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जनजातीय समाज के अधिकारों को लेकर सजग रहे डॉ कार्तिक उरांव

डॉ. कार्तिक उरांव की जयंती (29 अक्तूबर पर विशेष)

डा कार्तिक उरांव जनजातीय समाज के अधिकारों की लडाई के अग्रदूत थे । मतांतरित हुए जनजातीय समाज के लोगों को आरक्षण का लाभ न मिले इसे लेकर उन्होंने काफी प्रयत्न किया था । उनका मानना था कि मतांतरित हुए जनजातीय लोग क्योंकि अपनी संस्कृति व परंपरा से कट कर विदेशी संस्कृति अपना लेते हैं ऐसे में उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए । वास्तव में देश के संपूर्ण जनजातीय समाज की मांग को उन्होंने वाणी प्रदान की थी । उन्होंने एक तरह से जनजातीय समाज की पीडा को सशक्त तरीके से व्यक्त किया था ।

उनकी आज जयंती है । छोटानागपुर इलाके में एक जनजातीय परिवार में जन्म ग्रहण करने वाले कार्तिक उरांव अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति थे । तत्कालीन बिहार व वर्तमान के झारखंड के गुमला में मेट्रिक की पढाई करने के बाद उन्होने इंजीनियरिंग की अनेक डिग्री हासिल की । इसके बाद वह उच्च शिक्षा के लिए वे इंलैण्ड गये । बाद में वह भारत लौटे तथा देश की राजनीति में उन्हें स्वयं को शामिल कर समाज की सेवा में लग गये । वह लोकसभा से सांसद व केन्द्र सरकार में मंत्री भी रहे ।

जन प्रतिनिधि के रुप में कार्य करने के दौरान उन्होंने जनजातीय समाज की समस्याओं को काफी निकट से देखा । चर्च व मिशनरी संस्थाओं द्वारा भोले भाले जनजातीय लोगों का मतांतरण ने उन्हें परेशान किया । उन्होने इस बात को भी निकट से देखा कि कैसे जनजातीय समाज के मतांतरित लोग आरक्षण का लाभ ले रहे हैं तथा इससे जनजातीय मूल समाज के लोगों को अपने अधिकारों से बंचित होना पड रहा है । जनजातीय समाज के लोगों के साथ हो रहे इस अन्याय को लेकर वह दुःखी हो गये ।

संविधान में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति दोनों वर्गों के लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान है । अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों के साथ समाजिक भेदभाव का शीकार होने के कारण आरक्षण की सुविधा प्रदान किये जाने की व्यवस्था है । इसी तरह अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों की विशेष रीति- रिवाज, संस्कृति व परंपरा को बचाये रखने के लिए उन्हें भी आरक्षण का लाभ दिये जाने का प्रावधान है ।

यदि अनुसूचित जाति वर्ग का कोई व्यक्ति मतांतरित हो जाता है तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता । इस बात का प्रावधान संविधान में है । लेकिन यदि कोई अनुसूचित जनजाति वर्ग का व्यक्ति मतांतरित हो जाता है तो उसे आरक्षण का लाभ मिलता रहता है । वास्तव में इसे संविधान की विसंगति ही कही जाएगी ।

पूरे देश में करीब सात सौ जनजाति हैं जिन्हें अनुसुचित जनजाति वर्ग वर्ग में शामिल किया गया है । अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा- बोली, परंपरा आदि को ध्यान में रख कर जनजातियों को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल किया गया था । इसका एक मात्र उद्देश्य था कि वे अपनी परंपरा- संस्कृति आदि को सुरक्षित रख सकें तथा साथ साथ उनका विकास भी हो ।

जनजातीय समाज में सभी रीति रिवाज, सामाजिक व्यवस्था एवं पारंपारिक उत्सव आदि अपने आराध्य देवी देवता एवं देव स्थान के प्रति आस्था व विश्वास के प्रति आधारित होते हैं । लेकिन जनजातीय समाज का कोई व्यक्ति मतांतरित हो कर ईसाइयत या फिर इसलाम में चला जाता है तो स्वाभविक है उसकी आस्था व विश्वास अपने देवी देवता व देव स्थान से समाप्त हो जाती है। लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों को मिलने वाली आरक्षण का लाभ मिलता रहता है ।

चूँकि जनजातीय के सुविधाएं एवं अधिकार अपनी संस्कृति, आस्था, परंपरा की सुरक्षा करते हुए विकास करने हेतु सशक्त बनाने के लिए आरक्षण व अन्य सुविधा प्रदान करने का प्रावधान किया गया था । लेकिन इन सुविधाओं का लाभ उन जनजातियों के स्थान पर वे लोग उठा रहे हैं जो अपनी जाति छोड़ कर ईसाई या मुसलिम बन गये हैं ।

दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ मतांतरित लोग अपनी संस्कृति, आस्था, परंपरा को त्याग कर ईसाई या मुसलमान हो गये हैं, इन सुविधाओं का 80 प्रतिशत लाभ मूल जनजाति समाज से छिन रहे हैं । डा कार्तिक उरांव ने इस बात को भलीभांति अनुभव किया । इस बात ने उन्हें काफी व्यथित कर दिया । उनका दुःख पूरे भारत के जनजातीय समाज की थी । पूरे भारत के जनजातीय समाज झेल रहे इस अन्याय का उन्होंने विरोध किया ।

संविधान की इस भयानक विसंगति को लेकर देश में एक बडी बहस खडी की । डा उरांव ने 1967 में 17 जुन को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 235 सांसदों के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन सौंपा । इस ज्ञापन में कहा गया था कि मतांतरित हुए अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों को इस सूची से बाहर किया जाए तथा उन्हें आरक्षण का लाभ न मिले । संविधान में इसे लेकर संशोधन किया जाए ताकि मतांतरित लोग मूल जनजातीय लोगों का हक न छिन सकें । 10 नवंबर 1970 को उन्होंने इसी समान मांग को लेकर में 348 सांसदों के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन फिर से सौंपा । इसमें भी जनजातीय समाज के साथ हो रहे इस अन्याय को रोकने के लिए संविधान में आवश्यक संशोधन की मांग की गई थी ।

लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जनजातीय समाज की इस मांग पर कोई कार्रवाई तब नहीं हुई । आज 50 साल से अधिक बीत जाने के बाद आज तक भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है । आज भी यह अन्याय लगातार जारी है । डा उरांव आज नहीं है लेकिन उनका दर्द यानी पूरे जनजातीय समाज का दर्द वैसे का वैसा बना हुआ है । इसे दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाए ।

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