सत्यजित रे की फिल्म Mahapurush (1965) में बिरिंची बाबा एक पाखंडी गुरु हैं जो लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाते हैं। वहाँ साधु संस्कृति पर तीखा व्यंग्य था। जादूगर(1989) में अमरीश पुरी फर्जी बाबा का किरदार निभाते हैं जो लोगों को चमत्कार दिखाकर ठगते हैं। OMG: Oh My God! (2012) में मिथुन चक्रवर्ती लीलाधर महाराज के रूप में फर्जी गॉडमैन हैं जो आस्था के नाम पर व्यापार करते हैं। फिल्म पूरे बाबा कल्चर पर व्यंग्य करती है।
PK (2014) में सौरभ शुक्ला का तपस्वी महाराज सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक है। फिल्म धार्मिक ठेकेदारों, चमत्कारों और अंधविश्वास का खुला मजाक उड़ाती है। कई साधु संगठनों ने इसका विरोध भी किया था। Singham Returns (2014) में अमोले गुप्ते सफेद वस्त्रों वाले गॉडमैन हैं जो राजनीति और अपराध से जुड़े विलेन हैं। Global Baba में फर्जी बाबा लोगों को नुस्खे और कृपा के नाम पर लूटता है और सत्ता तक पहुंचने की कोशिश करता है। पुरानी फिल्मों में Victoria No. 203 (1972), Sanyasi (1975) और Sarkar (2005) जैसी फिल्मों में भी केसरिया वस्त्र वाले साधु अक्सर लुटेरे, शराबी या षड्यंत्रकारी दिखाए गए हैं। आश्रम नाम की OTT कोशिश को भी शुमार कर लें।
और उसी के समानान्तर गाँवों में साधुओं को बच्चाचोर कहने की आदत का विकास भी देखिए।
और उसी के समानांतर जिन क्षेत्रों में साधुओं का जाना बंद हो गया, वहाँ धर्मांतरण की रफ़्तार देखिए।
किसी सभ्यता को समझना हो तो यह मत देखिए कि उसने कितने राजा पैदा किए; यह देखिए कि उसने किन मनुष्यों को सम्मान दिया। भारत की एक विलक्षण विशेषता यह रही है कि यहाँ राजाओं के साथ-साथ उन लोगों को भी असाधारण प्रतिष्ठा मिली जिन्होंने राज्य, संपत्ति, पद और वैभव से दूरी बनाई। यह कोई साधारण बात नहीं है। संसार की अधिकांश सभ्यताओं में शक्ति का केंद्र राजसत्ता रही; भारत ने शक्ति का एक दूसरा रूप भी स्वीकार किया—त्याग की शक्ति, तप की शक्ति, मौन की शक्ति, आत्मसंयम की शक्ति।
इसीलिए भारत के सांस्कृतिक इतिहास में साधु केवल धार्मिक व्यक्ति नहीं है; वह एक प्रकार का आध्यात्मिक नागरिक (Spiritual Citizen) है। वह समाज के भीतर रहते हुए भी उससे थोड़ी दूरी बनाए रखता है। वह राज्य का कर्मचारी नहीं, बाज़ार का प्रतिनिधि नहीं, किसी निगम का अधिकारी नहीं। उसकी उपयोगिता भी तत्काल नहीं दिखाई देती। वह पुल नहीं बनाता, उद्योग नहीं चलाता, चुनाव नहीं लड़ता; फिर भी हजारों वर्षों तक समाज ने उसे सम्मान दिया। क्यों? क्योंकि समाज जानता था कि मनुष्य केवल अर्थव्यवस्था से नहीं चलता; उसे अर्थ (Meaning) भी चाहिए।रोटी शरीर को जीवित रखती है; अर्थ जीवन को।
