूर किया …ऐसा बुतपरस्त देश जो काफिरों का मक्का था अब इस्लाम का मदीना बन गया…मज़बूत दिल सच्चे शागिर्दों ने, जहाँ भी उन्हें मिले सभी प्रतिमाएँ एवं मंदिर तोड़ दिए।जेहाद के सबब तकबीर और शहादत सब तरफ़ सुनाई पड़ने लगा। …इस्लाम की तलवार ने उस क्षेत्र को ऐसा पवित्र कर दिया जैसे सूर्य रश्मियाँ धरिणी को उज्ज्वल करती हैं।”

48 हिंदुओं को तब तक कुचला जाए जब कि ये “गोपूजक हिंदू दिल से गाय को तुच्छ ना मानने लगे”।49
क्या इसक बाद इसमें कोई संदेह बच जाता है कि खुसरो एकता का अग्रदूत नहीं बल्कि जिहादियों का ही एक ‘कलाकार साथी’ था!

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