साधु इसी अर्थ-बोध का वाहक रहा है। वह पूछता है—मनुष्य कौन है? जीवन का प्रयोजन क्या है? दुःख का स्वरूप क्या है? मृत्यु का अर्थ क्या है? त्याग क्यों? करुणा क्यों? आत्मसंयम क्यों? ये प्रश्न किसी मंत्रालय के विषय नहीं होते, लेकिन सभ्यता की दीर्घायु इन्हीं प्रश्नों पर निर्भर करती है।
भारत का सौभाग्य यह रहा कि यहाँ साधु-परंपरा एकरूप नहीं रही। यहाँ एक ओर वेदांत के मनीषी हैं, दूसरी ओर भक्त कवि; एक ओर योगी हैं, दूसरी ओर तांत्रिक; एक ओर गृहस्थ संत हैं, दूसरी ओर संन्यासी; एक ओर मौन साधक हैं, दूसरी ओर लोकसेवी संत। इस बहुलता ने भारतीय समाज को यह सिखाया कि आध्यात्मिकता का एक ही मार्ग नहीं होता।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने वैदिक पुनर्जागरण का आह्वान किया। रामकृष्ण परमहंस ने अनुभव को सिद्धांत से ऊपर रखा। रमण महर्षि ने “मैं कौन हूँ?” के प्रश्न को साधना का केंद्र बनाया। परमहंस योगानंद ने योग को वैश्विक संवाद दिया। लाहिड़ी महाशय ने दिखाया कि गृहस्थ जीवन और उच्च साधना विरोधी नहीं हैं। निसर्गदत्त महाराज ने आत्मबोध को निर्भीक स्पष्टता से रखा। स्वामी चिन्मयानंद ने शास्त्र को आधुनिक शिक्षा और संवाद से जोड़ा। मेहर बाबा, जिद्दू कृष्णमूर्ति, बाबा हरिदास—इन सबने अलग-अलग प्रकार से मनुष्य की आंतरिक संभावनाओं को समझने का प्रयास किया।
भारत के आध्यात्मिक इतिहास का अध्ययन करने पर एक रोचक बात दिखाई देती है। समाज को बदलने वाले अनेक विचार पहले आश्रमों, मठों, अखाड़ों, यात्राओं और छोटे आध्यात्मिक केंद्रों में जन्मे, बाद में वे व्यापक समाज तक पहुँचे। साधु केवल उपदेशक नहीं था; वह एक प्रकार का चलता-फिरता विश्वविद्यालय था। वह ज्ञान लेकर गाँव-गाँव जाता था। वह पुस्तकों को मनुष्यों से जोड़ता था। शास्त्र यदि नदी है, तो साधु उसका प्रवाह है।
मंदिर स्थिर है; साधु चलती हुई परंपरा है।यही कारण है कि जहाँ जीवित परंपराओं का संपर्क कम होता है, वहाँ सांस्कृतिक रिक्तियाँ भी बन सकती हैं। समाज केवल संस्थाओं से नहीं चलता; वह मनुष्यों से चलता है। एक शिक्षक विद्यालय को अर्थ देता है, एक चिकित्सक अस्पताल को, एक कलाकार रंगमंच को और कई बार एक साधु किसी स्थान को आध्यात्मिक केंद्र बना देता है। इसलिए किसी समाज की सांस्कृतिक शक्ति केवल उसकी इमारतों से नहीं मापी जा सकती; यह भी देखना होगा कि उसके प्रेरक मनुष्य कौन हैं।
यह भी सत्य है कि हर युग में कुछ ढोंग, पाखंड और शोषण भी साधु-वेश के साथ जुड़े हैं। भारतीय परंपरा स्वयं इस बात से परिचित रही है। कबीर ने पाखंड की आलोचना की, तुलसी ने भी विवेक का आग्रह किया, उपनिषदों ने भी सत्य को अनुभव की कसौटी पर परखा। इसलिए साधु-परंपरा का सम्मान और विवेक—दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
हर साधु को सिद्ध मान लेना अंधविश्वास है; हर साधु को ठग मान लेना सांस्कृतिक विस्मृति।
आज के समय में भारत के सामने एक नई चुनौती है। आधुनिक जीवन ने मनुष्य को अभूतपूर्व सुविधा दी है, लेकिन साथ ही एक गहरा आंतरिक अकेलापन भी दिया है। सूचना बढ़ी है, लेकिन शांति नहीं; संपर्क बढ़ा है, लेकिन संबंध नहीं; उपभोग बढ़ा है, लेकिन संतोष नहीं। ऐसे समय में साधु-परंपरा का महत्व फिर से समझा जा सकता है—एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो मनुष्य को स्वयं से मिलने का अवसर देता है।
यहाँ सिनेमा और लोकप्रिय संस्कृति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी समाज की सामूहिक स्मृति में साधु केवल हास्य, छल या पाखंड का पात्र बन जाए, तो अगली पीढ़ी उसकी सकारात्मक संभावनाओं को देख ही नहीं पाएगी। दूसरी ओर यदि साधु को केवल चमत्कारों के घेरे में बंद कर दिया जाए, तब भी उसका मानवीय और दार्शनिक पक्ष छूट जाएगा।
भारत को अपने साधुओं की पुनर्खोज इसलिए करनी है कि वह अपने ही आध्यात्मिक इतिहास को फिर से पढ़ सके।
दयानंद को उनकी वैचारिक निर्भीकता के लिए।
रामकृष्ण को उनकी आध्यात्मिक प्रयोगशीलता के लिए।
रमण महर्षि को आत्म-अन्वेषण के लिए।
कृष्णमूर्ति को प्रश्न करने की स्वतंत्रता के लिए।
योगानंद को योग के वैश्विक संवाद के लिए।
लाहिड़ी महाशय को गृहस्थ साधना के लिए।
निसर्गदत्त को आत्मबोध की स्पष्टता के लिए।
चिन्मयानंद को ज्ञान और संगठन के समन्वय के लिए।
पवहारी बाबा को उस ज्ञान के लिए जिसने विवेकानंद को उनकी ओर खींचा
और उन हजारों अनाम साधुओं के लिए, जिनके नाम इतिहास में नहीं हैं, लेकिन जिनके कारण गाँवों में मंदिर बचे, यात्राएँ चलीं, कथाएँ जीवित रहीं, सेवा कार्य हुए और समाज ने अपने से बड़ी किसी चीज़ पर विश्वास बनाए रखा।
क्योंकि किसी सभ्यता का पतन तब नहीं होता जब उसके भवन टूटते हैं; उसका पतन तब होता है जब उसकी स्मृतियाँ टूटती हैं।और भारत की स्मृति में साधु केवल एक व्यक्ति नहीं है।वह एक संभावना है।यह संभावना कि मनुष्य धन से बड़ा हो सकता है।पद से बड़ा हो सकता है।प्रसिद्धि से बड़ा हो सकता है।और अपने भीतर की शांति से संसार को भी थोड़ा शांत कर सकता है।
इसीलिए भारत को अपने साधुओं को फिर से पढ़ने, समझने और खोजने की आवश्यकता है।क्योंकि समाज को केवल विशेषज्ञ नहीं चाहिए।उसे ऐसे मनुष्य भी चाहिए जो यह याद दिलाएँ कि जीवन का अंतिम प्रश्न सफलता नहीं, सार्थकता है।और शायद इसी कारण भारत ने हजारों वर्षों तक राजाओं के साथ-साथ साधुओं को भी स्मरण रखा।राजा राज्य बनाते हैं।साधु सभ्यता बनाते हैं।
और सभ्यताएँ राजाओं से अधिक लंबी आयु पाती हैं।
हनुमान अंश का महत्त्व इसमें है कि वह साधु को सही परिप्रेक्ष्य में रखती है।

(लेखक मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मप्र के चुनाव आयुक्ते हैं)




